42 मिनट पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु
लक्ष्मीनारायण को अरबी फ्राई पसंद है और मुथुरामन को पत्तागोभी, यह कहते हुए मेरी मां खूब सारा अरबी धोकर कुकर में डाल देतीं और आंच तेज कर देतीं ताकि यह सख्त सब्जी जल्दी पक जाए। इस बीच वे जल्दी से धुली हुई पत्तागोभी को काटकर अलग से पानी में उबाल लेतीं। अरबी के छिलके उतारने के लिए मेरी बहन की मदद लेने के बाद वे ताजा नारियल छीलना शुरू कर देतीं।
वे मुझे अरबी को केरल वाले आलू के चिप्स की तरह काटने के लिए कहतीं। फिर ये दोनों सब्जियां दो अलग-अलग कढ़ाई में चली जातीं। उबली हुई पत्तागोभी को लाल सूखी मिर्च और ढेर सारी चना दाल (पहले से गरम पानी में भिगोई हुई) के साथ तड़का दिया जाता और कढ़ाई में डालने से पहले धीमी आंच पर पकाया जाता। अरबी पर सब तरफ से मसाला लगाने के बाद उन्हें बहुत कम तेल में मद्धम आंच पर भूना जाता। फिर कड़ाही में गोभी को चलाते हुए ऊपर से नारियल बुरककर डालते।
लेकिन उस दिन ये दोनों सब्जियां हमारे खाने का हिस्सा नहीं होती थीं। यह सब इसलिए किया गया था, क्योंकि मेरे उपरोक्त दो दोस्त हमें बिना बताए भोजन के लिए चले आए थे। इस तरह से किसी के भी चले आने पर मां कभी मुंह नहीं बनातीं। वे घर आने वालों के चेहरों को पढ़कर बता देतीं कि उन्हें कितनी भूख लगी है और उनकी पसंद का खाना बनाने की कोशिश करतीं।
वे हर किसी की पसंद को याद रखती थीं और उसी के अनुसार खाना बनाती थीं। बताने की जरूरत नहीं कि मेरे दोस्त उन सब्जियों को चाव से खाते, डकार लेते और चले जाते, और अगर मैं उनके हिस्से का खा लेता तो मुझसे झगड़ा करते।
वैसे तो पूरा भोजन ही स्वादिष्ट होता था, लेकिन ये दोनों दोस्त अगले कुछ महीनों तक कॉलेज में अरबी और गोभी- इन दो “अतिरिक्त’ सब्जियों की तारीफ करते रहते, जब तक कि वे अगली बार मेरे घर नहीं आ जाते। मां की मृत्यु के 30 साल बाद भी उन्हें उन सब्जियों का स्वाद ठीक उसी तरह से याद है, जैसे उन्होंने उन्हें कल रात खाया हो।
मुझे यह कहानी शनिवार को तब याद हो आई, जब मैं भिलाई में रूंगटा इंटरनेशनल स्किल्स यूनिवर्सिटी द्वारा आयोजित एचआर कॉन्क्लेव को संबोधित कर रहा था। 20 से अधिक एमएनसी के एचआर अधिकारी वहां गोलमेज सम्मेलन में शामिल हुए थे।
मैंने अपना संबोधन यह कहते शुरू किया कि अपने बारे में कुछ बताइए। मुझे नहीं पता कि यह सवाल कितना पुराना है। लेकिन ये वो सवाल है, जो किसी भी कंपनी में ज्यादातर इच्छुक उम्मीदवारों की किस्मत तय करता है। यहां बैठे इन एचआर प्रमुखों से पूछिए। वे इस सवाल को बार-बार पूछने में कभी शर्म महसूस नहीं करते।
ऐसा इसलिए, क्योंकि यह एक से दो मिनट की छोटी-सी अवधि उम्मीदवार के आत्मविश्वास, भाषा-शैली, हास्यबोध, सतर्कता, कहानी सुनाने की क्षमता और देहभाषा से परिचित कराती है। आप सभी को मेरी सलाह है कि इंटरव्यू खत्म होने तक रिज्यूमे में लिखी की गई जानकारी के अलावा भी अपने पास अपने बारे में कुछ “अतिरिक्त’ रखें।
इसने मुझे एक फरसाण स्टोर की याद दिलाई, जिसके बुजुर्ग संस्थापक जब कैश काउंटर पर बैठते थे, तब उनकी बिक्री बहुत अच्छी चल रही थी और जब उनका एमबीए की पढ़ाई कर रहा बेटा उसी जगह पर बैठा, तो बिक्री में भारी गिरावट आई। वे हैरान थे कि ऐसा क्यों हो रहा है।
अंत में पता चला कि ग्राहकों को यह बात बहुत अच्छी लगती थी कि बुजुर्ग प्लास्टिक बैग को सील करने से पहले फरसाण का एक “अतिरिक्त’ बड़ा टुकड़ा उसमें डाल देते थे, जबकि एमबीए की पढ़ाई कर रहा बेटा वजन के बराबर ही तौलता था। उस ‘अतिरिक्त’ से ही ग्राहकों और दुकान के बीच एक रिश्ता बन गया था। यह कुछ ऐसा ही था, जो अतीत के दिनों में दूधवाले किया करते थे।
फंडा यह है कि आप युवाओं को ज्ञान, कहानियां, भोजन, साक्षात्कार के दौरान आत्म-गौरव से लेकर शुभकामनाएं तक कुछ भी दे सकते हैं, लेकिन दुनिया हमेशा उस ‘अतिरिक्त’ चीज की कद्र करती है, जो आप इस प्रक्रिया में देते हैं। और हां, आपकी मानवता की भी।








