उत्तराखंड में तैयार हुआ ₹182 करोड़ का ‘जिहादी ड्रग’:  50 हजार किराए के लिए सीरियाई नेटवर्क को सौंपी फैक्ट्री, पूरी प्लानिंग से चुना गया देहरादून – Dehradun News
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उत्तराखंड में तैयार हुआ ₹182 करोड़ का ‘जिहादी ड्रग’: 50 हजार किराए के लिए सीरियाई नेटवर्क को सौंपी फैक्ट्री, पूरी प्लानिंग से चुना गया देहरादून – Dehradun News

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नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) ने हाल ही में दिल्ली और गुजरात से पहली बार 182 करोड़ रुपए की ‘जिहादी ड्रग’ कैप्टागन की 227.7 किलोग्राम खेप पकड़ी थी। अब जांच में सामने आया है कि दिल्ली से पकड़ी गई दो लाख से ज्यादा गोलियां उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में तैयार की गई थीं। NCB ने जब इस पूरे मामले में अवैध रूप से भारत में रह रहे सीरियाई नागरिक को गिरफ्तार किया और जांच को आगे बढ़ाया तो जांच देहरादून की ‘ग्रीन हर्बल’ फैक्ट्री तक पहुंची। ये वही फैक्ट्री है जिसपर पहले भी नकली दवाओं और साइकोट्रॉपिक मेडिसिन बनाने के मामले में कार्रवाई हो चुकी थी। एजेंसियों के मुताबिक फैक्ट्री मालिक ने 50 हजार रुपए प्रतिदिन किराए पर पूरा सेटअप सीरियाई नेटवर्क को दे दिया था। सूत्रों का दावा है कि यहां तैयार की जा रही ‘जिहादी ड्रग’ को दिल्ली के रास्ते विदेशों, खासकर मध्य-पूर्व देशों तक भेजा जा रहा था। कैप्टागन को ‘गरीबों का कोकीन’ भी कहा जाता है, क्योंकि इसका असर कोकीन जैसा होता है लेकिन यह उससे काफी सस्ती होती है। मध्य-पूर्व में सक्रिय आतंकी संगठनों और हथियारबंद गुटों में इसके इस्तेमाल के कई मामले सामने आ चुके हैं। जांच एजेंसियों को सहसपुर फैक्ट्री से 515 ग्राम कैप्टागन भी मिली है, जो कमर्शियल लिमिट से 25 गुना ज्यादा बताई जा रही है। दिल्ली से शुरू हुई जांच, देहरादून तक ऐसे पहुंची टीम पूरे ऑपरेशन की शुरुआत विदेशी ड्रग एनफोर्समेंट एजेंसी से मिली खुफिया सूचना से हुई थी। इनपुट मिला कि भारत के जरिए मध्य-पूर्व, खासकर सऊदी अरब में कैप्टागन भेजी जा रही है। इसके बाद NCB ने दिल्ली के नेब सराय इलाके में एक मकान को निगरानी में लिया। 11 मई को जब टीम ने वहां छापा मारा तो चपाती कटिंग मशीन के भीतर छिपाकर रखी गई 31.5 किलोग्राम कैप्टागन टैबलेट बरामद हुई। पूछताछ में पकड़े गए सीरियाई नागरिक अलाब्रास अहमद ने कई अहम जानकारियां दीं। एजेंसी को यहीं से पता चला कि सिर्फ सप्लाई नहीं, बल्कि ड्रग की मैन्युफैक्चरिंग भी भारत में हो रही थी। जांच की दिशा बदली और टीम देहरादून पहुंच गई। इसी पूछताछ और डिजिटल ट्रेल से एजेंसियों को सहसपुर स्थित ‘ग्रीन हर्बल’ फैक्ट्री के बारे में जानकारी मिली। जब NCB की टीम ने वहां छापा मारा तो अंदर का सेटअप देखकर अधिकारी भी चौंक गए। आयुर्वेदिक बोर्ड के पीछे चल रही थी ड्रग लैब फैक्ट्री के बाहर आयुर्वेद और हर्बल उत्पादों का बोर्ड लगा था, लेकिन अंदर पूरी टैबलेट मैन्युफैक्चरिंग यूनिट सक्रिय थी। जांच में सामने आया कि जिस मशीनरी का इस्तेमाल पहले ट्रामाडोल और नकली दवाएं बनाने में हो रहा था, उसी का इस्तेमाल अब कैप्टागन तैयार करने में किया जा रहा था। एनसीबी देहरादून के क्षेत्रीय निदेशक देव आनंद के मुताबिक फैक्ट्री में टैबलेट मेकिंग, ग्रेनुलेशन और ब्लिस्टर पैकेजिंग की पूरी व्यवस्था मौजूद थी। ड्रग तस्करों को यहां तैयार सेटअप मिल गया था, इसलिए उन्हें नई लैब लगाने की जरूरत ही नहीं पड़ी। जांच एजेंसियों का मानना है कि सीरियाई नेटवर्क के पास फॉर्मूला और केमिकल नॉलेज पहले से थी। उन्हें सिर्फ ऐसी जगह चाहिए थी, जहां बिना शक के बड़े पैमाने पर टैबलेट तैयार की जा सकें। 50 हजार रोज के लालच में सौंप दी फैक्ट्री पूछताछ में सामने आया कि फैक्ट्री मालिक ने महज 50 हजार रुपए प्रतिदिन किराये के लालच में पूरा सेटअप विदेशियों को उपलब्ध करा दिया। उसने यह जानने की कोशिश तक नहीं की कि आखिर वहां किस तरह की दवा या ड्रग बनाई जा रही है। जांच एजेंसियों के अनुसार यह कोई छोटी यूनिट नहीं थी। यहां व्यवस्थित तरीके से ड्रग को टैबलेट फॉर्म में तैयार किया जा रहा था, ताकि उसे आसानी से अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क के जरिए भेजा जा सके। माना जा रहा है कि दिल्ली से बरामद खेप भी यहीं तैयार हुई थी। 2024 की कार्रवाई के बाद भी नहीं टूटा नेटवर्क सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस फैक्ट्री पर पहले ही कार्रवाई हो चुकी थी, वहां दोबारा इतना बड़ा नेटवर्क कैसे खड़ा हो गया। दरअसल 6 दिसंबर 2024 को देहरादून पुलिस और खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) की संयुक्त टीम ने इसी फैक्ट्री पर छापा मारा था। उस समय यहां ट्रामाडोल समेत साइकोट्रॉपिक दवाओं का अवैध स्टॉक मिला था। फैक्ट्री को सील कर मालिक को NDPS एक्ट के तहत जेल भेजा गया था। लेकिन कुछ ही महीनों बाद फैक्ट्री मालिक को जमानत मिल गई। उसने कानूनी प्रक्रिया के जरिए फैक्ट्री की सील भी खुलवा ली। यहीं से सिस्टम की सबसे बड़ी चूक सामने आती है। सील खुलने के बाद न तो लोकल पुलिस ने निगरानी की और न ही संबंधित विभागों ने जाकर दोबारा फिजिकल वेरिफिकेशन किया कि वहां क्या चल रहा है। NCB अधिकारियों का मानना है कि इसी प्रशासनिक ढील का फायदा उठाकर फैक्ट्री मालिक ने अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क से हाथ मिला लिया। आखिर देहरादून को ही क्यों चुना गया जांच एजेंसियों के मुताबिक इसके पीछे कई वजहें थीं। पहली वजह उत्तराखंड का फार्मा नेटवर्क है। देहरादून, हरिद्वार और रुड़की लंबे समय से फार्मा और केमिकल गतिविधियों के बड़े केंद्र माने जाते हैं। यहां दवा उद्योग से जुड़े केमिकल और कच्चे माल की आवाजाही सामान्य बात है। ऐसे में संदिग्ध रसायनों की खरीद आसानी से छिपाई जा सकती थी। दूसरी वजह तैयार मशीनरी थी। दिल्ली जैसे बड़े शहर में इतनी बड़ी लैब चलाना जोखिम भरा था, जबकि सहसपुर की फैक्ट्री पहले से संदिग्ध गतिविधियों में इस्तेमाल हो चुकी थी। यहां उन्हें बिना अतिरिक्त निवेश के पूरा सेटअप मिल गया। तीसरी वजह स्थानीय निगरानी की कमजोरी मानी जा रही है। एजेंसियों का कहना है कि फैक्ट्री मालिक पहले से रडार पर होने के बावजूद दोबारा उसी परिसर में गतिविधियां शुरू कर सका। इससे साफ है कि लोकल इंटेलिजेंस और बीट पुलिसिंग पूरी तरह फेल रही। वीजा खत्म होने के बाद भी भारत में था सीरियाई मास्टरमाइंड जांच में यह भी सामने आया कि गिरफ्तार सीरियाई नागरिक नवंबर 2024 में टूरिस्ट वीजा पर भारत आया था। उसका वीजा दिसंबर में खत्म हो गया था, लेकिन वह भारत में ही रुका रहा। सूत्रों के मुताबिक इसी दौरान उसकी मुलाकात देहरादून के फैक्ट्री मालिक से हुई। एजेंसियों को शक है कि एक तरफ फैक्ट्री मालिक ने बेल मिलने के बाद अपना पुराना सेटअप दोबारा सक्रिय किया, वहीं दूसरी तरफ सीरियाई नेटवर्क ने वहां ड्रग निर्माण शुरू कर दिया। धीरे-धीरे यह यूनिट अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चैन का हिस्सा बन गई। मुंद्रा पोर्ट तक पहुंचा नेटवर्क दिल्ली और देहरादून कनेक्शन सामने आने के बाद NCB ने गुजरात के मुंद्रा पोर्ट पर भी कार्रवाई की। 14 मई को कंटेनर फैसिलिटेशन स्टेशन में एक संदिग्ध कंटेनर की जांच हुई। दस्तावेजों में इसे ‘भेड़ की ऊन’ से भरा बताया गया था, लेकिन अंदर से 196.2 किलोग्राम कैप्टागन पाउडर बरामद हुआ। एजेंसियों का मानना है कि यह पूरा नेटवर्क भारत को ट्रांजिट हब की तरह इस्तेमाल करना चाहता था। ड्रग यहां तैयार होती, फिर कंटेनर और कार्गो रूट्स के जरिए उसे मध्य-पूर्व भेजा जाता। कमर्शियल लिमिट से 25 गुना ज्यादा बरामदगी NCB के मुताबिक कैप्टागन की कमर्शियल क्वांटिटी 20 ग्राम मानी जाती है। लेकिन सहसपुर फैक्ट्री से करीब 515 ग्राम पाउडर और टैबलेट बरामद हुई, जो कमर्शियल लिमिट से 25 गुना ज्यादा है। इसके अलावा दिल्ली में पकड़ी गई भारी खेप को भी इसी फैक्ट्री से जोड़कर देखा जा रहा है। जांच एजेंसियों का कहना है कि ड्रग तैयार करने में इस्तेमाल किए गए केमिकल और मिश्रण बेहद सटीक तरीके से तैयार किए गए थे। इससे साफ है कि नेटवर्क में प्रशिक्षित लोग शामिल थे। अब सिस्टम पर उठ रहे सवाल पूरे मामले ने उत्तराखंड के प्रशासनिक तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस फैक्ट्री पर पहले कार्रवाई हो चुकी थी, वहां दोबारा अंतरराष्ट्रीय ड्रग लैब चलती रही और किसी विभाग को भनक तक नहीं लगी। अब जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि इस नेटवर्क से और कौन लोग जुड़े थे, किसके जरिए केमिकल मंगाए जा रहे थे और क्या भारत के अन्य राज्यों में भी ऐसी यूनिटें सक्रिय हैं। फिलहाल NCB हवाला नेटवर्क, विदेशी रिसीवर और फंडिंग चैन की भी जांच कर रही है।



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