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11 घंटे पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु
मेरे बगल में एक स्मार्ट युवक बैठा था। उसकी मौजूदगी तत्काल ही लोगों का ध्यान खींच रही थी, लेकिन वह बेहद सहज था। उसने लाइट ब्राउन रंग का ओवरकोट पहना था, जिसमें थोड़ा-सा पीलापन भी था। यह एक आकर्षक और उच्च गुणवत्ता वाला परिधान था, जिसमें खास दर्जा तो दिख रहा था- लेकिन आस-पास के लोगों को हीनता महसूस नहीं करा रहा था।
बस, मैं यह नहीं जानता था कि 27 वर्ष का वह युवा एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री के कुछ होनहार एक्टर्स में से एक था। मंगलवार को दो घंटे की देरी के बाद आखिरकार हम सभी यात्री शाम 5.15 बजे मुंबई से भोपाल की फ्लाइट में सवार हो गए। ज्यादातर थके हुए थे और तुरंत सो गए।
यह युवा मेरे बगल में बैठा था और उसका ड्रेसिंग सेंस उसे दूसरों से अलग दिखा रहा था। उसने मुझे कॉन्कोर्ड विमान की मेरी एक यात्रा याद दिला दी, जिसमें कुलीन वर्ग, सेलिब्रिटीज और बिजनेस लीडर्स ने प्रीमियम एक्सपीरियंस से मेल खाते फॉर्मल कपड़े पहने थे।
आज की यात्राओं में तो कैजुअल्स की भरमार होती है। हम दोनों अपनी सीटों पर बैठ गए। वह युवा था और मैं बुजुर्ग। उसके कपड़े डिजाइनर थे, मैं फॉर्मल में था। उसने अपना एपल का लैपटॉप खोला और मैंने किताब।
मैं मानसिक तौर पर अपनी आने वाली किताब के लिए फॉरवर्ड लिखने में व्यस्त था, जबकि वह स्क्रीन पर महज आठ लाइनों में बंधा दिख रहा था- जो किसी ‘दोहे’ जैसी थीं। किसी शंकालु ऑब्जर्वर के लिए यह व्यस्तता का प्रदर्शन लग सकता था।
हालांकि वह पूरी तरह तल्लीन था। वह इधर-उधर नहीं देख रहा था कि कौन उसे देख रहा है। पूरी तरह काम में डूबा था। मुझे नहीं पता था कि वह अरबाज खान के प्रोजेक्ट में अपने आगामी शूट की रिहर्सल कर रहा है। उसे इंतजार नहीं था कि कोई उसे पहचाने। उसकी नजरें किसी से मान्यता पाने के लिए कभी नहीं उठीं। अपने भावी रोल में वास्तविकता लाने के लिए वह पूरी तरह डूब कर कोशिश कर रहा था।
ये मुलाकात संगीतकार अनिरुद्ध रविचंदर के साथ मेरी पिछली एक यात्रा जैसी ही थी। ‘व्हाई दिस कोलावेरी डी’ जैसे वायरल हिट समेत 45 से अधिक फिल्मों के लिए संगीत तैयार करने के बावजूद अनिरुद्ध हैदराबाद से चेन्नई की पूरी फ्लाइट में चुपचाप हेडफोन लगाए बैठे रहे।
अंतत: जब बोले तो एक टिप्पणी की कि ‘आप ही अकेले हैं, जिन्होंने मेरे साथ सेल्फी की मांग नहीं की।’ तब मैंने कहा कि मुझे नहीं मालूम कि लोग आपके साथ सेल्फी क्यों ले रहे हैं। जब मैंने स्वीकार किया कि मुझे उनकी प्रसिद्धि का अंदाजा नहीं था, तो उन्होंने बुरा मानने के बजाय गहरा सम्मान जताया।
इसके बाद मैंने हाथ मिलाकर ये कहते हुए विदा ली कि मैं सेल्फी नहीं लेना चाहता हूं, ताकि मैं आपको याद रह सकूं।इसी तरह, मंगलवार को भी मुझे नहीं पता था कि मैं किसके बगल में बैठा हूं, जब तक कि उन्होंने ही अपना परिचय मिहिर आहूजा के तौर पर नहीं दिया।
मैंने फिर वही मूर्खता की और बोला ‘आपसे मिलकर अच्छा लगा, आप क्या करते हैं?’ और मैं हैरान रह गया जब पता चला कि वो एक अभिनेता हैं, जो नेटफ्लिक्स की ‘द आर्चीज’ में जगहेड जोन्स के रूप में अपने ‘क्वर्की चार्म’ यानी अजीब से, किन्तु आकर्षक किरदार के लिए खूब सराहे गए हैं।
उन्होंने ‘शबद’ में हकलाने वाले किशोर का रोल भी किया, जिसका सपना फुटबॉल है। ‘विजय 69’ के लिए उन्होंने कड़ी फिजिकल ट्रेनिंग ली। ये दिखाता है कि वे किरदार में वास्तविकता लाने को प्राथमिकता देते हैं।
चाहे गणित की विलक्षण प्रतिभा हो या उभरते संगीतकार का किरदार, मिहिर की संवेदनशीलता, स्क्रीन प्रजेंस में संतुलन बनाने की क्षमता उनके करियर को सच में प्रभावशाली बनाती है। मैंने मिहिर के साथ भी सेल्फी नहीं ली। मिहिर, अनिरुद्ध जैसे लोगों के लिए उनका काम ही असली इनाम है। सफल लोग लो-प्रोफाइल रहकर दुनिया में आम इंसानों की तरह घूमने की आजादी बनाए रखते हैं।
फंडा यह है कि व्यवहार संबंधी शोध बताते हैं, सफल लोग कभी दिखावा नहीं करते। क्योंकि वे अकसर बाहरी मान्यता से ज्यादा आंतरिक संतुष्टि-दीर्घकालिक सुरक्षा को प्राथमिकता देते हैं।









