एन. रघुरामन का कॉलम:  हममें से कितने उन ‘अदृश्य लोगों’ को देखने के लिए ट्रेन्ड हैं?
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एन. रघुरामन का कॉलम: हममें से कितने उन ‘अदृश्य लोगों’ को देखने के लिए ट्रेन्ड हैं?

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बुधवार सुबह की बात है, उस लोकल ट्रेन में खिड़की वाली सीट पर 20-25 साल का युवक बैठा था। वहीं, एक अधेड़ उम्र की महिला आंखें मूंदे तीसरे नंबर की सीट पर बैठी थी। ट्रेन का एसी घड़घड़ा रहा था। मैं सामने की सीट पर था। ट्रेन में भीड़ नहीं थी। मैं इधर-उधर देख रहा था और सोच रहा था कि इस एसी लोकल में भीड़ क्यों नहीं है, और उस युवक की दुनिया उसके स्मार्टफोन की स्क्रीन में सिमट-सी गई थी। उसके मोबाइल पर एक वायरल कॉमेडी चल रही थी और उसके पास हेडफोन नहीं थे। चूंकि उस वीडियो में पंचलाइन ज्यादा आ रही थीं, इसलिए उसने आवाज बढ़ा दी। उस कॉमेडी की तेज और बढ़ा-चढ़ाकर गूंज रही हंसी ने सीटों के बीच की उस खाली जगह को भर दिया था, और ये आवाज पटरियों की लयबद्ध खट-खट से टकरा रही थी। अधेड़ उम्र की महिला झपकी लेने की कोशिश कर रही थीं, लेकिन उनका सिर सीट के सख्त प्लास्टिक के कारण टिक नहीं पा रहा था। शायद वो तड़के उठकर घर का काम निपटाकर ऑफिस की पहली शिफ्ट में जा रही होंगी। हर बार जब भी फोन में वो रिकॉर्डेड हंसी तेज होती, उनकी पलकें चौंक जातीं, चेहरे पर शिकन पड़ती। पर युवक ने ध्यान नहीं दिया। वो तो अपने “निजी साम्राज्य’​ में था, जहां उसे मिल रहा मनोरंजन ही उसके लिए मायने रख रहा था। स्वागत है आपका उस दुनिया में, जहां बहुत से लोगों ने सार्वजनिक जगहों को अपना निजी साम्राज्य समझ लिया है। मेरी तरह के लोगों के लिए ये नए साम्राज्य आधुनिक जीवन में “सहानुभूति की कमी’ दिखाते हैं- जहां व्यक्तिगत सुविधा अक्सर सामूहिक गरिमा पर भारी पड़ जाती है। मैंने लैपटॉप खोला, ऊपर लिखा पैराग्राफ टाइप किया और उससे कहा कि वो मोबाइल साइलेंट कर ले, क्योंकि मुझे ऑफिस का काम करना है। शायद उसे बुरा लगा, वो उठकर अगले डिब्बे की ओर चला गया। फिर वो महिला 20 मिनट आराम से सोईं। आखिरी स्टेशन से पांच मिनट पहले वो उठीं और मदद के लिए मुझे धन्यवाद कहा। इससे मुझे एक प्रेस रिलीज याद आई, यूनाइटेड एयरलाइंस की ये विज्ञप्ति पिछले हफ्ते दफ्तर आई थी। एयरलाइन ने नया नियम जारी किया है, जिससे कुछ यात्री खुश हैं, जिसके मुताबिक हेडफोन के बिना ऑडियो सुनने पर यात्री को विमान से उतारा जा सकता है। एयरलाइन पहले ही “हेडफोन पॉलिसी’ लागू कर चुकी थी, पर अब उसने “कॉन्ट्रैक्ट ऑफ कैरिज’- यानी उड़ान के लिए यात्री जिन नियमों को मानते हैं- को अपडेट किया है, जिसमें साफ लिखा है कि “अगर यात्री ऑडियो या वीडियो कंटेंट हेडफोन के बिना सुनते हैं, तो उन्हें विमान से उतारा जाएगा या चढ़ने नहीं दिया जा सकता।’ एयरलाइन प्रवक्ता जोश फ्रीड ने कहा, “हम हमेशा अपने ग्राहकों को हेडफोन लगाने के लिए प्रोत्साहित करते हैं- और हमारी वाई-फाई गाइडलाइंस में भी यह याद दिलाया जाता है।’ आप नर्मदापुरम से भोपाल, चंडीगढ़ से शिमला, जयपुर से जोधपुर या रायपुर से भिलाई तक की कोई भी ट्रेन पकड़ें, वहां आपको कुछ यात्री जरूर दिखेंगे, जो दूसरों की शांति पर अपना हक समझते हैं, मान लेते हैं कि उनकी मस्ती बाकियों की शांति से ज्यादा अहम है। वहीं, पूर्वी छोर में राउरकेला से भुवनेश्वर जैसी जगहों पर जाएं, तो सहानुभूति की कमी सिर्फ आवाज तक सीमित नहीं रहती, शारीरिक तौर पर भी दिखती है। वहां यात्रियों का मूंगफली के छिलके इधर-उधर फेंकना आम है। इससे हाउसकीपिंग स्टाफ को सर्वाधिक परेशानी होती है। देश में एलपीजी सिलेंडर की संभावित कमी के कारण रेलवे की कैटरिंग सेवा खाने-पीने की व्यवस्था अस्थायी रूप से रोक सकती है। अगर ऐसा हुआ तो हमें खुद का खाना साथ लाना पड़ेगा। पर हमारी जिम्मेदारी है कि कचरे को सही से फेकें व उन अदृश्य हाउसकीपिंग स्टाफ का मान रखें, जो हमारे जाने के बाद सफाई के लिए आते हैं। फंडा यह है कि असली सहानुभूति के लिए मोरल इमेजिनेशन यानी “नैतिक कल्पना’ चाहिए, ताकि वे अदृश्य या परदे के पीछे काम करने वाले तमाम लोग हमें दिख सकें। यह वो क्षमता है, जिसमें हम वो चुप्पी या शांति सुन सकें, जिसकी किसी को जरूरत है। या उस स्टाफ को याद रखें, जो उस गंदगी को साफ करते हैं, जो हम पीछे छोड़कर आते हैं।



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