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- N. Raghuraman’s Column We Can Teach Gratitude To Children At Any Time
22 मिनट पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु
“हमारे पास पर्याप्त समय नहीं है,’ मैंने अपने 87 वर्षीय अंकल की 12 वर्षीय पोती से कहा। वह मुम्बई में उपहारों की एक दुकान में घुस गई थी- बेशक केवल उन्हें देखने के लिए। वह हमसे मिलने आई थी। एक अरसे के बाद हमारे यहां मेहमान के रूप में कोई बच्ची आई थी।
घर लौटने के बाद मुझे कई काम करने थे, जैसे उसका बैग पैक करना और यह सुनिश्चित करना कि वह अगली सुबह अपने घर लौटने वाली फ्लाइट में सवार हो। वह यूएनएम के रूप में यात्रा कर रही थी। एयरलाइन की भाषा में यूएनएम का मतलब होता है अनअकम्पनीड माइनर, जिसमें बच्चे एयरलाइन-कर्मचारियों की देखरेख में विमान में अकेले यात्रा करते हैं।
लेकिन तभी, हमने वह देखा और जैसे समय रुक गया। पोस्टर पर एक बुजुर्ग व्यक्ति उसके दादा की तरह दिख रहे थे और कोई उनके उस पैर को दबा रहा था, जिसमें दर्द था। यह एक पोर्टेबल लेग मसाजर का विज्ञापन था, जो पैर की उंगलियों से लेकर पिंडली की मांसपेशियों तक मालिश करता है।
उसने कहा, “दादाजी हमेशा मुझे अपने पैर पर खड़े होने के लिए कहते हैं और मैं इस कारण से वीडियो गेम नहीं खेल पाती। वे हमेशा मुझसे कहते हैं कि कृपया कुछ और समय के लिए मेरे पैर पर खड़ी रहो और मैं इससे ऊब जाती हूं। क्या यह मशीन मेरी जगह ले सकती है?’ मैंने जवाब नहीं दिया।
उसने मेरी तरफ देखा और पूछा, “आप इतने हर्ट क्यों फील कर रहे हैं?’ मैंने कहा, “जब मेरी मां चाहती थीं कि मैं उनके पैर दबाऊं, तो मुझे भी वैसा ही महसूस होता था, जैसा तुम्हें आज हो रहा है। मैं उनके पैर तीन से चार मिनट भी नहीं दबाता था और वे सो जाती थीं, क्योंकि वे सुबह 5 से रात 9 बजे तक खड़ी रहती थीं।
मुझे पता था कि वे बहुत थकी होती थीं। लेकिन मैंने कभी भी उनके पैरों को इतना नहीं दबाया, जिससे उन्हें संतुष्टि मिले। आज मैं घंटों उनके पैर दबाना चाहता हूं और मैं ऐसी मशीनें भी खरीद सकता हूं, लेकिन आज वे नहीं है।’ मुझे नहीं पता था कि बच्ची ने मेरी बात समझी या नहीं, लेकिन मैंने अपनी बात जारी रखी।
मैंने कहा, “दु:ख केवल उन्हें खोने का नहीं है, बल्कि मेरे अंदर किसी चीज के गलत होने का भाव भी है। आज मैं समृद्ध जीवन बिताता हूं और इसके लिए मुझे थोड़ा-सा गिल्ट महसूस होता है। मैं हमेशा चाहता था कि वे मेरे साथ कुछ और समय रहतीं, ताकि समृद्ध जीवन का आनंद ले पातीं।’ फिर मैंने उससे वादा किया कि मैं उसे घर पर रखी मशीन दूंगा, जिसे वह अपने दादाजी को दे सकती है।
मॉल से बाहर निकलते ही हमने एक बच्चे को भीख मांगते देखा। हमने इस दुनिया में मौजूद क्रूरता और अन्याय के बारे में बातें कीं और मैंने उस अभागे बच्चे से उसकी तुलना की, क्योंकि उसका जीवन उस बच्चे से कहीं बेहतर था।
मैंने ऐसा इसलिए कहा, क्योंकि मैं जानता था वह ऐसी दुनिया में बड़ी हो रही है, जहां जरूरत से ज्यादा भौतिकवादी उपभोग अब एक आम बात है और उसे पता है कि वह जो भी चाहती है, वह अगले दिन उसके घर पर आ सकता है। दरअसल मैं चाहता था कि वह समझे, करुणा किसी भी भौतिक उपहार से बेहतर है।
घर पहुंचने के बाद हमने उसका सूटकेस पैक किया और टीवी देखने बैठ गए। वह आई और पूछा, “अगर आप अपनी मशीन दादाजी को दे रहे हो, तो आपके पैर कौन दबाएगा?’ मैंने कहा, “मुझे नहीं पता।’ उसने सहसा मेरा पैर दबाना शुरू कर दिया। मैंने उसे गले लगाते हुए कहा, “क्या तुम जानती हो कोई मशीन कभी भी तुम जैसे बच्चों के प्यार की जगह नहीं ले सकती?’
वह भागकर गेस्ट रूम में गई, जहां उसका सूटकेस रखा था। उसने अपने हैंड बैगेज से मशीन निकाली और उसको मुझे लौटाते हुए कहा, “दादाजी भी यही कहते हैं। अब मैं हर रात उनका पैर दबा दिया करूंगी, इसलिए आप चिंता मत कीजिए।’ उसके इस परवाह भरे लहजे ने मेरी आंखें नम कर दीं। मुझे अहसास हुआ कि मैंने उसे कुछ भी सिखाए बिना ही कृतज्ञता सिखा दी, जो कि अधिकार-भावना के विपरीत होती है।
फंडा यह है कि जीवन ऐसे बिताएं कि बच्चे जीवन की वास्तविकता और उसमें हमारे आचरण को देखकर कृतज्ञता का पाठ सीखें।