एन. रघुरामन का कॉलम:  बड़ा दिल रखने के लिए पैसा नहीं, मंशा चाहिए!
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एन. रघुरामन का कॉलम: बड़ा दिल रखने के लिए पैसा नहीं, मंशा चाहिए!

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6 घंटे पहले

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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

‘इंडिया का आखिरी होटल है। आइए, थोड़ा चाय-समोसा लीजिए, कोल्ड ड्रिंक पीजिए। अभी कार्यक्रम शुरू होने में काफी समय है।’ मैं इस जगह पर कई बार आया हूं, लेकिन ये शब्द कभी नहीं सुने। इसलिए मैं इस आवाज को लगाने वाले बख्शीश सिंह से मिलने के लिए कार से उतरा, जो अपने बड़े भाई के नाम से ‘बलजीत फूड कॉर्नर’ नामक ढाबा चलाते हैं।

मैंने चारों ओर निगाह डाली। वह झूठ नहीं बोल रहे थे। वास्तव में उनका ढाबा भारत और पाकिस्तान की सीमा को बांटने वाली जीरो माइल पर बने लोहे के विशाल गेट से पहले आखिरी था, इस गेट की सुरक्षा हमारी सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) करती है। चाय की चुस्की लेते हुए लोग, दोनों देशों को विभाजित करने वाले लोहे के दो मजबूत दरवाजों से पहले बने कड़ी सुरक्षा वाले कॉन्क्रीट के गेट देख सकते हैं।

इस शनिवार की शाम को मैं ‘सीमित हो गई’ बीटिंग रिट्रीट समारोह को देखने के लिए वाघा-अटारी सीमा पर था। पहलगाम हमले के बाद सुरक्षा कारणों से 12 दिन निलंबित रहा ये समारोह 20 मई 2025 को फिर से बहाल हुआ था।

मैं इस प्रतिष्ठित समारोह को देखना चाहता था, हालांकि इसमें अब लोहे के दरवाजे बंद ही रहते हैं और बीएसएफ तथा पाकिस्तानी रेंजरों के बीच पारंपरिक तौर पर होने वाली हाथ मिलाने की प्रक्रिया भी बंद कर दी गई है।

सीमा से 300 फीट दूर खड़े होकर बख्शीश द्वारा परोसी गई चाय का स्वाद लेते हुए मैं ग्राहकों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता देख रहा था। वह दिन में महज 2 से 3 घंटे ही व्यापार करते हैं, जब भीड़ बीटिंग रिट्रीट में देशभक्ति भरे नजारे को देखने आती है और सूर्यास्त के साथ झंडा उतरते ही वापस लौट जाती है।

वह जानते हैं यहां उन्हीं ग्राहकों के दोबारा आने की संभावना बहुत कम है। पर फिर भी अपनी सफेद दाढ़ी के पीछे चमकते दांतों वाली चौड़ी मुस्कान व सत्कार के साथ ग्राहकों को प्रभावित करने का कोई मौका वह नहीं चूकते। हालांकि उनकी यह अस्थाई दुकान, खाने की जरूरी चीजें बेचने वाली आखिरी ईटरी है, फिर भी मैंने उन्हें कोई भी सामान महंगे दामों पर बेचते हुए नहीं देखा।

ये देखकर भरोसा कितना बढ़ जाता है, जब बख्शीश का परिवार हर गिलास को चमकाने में गर्व का अनुभव करता है! चूंकि उनके ढाबे में डिस्पोजेबल गिलास का उपयोग नहीं होता, इसलिए उनका परिवार चाय के हर गिलास को बड़े धैर्य से साफ कर रहा था। यहां तक कि वह खुद पर्यटकों से कह रहे थे कि वे उनसे खरीदी पानी की खाली बोतलें यहां-वहां फेंककर गंदगी न रें।

बीएसएफ के जवान भी लोगों से गंदगी नहीं फैलाने का आग्रह कर रहे थे। यकीन मानिए बख्शीश सिंह ज्यादा कमाई नहीं कर रहे थे। उनके और उनके घरवालों के कपड़े इस बात का सुबूत थे कि वे बस गुजारा चला रहे थे, लेकिन देश के प्रति उनका प्यार और देशवासियों के प्रति भाईचारा एक अलग ही स्तर पर था।

उनके व्यापारिक कौशल में दया की एक मोटी पर्त थी, जो आम तौर पर स्वर्ण मंदिर कहे जाने वाले श्रीहरमिन्दर साहिब के ‘लंगर’ में दिखती है। जबकि गृहस्थी के गुजारे के लिए लाभ कमाने की मंशा बहुत कम दिख रही थी। ग्राहकों के पास भले ही बिल चुकाते वक्त पांच रुपए के छुट्टे नहीं हों, तब भी वह उसी मुस्कान के साथ उनको बाय बोल रहे थे।

यह देखकर मुझे देश के बड़े हवाई अड्डों पर स्थित ‘वांगो’ जैसे चमक-धमक वाले रेस्तरां याद आ गए, जिनके डिस्प्ले बोर्ड पर लिखा होता है कि वे गर्म कॉफी पीतल के गिलास में परोसते हैं, जबकि वास्तव में वे इसे प्लास्टिक के गिलास में देते हैं। जिससे फिल्टर कॉफी नुकसानदेह हो जाती है।

ग्राहकों के पास जब छुट्टे नहीं हों तो काउंटर पर बैठे कर्मचारी एक रुपया भी नहीं छोड़ते, जबकि वह जानते हैं कि उन्होंने कॉफी के लिए बेहद अजीब-सा 231 रुपए का दाम रखा है। मैंने कई बार ऐसे बुजुर्गों को वहां से नाराज होकर जाते देखा है, जो ऑनलाइन भुगतान के अभ्यस्त नहीं होते। उन बुजुर्गों के पास एक रुपया छुट्टा नहीं होता था और वह 240 रुपए देकर 9 रुपए की टिप भी नहीं देना चाहते थे।

फंडा यह है कि बड़ा दिल रखने के लिए बड़े बटुए की जरूरत नहीं। इसके लिए महज एक छोटा-सा इरादा ही काफी है।

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