एन. रघुरामन का कॉलम:  याद कीजिए उन साधारण लोगों को, जिन्होंने आपकी जिंदगी को असाधारण बनाया
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एन. रघुरामन का कॉलम: याद कीजिए उन साधारण लोगों को, जिन्होंने आपकी जिंदगी को असाधारण बनाया

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2 घंटे पहले

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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

कुछ लोगों के लिए अखबार में कभी शोकलेख नहीं छपते। वे शायद ही कभी खबरों में आते हैं। लेकिन हममें से हरेक ने किसी न किसी ऐसे व्यक्ति से जरूर मुलाकात की होगी, जिसने जिंदगी में हमारी सहायता की हो या उसे गढ़ा हो। लेकिन क्या हम उन्हें याद रखते हैं? यह विचार मेरे मन में आया, क्योंकि मैं इस सप्ताह अपनी मां का ‘श्राद्ध’ करने जा रहा हूं।

यह एक वार्षिक अनुष्ठान है, जिसे हमारे धर्म में दिवंगत आत्माओं की स्मृति में किया जाता है। इस दिन मैं विशेष रूप से समय निकालकर टाटा मेमोरियल अस्पताल, मुम्बई के उन तमाम डॉक्टरों का स्मरण करता हूं। उनमें से एक थे डॉ. आरएस राव, जिन्होंने मेरी मां को कैंसर होने के बाद भी 11 वर्षों तक जीवित रखने के लिए अथक परिश्रम किया।

मैं उनसे नियमित मिलता था और मैंने कई बार गहरे मन से उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित की है, जब तक कि 2011 में स्वयं उनका निधन नहीं हो गया। मेरी भांजी- जो मेरी ही आंखों के सामने बड़ी हुई है- के लिए तो उसके डॉक्टर सिर्फ वो डॉक्टर नहीं थे जिन्होंने उसे दूसरा जीवन दिया, बल्कि वह व्यक्ति भी थे, जिन्होंने उसे वैसा भोजन दिया, जिसके बारे में वह मानती है कि उसी ने उसे पोषित किया और एक मनुष्य के रूप में गढ़ा। उसकी दिलचस्प स्मृति-कथा इस प्रकार है।

तमिलनाडु में हमारे गांव वाले घर में दो प्रवेश द्वार थे। हमारे बड़े संयुक्त परिवार की मदद करने वाले सभी कामगार पीछे के दरवाजे से ही भीतर आते थे- नारियल के पेड़ों से फल उतारने वाले हों या खाने और पूजा के लिए केले के पत्ते काटने वाले। लेकिन उन कामगारों में एक व्यक्ति बहुत खास था।

वह सूखी टहनियों से एक छोटा-सा चूल्हा जलाता और उस पर पानी से भरा एल्युमिनियम का बर्तन रख देता। फिर वह पास की दुकान से एक अंडा लाता और उसे उबलते पानी में डाल देता। अंडा उबालकर छीलने के बाद वह जोर से आवाज लगाता- अम्मा, बच्ची को ले आओ।

मेरी नानी मेरे मामा की बेटी को गोद में लेकर आती थीं, जो गंभीर बीमारी के कारण बेहद कमजोर हो गई थी और जिसके भोजन में अंडा शामिल करने की सलाह दी गई थी। उस उम्र में भी बूढ़ी नानी बगीचे में बैठ जातीं, मेरी नन्ही-सी भांजी को कहानियां सुनाते हुए उसे अंडा खिलाने लगतीं। जबकि हमारा घर कई वर्षों तक ऐसा स्थान रहा था, जहां प्याज तक का इस्तेमाल नहीं होता था। यही गांव की जीवन-शैली थी।

इस तरह मेरी भांजी उन दो लोगों से गहराई से जुड़ गई- एक वे व्यक्ति, जो रोज उसके लिए अंडा उबालते थे, और दूसरी मेरी नानी, जिन्होंने अपने जीवन के 75 वर्षों तक कभी प्याज तक नहीं छुआ था, फिर भी छह महीने से ज्यादा समय तक उसे रोज अंडा खिलाया। अंडों ने सीधे तौर पर उसके स्वास्थ्य में कोई चमत्कारिक योगदान तो नहीं दिया, लेकिन वो यह अच्छी तरह समझती थी कि उन दो लोगों की निष्ठा और समर्पण ने उसकी सेहत को जरूर सम्बल दिया।

और तीसरे व्यक्ति उसके डॉक्टर थे, जिनकी उसके मन में आज एक झीनी-सी याद भर है। उन डॉक्टर के हस्तक्षेप के बिना वह जीवित न बच पाती। ये वो दौर था, जब कोरोनरी आर्टरी बायपास सर्जरी को बहुत दुर्लभ माना जाता था। वह उन गिने-चुने बच्चों में से एक थी, जो उस समय उस सर्जरी से गुजरे। जब उन डॉक्टर का निधन हुआ, तो वह अमेरिका से विशेष रूप से भारत आई, उनके अंतिम संस्कार में शामिल हुई और अपने परिवार से कहा- मुझे गर्व है कि मेरे शरीर पर वह निशान है, जिसे एक ऐसे असाधारण व्यक्ति ने काटा और सिला।

जाहिर है कि वह नानी के अंतिम संस्कार में भी शामिल हुई। लेकिन मुझे तब आश्चर्य हुआ, जब वह उस घरेलू सहायक के अंतिम संस्कार में भी पहुंची- जिसने छह महीनों तक उसके लिए अंडे उबाले थे। दिलचस्प यह है कि वह आज भी उस परिवार को हर साल दीपावली के उपहार भेजती है और एक निश्चित राशि भी देती है। उसका गहरा विश्वास है कि वह इन लोगों की मदद के कारण ही जीवित है। उन साधारण लोगों को याद करना, जिन्होंने हमारी जिंदगी को असाधारण बना दिया- अपने आप में एक बेहद संतोषदायक अनुभव है।

फंडा यह है कि आज रविवार है, कुछ मिनटों का समय निकालें और उनमें से किसी व्यक्ति को फोन करें, जिन्होंने आपके जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। या केवल उन्हें धन्यवाद कहने के लिए उनसे जाकर मिलें। तब देखें आपके भीतर क्या होता है।

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