एन. रघुरामन का कॉलम:  सवाल पूछना एक कला है और एआई के दौर में तो यह बेहद मददगार है!
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एन. रघुरामन का कॉलम: सवाल पूछना एक कला है और एआई के दौर में तो यह बेहद मददगार है!

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47 मिनट पहले

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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

आप में से कई लोगों ने अपने बच्चों से यह जरूर पूछा होगा कि “क्या तुम झूठ बोल रहे हो?’ ऐसे में सजा के डर से बच्चा यही कहेगा कि “नहीं’। लेकिन अगर आप उन पैरेंट्स में से हैं, जिन्होंने बच्चे के बड़े होने तक के 18 सालों में यह सवाल सैकड़ों बार दोहराया है, तो आपने सवाल पूछने की कला नहीं सीखी है।

अब मैं देख सकता हूं कि आपका मन बेचैनी और जिज्ञासा से भरा हुआ है और आप जानना चाहते हैं कि अगर बच्चों से यह नहीं तो फिर क्या कहा जाए? जरा सब्र कीजिए, बताता हूं। लेकिन उससे पहले यह कहानी सुन लीजिए।

एक राजा था, जिसके पास तमाम सुख-सुविधाएं थीं, लेकिन एक बड़ा दु:ख भी था। उसका बेटा महज चार साल की उम्र में अंधा हो गया था। जहां उसका पूरा राज्य राजकुमार की आंखों की रोशनी लौटाने के उपाय खोजने में जुटा था, वहीं राजा, उसका परिवार और उसके गुरुओं ने राजकुमार को सिखाया था कि बुद्धिमानी से प्रश्न कैसे पूछे जाएं, ताकि वह विद्वानों से ज्यादा से ज्यादा ज्ञान प्राप्त कर सके।

समय के साथ राजकुमार का झुकाव अध्यात्म की ओर हो गया। उसकी कठोर तपस्या के कारण एक दिन स्वयं भगवान उसके सामने प्रकट हुए और उससे कहा कि वे उसे एक वरदान दे सकते हैं। क्या आप अनुमान लगा सकते हैं राजकुमार ने भगवान से क्या मांगा होगा? आम तौर पर इंसान वही मांगता है, जो दूसरों की तुलना में उसके पास नहीं होता। इसलिए अगर आपको लगता है कि राजकुमार ने अपने लिए आंखों की रोशनी मांगी होगी, तो आप गलत हैं।

उसने कहा, मैं इस राज्य में अपने परपोते तक के राज्याभिषेक को भी अपनी आंखों से देखने में सक्षम होना चाहता हूं। उसके प्रश्न पूछने के तरीके पर ध्यान दीजिए। एक ही वाक्य में उसने लंबा जीवन मांग लिया- इतना कि अपने परपोते के राज्याभिषेक तक जीवित रह सके; उसने अपनी खोई हुई दृष्टि मांग ली, क्योंकि वह सभी राज्याभिषेक समारोहों को अपनी आंखों से देखना चाहता था; उसने आक्रांताओं से अपने राज्य और प्रजा की सुरक्षा मांग ली; उसने अपने राज्याभिषेक, विवाह और परिवार की भी मांग कर ली और भगवान ने उसे सब दिया।

चूंकि हम सब उन्हीं सवालों के उत्तर देते हुए बड़े हुए हैं, जो शिक्षकों ने हमसे पूछे थे, इसलिए बच्चों के मन में यह धारणा बन जाती है कि प्रश्न पूछना उनका काम नहीं है। नतीजतन, वे अपने पैरेंट्स की मदद से स्वयं को बेहतर उत्तर देने के लिए प्रशिक्षित करते हैं, ताकि अच्छे नतीजे पा सकें।

लेकिन प्रश्न पूछना इसलिए एक कला है, क्योंकि यह सिर्फ जानकारी जुटाना ही नहीं है, बल्कि यह रणनीतिक पूछताछ का कौशल भी है। इसका उद्देश्य गहराई से चिंतन को प्रेरित करना, समझ विकसित करना और जिज्ञासा व सोच-समझकर की गई फ्रेमिंग के जरिए एक जुड़ाव पैदा करना है।

यह साधारण ‘क्या’ से बढ़कर ‘कैसे’ और फिर ‘अगर ऐसा हो तो क्या’ जैसे प्रश्नों तक जाता है, ताकि हमें अंतर्दृष्टियां मिलें और हम अपने भीतर व दूसरों में विकास को प्रोत्सहित कर सकें। इस कला में निपुण होने के लिए सच्ची जिज्ञासा, ध्यान से सुनने की क्षमता, खुले प्रश्नों पर ध्यान देना, जजमेंट देने से बचना और गहरे मनन व अनुसंधान को संभव बनाने के लिए मौन को भी जगह देना आवश्यक है।

चूंकि हम एआई के युग में रह रहे हैं, इसलिए आज सही प्रॉम्प्ट बेहद महत्वपूर्ण हो गया है, क्योंकि वही एआई के आउटपुट की गुणवत्ता, प्रासंगिकता और सटीकता तय करता है। एक अच्छी तरह से तैयार किया गया प्रॉम्प्ट एआई के लिए स्पष्ट मैनुअल की तरह काम करता है और उसकी पूरी क्षमता को सामने लाता है। इसके उलट अस्पष्ट प्रॉम्प्ट अकसर घिसे-पिटे, अनुपयोगी और यहां तक कि गलत नतीजों तक भी ले जाता है, जिन्हें हैलुसिनेशंस कहा जाता है।

अब हम फिर से अपने पहले सवाल पर लौटते हैं। “क्या तुम झूठ बोल रहे हो’ के बजाय यह पूछिए कि “क्या तुम कोई सच छिपा रहे हो?’ यह सवाल महंगे उत्पाद, जैसे कार आदि बेचने वाले सेल्सपर्सन को अकसर हतप्रभ कर देता है। जब सेल्सपर्सन इसके जवाब में सपाट तरीके से “नहीं’ कहता है, तो मैं उससे धीरे-धीरे वही सवाल दोबारा पूछता हूं और प्रश्न के निहितार्थ को स्पष्ट करता हूं।

फंडा यह है कि आपके सवाल को किसी को यह कहकर बच निकलने की अनुमति नहीं देनी चाहिए कि “मैंने झूठ नहीं बोला, मैं तो केवल सच को छुपा रहा था।’

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