एन. रघुरामन का कॉलम:  दैनिक जीवन में ‘करुणा’ दिखाना हमें बेहतर इंसान बनाता है
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एन. रघुरामन का कॉलम: दैनिक जीवन में ‘करुणा’ दिखाना हमें बेहतर इंसान बनाता है

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46 मिनट पहले

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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

कोई भी उसके पास नहीं जा सकता। वह तुरंत मार कर खा जाएगा। यह उसकी प्रकृति है। टी-118 वहां बैठा था। उसने अपनी गर्दन हल्की सी उस ओर मोड़ रखी थी, जिधर से लोगों की हलचल की आवाज आ रही थी। लेकिन उसने उठकर अपने शिकार तक जाने की कोशिश नहीं की। हांफते हुए, अपने पैरों पर खड़ा होने की कोशिश करते हुए, उसने एक जलनिकाय के पास ही रुके रहने का फैसला किया।

गश्ती दल के लिए यह कुछ असामान्य था। इसीलिए उन्हें कुछ कदम आगे बढ़ने की हिम्मत मिली, लेकिन वे कई मीटर दूर ही रहे। आखिरकार, यह जंगल में एक बाघ था और कोई भी इसे लेकर खतरा मोल नहीं ले सकता।

उस दूरी से भी बाघ के घाव नजर आ रहे थे। वह खड़ा नहीं हो रहा था, क्योंकि वह शिकार करने की हालत में ही नहीं था और गश्ती दल ने तुरंत भांप लिया कि यदि घाव के संक्रमण से उसकी मौत नहीं हुई, तो भूख से हो जाएगी।

अप्रैल के अंत की बात है, हाथी पर सवार पशु चिकित्सा दल वहां पहुंचा। और उसने टी-118 को उसी स्थान पर बदतर स्थिति में पाया। उसके चेहरे व शरीर पर गहरे घाव थे। इनमें मवाद पड़ चुकी थी। पशु चिकित्सकों समेत विशेषज्ञों को इसका भी भरोसा नहीं था कि यदि वे उसे अस्पताल ले जाएंगे, तो भी वह बच पाएगा या नहीं।

इसलिए उन्होंने वहीं इलाज की योजना बनाई। ट्रेंकुलाइज करने के बाद बेहोश बाघ को उठाने में 12 लोग लगे। पहले उन्होंने घाव साफकर एंटीबायोटिक्स व एंटीइन्फ्लामेट्री दवाओं से उपचार किया, 15 दिन ओरल दवाएं दी और नियमित निगरानी रखी। और कान्हा रिजर्व में मौत के मुंह में जा रहे बाघ ने धीरे-धीरे प्रतिक्रिया देनी शुरु की।

टीम ने देखा कि बाघ धीरे-धीरे अपने पैरों पर खड़ा हो रहा था, उसकी ताकत लौट रही थी और अपने इलाके पर नियंत्रण कर रहा था। मुश्किलों से जूझते हुए, टी-118 सही हो रहा था। कुछ समय बाद जब उसने एक जंगली भैंसे का शिकार किया तो टीम ने समझ लिया कि अब उनका काम पूरा हुआ।

टीम के लिए यह किसी एक बाघ को बचाने की बात नहीं थी। यह संरक्षण के एक मॉडल को परिष्कृत और उसे मान्यता दिलाने की बात थी, जिसमें वन्यजीवों का उपचार उनके प्राकृतिक आवास में कम से कम दखल के साथ किया जाता है।

मानव जाति की यह हृदयस्पर्शी कहानी मुझे तब याद आ गई, जब मैंने हाल ही में हुए उस भीषण हादसे के बारे में सुना, जिसमें मुंबई के नजदीक, एक खतरनाक मोड़ पर तेज गति से दौड़ती लोकल ट्रेन से गिरकर चार यात्रियों की मौत हो गई थी, जबकि 10 घायल हुए थे।

हादसे ने यात्रियों में आक्रोश पैदा कर दिया और मुम्बई के हलचल भरे उपनगरीय रेल नेटवर्क पर भीड़ नियंत्रण एवं यात्री सुरक्षा की लंबे समय से चली आ रही चिंताओं को फिर हवा दे दी। पीड़ितों और स्थानीय लोगों का कहना है, ‘लोग रोजाना ट्रेनों से गिरते हैं, लेकिन इस सप्ताह चूंकि कुछ लोगों की मौत हो गई, इसलिए यह मुद्दा बन गया।

यात्री समूह नियमित तौर पर यह मांग कर रहे हैं कि ऐसी त्रासदियों की रोकथाम के लिए बुनियादी ढांचा सुधारा जाए और निरंतर सेवाएं दी जाएं। लेकिन रेलवे अधिकारियों के उदासीन रवैए के कारण ऐसी घटनाएं होती रहती हैं।’

पीड़ित और नियमित यात्री इस बात पर अचंभा कर रहे हैं कि जब कार्यकर्ताओं ने कई माह पहले ही अधिकारियों को लिखा था कि यात्री खतरनाक तरीके से ट्रेनों से लटकते रहते हैं और खासकर इस मोड़ पर खतरा है, तो क्या कारण था कि अधिकारियों ने इस ओर सुधारात्मक कदम नहीं उठाए?

और उनकी बात सही है। हम वही लोग हैं, जिन्होंने घायल बाघ की पीड़ा को महसूस किया, यानी हमारे भीतर वो ‘करुणा’ है, जो मानव जाति का सबसे बेहतर गुण है। इसी वजह से मैं अचंभे में पड़ जाता हूं कि हमारी ‘करुणा’ को तब क्या हो जाता है या ये तब कहां खो जाती है, जबकि हमें पता होता है हमारी खुद की प्रजाति रोजाना नहीं तो अधिकतर मौकों पर अपनी जान गंवा रही है, जैसा कि पीड़ित यात्रियों ने दावा किया है।

फंडा यह है कि हम सभी करुणा का महत्व समझते हैं, लेकिन हमें इसे अपनी रोजमर्रा की जिम्मेदारियों में प्रदर्शित करने की जरूरत है, खासकर तब जबकि किसी की भी जान को खतरा हो।

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