7 घंटे पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु
लखनऊ के गुडम्बा क्षेत्र के बेहटा गांव में रविवार दोपहर एक घर में चल रही पटाखा फैक्ट्री में जबरदस्त विस्फोट हुआ, जिसमें एक दंपति की मौत हो गई। कम से कम पांच अन्य घायल हुए, जिनमें से दो 70% तक झुलस गए। विस्फोट इतना भीषण था कि आसपास की पांच इमारतें ढह गईं, जिनमें से दो मलबे में बदल गईं।
विस्फोट की आवाज दो किमी तक सुनाई दी। क्या नगर पालिका और पड़ोसियों के लिए आवासीय कॉलोनी में चल रही पटाखा फैक्ट्री खोजना रॉकेट साइंस है? कतई नहीं। लेकिन हमारा रवैया है ‘कुछ नहीं होगा।’ इसी लापरवाही के कारण अखबारों में बड़ी-बड़ी खबरें आती हैं कि ‘गलत प्रबंधन से हुआ विस्फोट’ और ‘दीवारें थर्रा उठीं, सेकंडों में गलियां ढेर हुईं।’
इसी प्रकार, भारत के 54 निजी और सरकारी अस्पतालों और 200 आईसीयू में 7 साल हुए अध्ययन में पाया गया कि सेंट्रल लाइन्स कही जाने वाली ट्यूब्स को शरीर की नसों में डालने के कुप्रबंधन से गंभीर रक्त संक्रमण के 8600 से अधिक मामले सामने आए।
ये छोटी-छोटी ट्यूब होती हैं, जिन्हें दवाएं, फ्लुड्स और पोषण को रक्त में पहुुंचाने के लिए गर्दन, छाती और कमर की बड़ी नसों में डाला जाता है। ‘लांसेट’ में प्रकाशित अध्ययन में कहा गया है कि इस संक्रमण के कारण नवजात शिशु सर्वाधिक जोखिम में है।
सेंट्रल लाइन संक्रमण से पीड़ित कम से कम 40% मरीजों की दो सप्ताह में मृत्यु हो जाती है। संक्रमण की दर है : 1 हजार सेंट्रल लाइन दिवसों में 8.83 सेंट्रल लाइन संक्रमण। यानी, सेंट्रल लाइन उपयोग के प्रत्येक 1 हजार दिनों में 9 संक्रमण।
अस्पताल के बिस्तरों तक ये संक्रमण कैसे पहुंचे? अध्ययन में बताए दो प्रमुख कारणों में से एक है दूषित हाथ, उपकरण और दवाएं। दिलचस्प यह है कि एसिनेटोबैक्टर बाउमनी बैक्टीरिया से संक्रमित करीब 87 प्रतिशत नमूने सबसे प्रभावी एंटीबायोटिक के प्रति भी प्रतिरोधक थे।
यह बैक्टीरिया मिट्टी और पानी में पाया जाता है और अस्पताल के वातावरण में लंबे समय जीवित रह सकता है। अब मेरा सवाल है कि कीटाणुरहित वातावरण में प्रवेश से पहले हम अपने हाथों, दवाओं और उपकरणों को कितना ‘स्टरलाइज’ करते हैं?
तीसरा क्षेत्र है- खाद्य प्रबंधन। हालांकि, खाद्य प्रबंधन के तरीके अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन भारत में इसको लेकर बड़े पैमाने पर समस्याओं के प्रमाण हैं। ये समस्याएं बड़ी संख्या में खाद्य जनित बीमारियों और मौतों का कारण बनती हैं। इनमें खराब स्वच्छता, कर्मचारी प्रशिक्षण की कमी, अपर्याप्त बुनियादी ढांचा और खाद्य सुरक्षा प्राधिकारियों का अपर्याप्त कार्य शामिल हैं।
खाने-पीने की दुकानों पर हुए अध्ययनों में निराशाजनक परिणाम आए हैं। 2021 के एक अध्ययन में बताया गया कि भारत में हर साल खाद्यजनित बीमारियों के करीब 10 करोड़ प्रकोप होते हैं। शोधकर्ताओं का अनुमान है कि यदि मौजूदा मानक ही जारी रहे तो 2030 तक यह आंकड़ा 15 करोड़ तक पहुंच सकता है।
भारत की एक छोटी आबादी ही स्टार श्रेणी के होटलों में खाना खाती है, जहां खाद्य प्रबंधन को प्राथमिकता दी जाती है। बड़ी आबादी छोटी और असंगठित क्षेत्र की दुकानों पर खाती है। मैंने कई बार देखा है कि देशभर में कुछ पुलिसकर्मी और कुछ अधिकारी इन दुकानों से रिश्वत लेते हैं, लेकिन एक भी अधिकारी उनके यहां खाद्य सुरक्षा की जांच नहीं करता।
दूसरी ओर, मंदिरों जैसी बड़ी सार्वजनिक रसोइयों के उदाहरण हैं, जहां भगवान को चढ़ाए जाने वाला प्रसाद बनाते समय उच्चस्तरीय स्वच्छता और खाद्य सुरक्षा अपनाई जाती है। वे खाद्य प्रबंधन समस्याओं के विपरीत एक सकारात्मक उदाहरण हैं।
इन उदाहरणों से हमें क्या पता चलता है? देश में कानूनों की कमी नहीं है। बुनियादी नागरिक एमेनिटीज, स्वास्थ्य और सुविधाएं प्रदान करने वाले लोगों और आतिथ्य व्यवसाय में शामिल लोगों के लिए स्थापित दिशा-निर्देश मौजूद हैं। लेकिन सबसे बड़ी चिंता निगरानी एजेंसियों के भीतर और उनके द्वारा इन्हें लागू करने और इनका पालन कराने की है।
फंडा यह है कि मानक संचालन प्रक्रिया (स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसिजर या एसओपी) का अभाव किसी भी प्रकार के व्यवसाय की नींव हिला सकता है। समाज के व्यापक हित में व्यवसाय मालिकों और स्थानीय निकायों द्वारा इस एसओपी को अपनाए जाने की जरूरत है।








