एन. रघुरामन का कॉलम:  एआई आज भी आर्टिफिशियल ही है! इसलिए रियल इंटेलिजेंस की जरूरत है
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एन. रघुरामन का कॉलम: एआई आज भी आर्टिफिशियल ही है! इसलिए रियल इंटेलिजेंस की जरूरत है

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7 घंटे पहले

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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

मैं दो लोगों को जानता हूं- एक जिन्होंने इस मार्च में एआई की मदद से यूरोप और यूएस की पूरी ट्रिप प्लान की। दूसरी उनकी बेटी, जिसने हाल ही में 12वीं की परीक्षा दी और एआई की मदद से ही कॉलेज एडमिशन की योजना बनाई।

जाहिर है, अलग-अलग विकल्प देने के मामले में यह टेक्नोलॉजी किसी भी ट्रैवल एजेंट या काउंसलर से ज्यादा तेज थी। इतनी तेजी से और इतने ज्यादा विकल्प देख कर दोनों इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने एआई के अंतिम सुझावों को ही मानने का निर्णय कर लिया।

कोर्स और कॉलेजों का चयन कर दोनों ट्रिप पर निकल गए और उन्हें पहला झटका तब लगा, जब वर्ल्ड ट्रेड सेंटर स्टेशन पर उनकी ट्रेन मिस हो गई। डब्ल्यूटीसी स्टेशन असल में एक ट्रांसपोर्टेशन हब है, जहां से न्यू जर्सी और मैसाचुसेट्स जैसे राज्यों के लिए सीधी ट्रेनें मिलती हैं। इन्हें पाथ ट्रेनें कहते हैं।

बेटी ने अपने टिकट्स दोबारा चेक नहीं किए थे, इसलिए न सिर्फ उसकी ट्रेन छूटी, बल्कि उसका कनेक्टिंग स्टेशन भी अलग था। एआई ट्रैवल प्लानिंग को लेकर चौतरफा शोर के बीच वह चाहती थी कि अपनी पूरी ट्रिप के लिए एआई के अलावा कहीं और रिसर्च न करे।

उसकी सबसे बड़ी गलती यह थी कि उसने यह प्रयोग ऐसी जगह के लिए किया, जहां वो पहले कभी नहीं गई। ट्रेन छूटने के बाद जब उसने मुझे स्टेशन से कॉल किया तो मुझे समझ आया कि वो गलत जगह पर खड़ी थी।

इससे पहले, उसने होटल भी पैदल जाने का फैसला किया, क्योंकि एआई ने बताया कि टैक्सी महंगी पड़ेगी और होटल सिर्फ 600 मीटर के वॉकिंग डिस्टेंट पर है। लेकिन एआई को यह नहीं पता था कि उस दिन भारी बारिश होने वाली है और भारतीय महज दो सूटकेस ही नहीं, हैंडबैग और लैपटॉप भी साथ रखते हैं। तेज बारिश में सामान लेकर चलते हुए दोनों बुरी तरह भीग गए, जिससे अगले दो दिन उन्हें बुखार रहा और साइटसीइंग के लिए समय ही नहीं मिला।

तब जाकर उन्हें एहसास हुआ कि बेटी के एआई-संचालित कॉलेज एडमिशन काउंसलर की सलाह भी यूएस में कॉलेज चुनने में गलत हो सकती है। फिर उन्होंने पैसे खर्च करके इंसानी सलाह लेने का निर्णय किया।

कॉलेज में प्रवेश के इच्छुक छात्रों को बेहतर गाइडेंस तब मिलती है, जब उसमें इंसान शामिल होता है। क्योंकि काउंसलर बॉट्स की जानकारी को फिल्टर कर छात्रों को सलाह देता है। खासकर, जब उन्हें आवेदन भरने के लिए स्पष्टता की जरूरत होती है।

स्कूलों में एआई के इस्तेमाल के समर्थक रह चुके मैसाचुसेट्स स्कूल काउंसलर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष अली रोबिडॉक्स भी मानते हैं कि छात्रों पर काउंसलर्स का जो प्रभाव होता है, टेक्नोलॉजी उसकी बराबरी नहीं करती।

ऐसा इसलिए, क्योंकि इंसान जानता है कि उनकी निजी जीवन की बारीकियों को कैसे समझा जाए। जबकि चैटबॉट सिर्फ छात्रों के अंक औसत देखता है और उन्हें उस देश में ज्यादा कॉम्पीटिटिव कॉलेजों में आवेदन करने के प्रति हतोत्साहित कर सकता है।

चैटबॉट्स ऐसे छात्रों की क्षमताओं का आकलन नहीं कर सकते, जो संभवत: घर में किसी के निधन के कारण कुछ अंकों से चूक गए हों। एक काउंसलर के अनुसार ‘चूंकि एआई आपको तो जानते नहीं हैं, इसलिए वो सिर्फ आपको वही बताते हैं, जो पब्लिक डोमेन में है।’

चैटबॉट्स को बनाने वाली कंपनियां भी इससे सहमत हैं कि ग्रेजुएशन के लिए सही कॉलेज चुनने की प्रक्रिया में विद्यार्थियों को वयस्कों की सलाह जरूरी होती है। हाई स्कूल छात्रों को कॉलेज जाने में मदद के लिए एआई का इस्तेमाल करने वाले प्लेटफॉर्म ‘मेनस्टे’ के फाउंडर एंड्रयू मैग्लियोज्जी कहते हैं कि ‘इस प्रक्रिया में इंसानों का शामिल होना बहुत जरूरी है। क्योंकि एआई अभी भी विकसित हो रहा है।’

फंडा यह है कि हम स्पीड और ऑथेंटिसिटी के बीच फंसकर सोचने लगते हैं कि एआई हमसे बेहतर है। फिलहाल एआई के इस्तेमाल का सबसे सही तरीका यही है कि उसकी स्पीड का फायदा लें और फिर अनुभवी इंसानों से कहें कि वह इस जानकारी का विश्लेषण अपनी बुद्धि से करें।

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