एन. रघुरामन का कॉलम:  दूसरों की मदद करने का सिलसिला समाज को बेहतरी की ओर ले जाता है
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एन. रघुरामन का कॉलम: दूसरों की मदद करने का सिलसिला समाज को बेहतरी की ओर ले जाता है

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7 घंटे पहले

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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

‘तीन दिन बाद आज मैंने धूप देखी है’- चेन्नई में रहने वाले मेरे अंकल ने गुरुवार को फोन पर मुझसे यह बात कही। साइक्लोन दितवाह के कारण चेन्नई में अंधेरा छाया हुआ था। मेरी आंटी अपनी बेटी के घर चली गईं और वे घर पर बैचलर जैसा जीवन जी रहे हैं। चूंकि मैं जानता हूं कि ज्यादातर रिटायर्ड लोगों की तरह वह भी रोज अपने नियमित सब्जीवाले से ही हरी सब्जियां खरीदते हैं, तो मैंने पूछा कि खाने का इंतजाम कैसे कर रहे हो?

उन्होंने बताया कि ‘मैंने कुछ रसम और चावल बना लिए, जिसमें ताजी सब्जियों की जरूरत नहीं होती और पापड़ के साथ खा लिया।’ उन्होंने कहा कि ‘कमर तक पानी से भरी सड़क पर भला कौन चलेगा?’ चूंकि उन्हें पता था कि पूरे कॉलोनी में कोई बाहर नहीं निकला होगा, तो उन्होंने दोनों दिन अपने दो सब्जीवालों को 100-100 रुपए यूपीआई किए, ताकि वे अपने परिवार का गुजारा चला सकें।

इस घटना ने मुझे उन स्ट्रीट वर्कर्स के बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया, जो एक दिन भी घर बैठकर गुजारा नहीं कर सकते। मरीना बीच की गजरा बेचने वाली वो महिलाएं, पत्तेदार सब्जियां बेचने वाले- जिनका पूरा माल सड़ गया होगा। दितवाह के कारण शहर में अनौपचारिक नौकरियां करने वाले हजारों लोगों, फुटपाथ व्यवसायियों को बिना कमाई रहना पड़ा होगा।

माल की खराबी और घंटों तक गहरे पानी में खड़े रहने की मुसीबत झेलनी पड़ी होगी। दशकों पहले जब मैंने एक गजरा बेचने वाली पर स्टोरी की थी तो पता चला कि उसकी रोज की कमाई बेटे की दवाओं पर खर्च हो जाती है।

शेष पैसा किराना, सब्जी और उन बसों के किराए में खप जाता है, जिनसे वह अस्पताल से बाजार, फिर वहां से अपने अस्थायी ठेले और फिर अंतत: घर वापस आती हैं। यदि एक दिन भी कमाई न हो, फूल सड़ जाएं या गरमी से सूख जाएं, तो उन्हें बस यात्रा के लिए संघर्ष करना पड़ेगा।

मैंने खुद 2005 में ये अनुभव किया था, जब मेरे नियमित सब्जीवाले ने मुझसे पैसे उधार लिए थे। उन दिनों मुंबई में एक दिन में 933 मिमी बारिश हुई, जो 13 सितंबर 1974 को चेरापूंजी में 24 घंटे में हुई देश की सर्वाधिक बारिश के रिकॉर्ड 985.6 मिमी से बस थोड़ी ही कम थी। मुम्बई में पांच दिनों तक खरीदार ही नहीं थे। आज वही सब्जीवाला समाज में बेहद सम्मानजनक जिंदगी जी रहा है और अपने समुदाय के कई लोगों की मदद भी करता है।

इसी तरह, एक पत्रकार के तौर पर मुंबई दंगों और बम धमाकों को कवर करते वक्त मैंने देखा कि कई स्ट्रीट वेंडर्स दो वक्त की रोजी-रोटी जुटाने के लिए जूझ रहे थे। और मुंबई की छोटी से छोटी गलियों में ऐसे मेहनतकश लोगों की भरमार है, जो काम के बगैर एक दिन भी गुजारा नहीं चला सकते। उनके लिए हर दिन, हर सौदा मायने रखता है। और उनकी सहायता वहीं रहने वाले लोगों ने की थी।

इसने मुझे यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की याद दिलाई, जिन्होंने बुधवार को कहा कि छोटी-सी सहायता से भी दिव्यांग उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल कर सकते हैं। भले इस बयान का दक्षिण के साइक्लोन से लेना-देना नहीं है, लेकिन राजा जनक को आत्मबोध का ज्ञान देने वाले ऋषि अष्टावक्र और मध्यकालीन संत सूरदास से यह कहीं ना कहीं मेल खाता है, जिनके उदाहरण योगी ने दिए थे। योगी ने कहा कि ‘थोड़े से समर्थन से ही दिव्यांग लोग ऐसा उल्लेखनीय काम कर दिखाते हैं, जिसे कई लोग असंभव मानते हैं।’ और वे सही थे।

हमारे देश में हजारों लोगों के लिए अपने परिवार को बेहतर खाना दे पाना असंभव हो गया है। खासकर, जब वे मौसम का कहर झेलते हैं। तभी हमें आगे बढ़कर इन मुश्किल दिनों को काटने के लिए उनकी सहायता करनी चाहिए। जरूरी नहीं कि यह सहायता हमेशा दी जाती रहे।

फंडा यह है कि समाज में सम्मानजनक जीवन जीने के लिए किसी को बस थोड़ा-सा सहारा दीजिए। फिर देखिए कि कुछ ही दिनों में वे कैसे न सिर्फ सिर ऊंचा करके चलेंगे, बल्कि भविष्य में जरूरतमंदों की मदद के लिए मजबूत भी हो जाएंगे।

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