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12 घंटे पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु
83 वर्ष के रिटायर बैंकर मर्विन मार्कस के पास इन दिनों एक नया मित्र है। और वर्तमान में इस नए मित्र की मित्रता महज 23 लोगों के साथ ही है। इसका नाम है ‘मीला’, यह ऐसा ही है जैसा आपने पहले ‘एलेक्सा’ सुना था।
यह नया दोस्त फिलहाल पायलट तौर पर अध्ययन के लिए अमेरिका में वरिष्ठजनों के सामुदायिक आवास के निवासियों के साथ है। मीला अकेले रहने वाले लोगों के साथ चैट करने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से संचालित एक साथी है, जिसका प्राथमिक उद्देश्य यूजर्स के मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाना है।
अत: यह ना सिर्फ एक ऐसी साथी है, जिससे आप जब चाहो, जिस विषय पर चाहो बात कर सकते हो, बल्कि बेहद सहानुभूतिपूर्ण भी है। यदि आप किसी बात पर हताश हो तो मीला पीछे से कहेगी कि ‘यह समझ आता है’।
वहां से कुछ सौ किलोमीटर दूर कनाडा में 57 वर्षीय ब्रेन फर्नांडीज ‘को-हाउसिंग सिस्टम’ बनाकर संयुक्त परिवार प्रणाली को दोहराने की योजना बना रहे हैं, जहां भिन्न पृष्ठभूमि के लोग साथ रहें व देखें कि मिलकर कितने बेहतर तरीके से उम्रदराज हो सकते हैं। उन्होंने बचपन भारत में, खासकर संयुक्त परिवार में बिताया।
वो सिंगल हैं, संतान नहीं है, इसलिए चाहते हैं कि उनके जैसे लोग ओंटेरियो में उनकी 17 एकड़ की संपत्ति में रहें, जो उन्होंने खासकर एलजीबीटीक्यू वर्ग के 40 वरिष्ठजनों के लिए तय की है। वरिष्ठजनों के लिए दीर्घकालिक देखभाल सुविधा में लंबे समय काम के दौरान फर्नांडीज ने देखा कि उनसे मिलने कभी कोई नहीं आता, इसलिए उन्हें इस समुदाय के बुजुर्गों की चिंता थी।
सोशल एपिडेमियोलॉजिस्ट, जो ये स्टडी करते हैं कि सामाजिक कारक कैसे लोगों की हेल्थ पर असर डालते हैं और सामाजिक-आर्थिक स्तर, नस्ल, लिंग, पड़ोस का वातावरण, सोशल नेटवर्क, सामाजिक नीतियों का कैसा असर पड़ा है। उनका कहना है कि लोग तब सबसे अच्छा महसूस करते हैं, जब वो ऐसे सामाजिक मेलमिलाप में रहें, जहां उन्हें स्वच्छंदता भी मिले।
मुझे नहीं लगता, इसे समझने के लिए ‘सोशल एपिडेमियोलॉजिस्ट’ जैसे आकर्षक नाम की जरूरत है। हमारे पूर्वजों ने पहले ही ऐसा कुछ बनाया, जिसे हम संयुक्त परिवार कहते हैं। जब परिवार में ज्यादा बच्चे होते थे तो एक परिजन सभी के टूथब्रश पर मटर के दाने बराबर टूथपेस्ट रखता और निगरानी भी करता कि सभी प्रतिदिन नहाकर, साफ कपड़े पहनें। जब परिवार में बहुत से बुजुर्ग होते तो बीच की उम्र का एक सदस्य (पुरुष या महिला) वो सारे काम सुनिश्चित करता जो बच्चों के लिए थे।
संयुक्त परिवारों में बुजुर्ग सामाजिक मेलजोल में रहते हैं, उन्हें ये भरोसा दिलाया जाता है कि उनकी मर्जी व जरूरतों का ख्याल रखा जाएगा। जब मैंने कमाना शुरू किया तो परिवार में बच्चों को मेरी गिफ्ट बॉम्बे (अब मुम्बई) के विले पार्ले से लाए पार्ले के ब्रोकन ग्लूकोज बिस्किट होते थे और नानाजी के लिए कुछ किलो किस्मी टॉफी होती थीं, जिसे वो गाल में दबाकर मिनटों चूसा करते थे।
आज कुछ लोग कह सकते हैं, ‘देखो, कैसे बच्चे जैसे कैंडी चूस रहे हैं’, पर तब हमें उनका बच्चों जैसा व्यवहार और बिना दांतों की मुस्कान बहुत पसंद थी। उन्हें कभी भी डायबिटीज नहीं हुई, क्योंकि वो मंदिर में परिक्रमा करते रहते थे, चलते रहते थे, ताकि अगले जन्म के लिए पुण्य कमा सकें, यदि ऐसा कुछ होता है तो।
घर में कुछ बच्चे उन्हें मंदिर ले जाते और जब नानी कहतीं कि ‘नाना को ले आओ, खाना तैयार है, वो वहां मंदिर में ऐसे बैठे हैं, मानो भगवान ही उनके लिए खाना बनाने जा रहा है।’ तो बच्चे उन्हें लेने जाते थे। इस बात में हताशा नहीं थी।
क्योंकि दोनों ने वही चुना जो उन्हें अच्छा लगता था, नाना ने मंदिर चुना और नानी ने रसोई। मंदिर से लौटते हुए वो कहानियां, ऑफिस के पुराने किस्से सुनाते, फिर भले ही उस उम्र में वह हमारे समझ नहीं आते हों। लेकिन नानाजी जानते थे कि उनका अनुभव तीसरी पीढ़ी को दिया जा रहा था।
फंडा यह है कि अकेलापन नि:संदेह दुनिया की सबसे बड़ी बीमारी है। एआई और ‘को-हाउसिंग सिस्टम’ हमारी उस संयुक्त परिवार संस्कृति के आसपास भी नहीं आ सकता, जैसी बुजुर्गों ने अपनाई थी। आपको नहीं लगता कि हमें हमारी जड़ों की ओर लौटना चाहिए और इसे अपनाना चाहिए?








