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- US Iran Deal: Crude Oil Prices Dip 3.1% To $74.73; 19M Barrels Pass Hormuz
नई दिल्ली3 घंटे पहले
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अमेरिका और ईरान के बीच पीस डील की खबरों के बाद बुधवार को कच्चे तेल की कीमतें 3.1% गिर गईं। इससे ब्रेंट क्रूड की कीमत मिडिल ईस्ट जंग के बाद पहली बार 75 डॉलर प्रति बैरल के नीचे आ गईं।
ग्लोबल मार्केट में ब्रेंट क्रूड फ्यूचर्स 2.32 डॉलर की गिरावट के साथ 74.76 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया। वहीं, अमेरिकी क्रूड वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट भी 2.17 डॉलर (2.96%) फिसलकर 71.04 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था।
होर्मुज से 1.9 करोड़ बैरल तेल गुजरा
अमेरिका-ईरान के बीच 17 जून को हुए समझौते के बाद अब तक 11 जहाज होर्मुज रूट पार कर भारत की ओर रवाना हो चुके हैं। वहीं, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने दावा किया कि सोमवार को होर्मुज से 1.9 करोड़ बैरल तेल की आवाजाही हुई, जो अब तक का रिकॉर्ड है।
117 दिनों में कच्चे तेल की कीमत इस तरह घटी-बढ़ी
| तारीख | कच्चे तेल का दाम |
| 27 फरवरी | 73 डॉलर प्रति बैरल |
| 9 मार्च | 120 डॉलर प्रति बैरल |
| 30 मार्च | 107 डॉलर प्रति बैरल |
| 30 अप्रैल | 110 डॉलर प्रति बैरल |
| 30 मई | 91 डॉलर प्रति बैरल |
| 24 जून | 74 डॉलर प्रति बैरल |
युद्ध शुरू होने के बाद सबसे निचला स्तर
ब्रेंट क्रूड ने कारोबार के दौरान 74.61 डॉलर प्रति बैरल का निचले स्तर पर पहुंच गया था, जो 27 फरवरी के बाद का सबसे कम है। बता दें कि 27 फरवरी को ही ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हमले शुरू हुए थे।
इसी तरह WTI भी गिरकर 70.91 डॉलर पर आ गया, जो 3 मार्च के बाद का सबसे निचला स्तर है। बाजार के जानकारों का कहना है कि होर्मुज रूट से तेल टैंकरों की आवाजाही सामान्य होने से कीमतों पर दबाव बना है।
कच्चा तेल सस्ता होने से भारत को क्या फायदे होंगे?
कच्चा तेल भारत के लिए जरूरी है, क्योंकि हम करीब 85% तेल आयात करते हैं। तेल की कीमतें गिरने पर अर्थव्यवस्था को कई मोर्चों पर राहत मिलती है।
- पेट्रोल-डीजल के रेट नहीं बढ़ेंगे: कच्चा तेल सस्ता होने पर IOC, BPCL, HPCL जैसी कंपनियों के तेल की कीमत बढ़ाने की आशंका कम हो जाएगी। इससे ट्रांसपोर्ट लागत घटती है और आम आदमी के बजट पर असर पड़ता है।
- महंगाई पर असर: डीजल के रेट न बढ़ने से ट्रांसपोर्ट लागत बढ़ेगी नहीं। इससे फल, सब्जियां, अनाज और अन्य रोजमर्रा के खाने-पीने के सामानों के दाम नहीं बढ़ेंगे।
- CAD में सुधार: कच्चा तेल सस्ता होने से इंपोर्ट बिल घटता है। विदेशी मुद्रा भंडार बचता है और करंट अकाउंट डेफिसिट यानी CAD कम होता है।
- रुपए को मजबूती: कच्चे तेल का बिल घटने से डॉलर की मांग कम होती है। इससे रुपया मजबूत होता है और आयात सस्ता होता है।
- सब्सिडी बोझ कम: कच्चा तेल सस्ता होने से सरकार का सब्सिडी खर्च घटता है। बचा पैसा सरकार इंफ्रास्ट्रक्चर, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे सेक्टर में लगा सकती है।
- कॉर्पोरेट प्रॉफिट: तेल सस्ता होने से लागत घटती है और मुनाफा बढ़ता है। इससे शेयर बाजार पर पॉजिटिव असर पड़ता है।
होर्मुज प्रभावित होने से तेल महंगा हुआ था
जंग के बाद ईरान ने होर्मुज रूट लगभग बंद कर दिया था। दुनिया का करीब 20% तेल-गैस इसी रास्ते से गुजरता है। इसके बंद होने से कच्चा तेल, LPG, एल्युमीनियम, फर्टिलाइजर और प्लास्टिक महंगे हुए थे।
ब्रिटेन-यूरोप में दवाओं और जरूरी चीजों की कमी का खतरा बढ़ा, क्योंकि शिपिंग खर्च कई गुना बढ़ गया था। इस सप्लाई संकट के कारण अमेरिका में गैस की कीमतें 4.15 डॉलर प्रति गैलन तक पहुंच गई थीं और महंगाई दर में भी उछाल आया था।










