7 घंटे पहले
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कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी 4 और 5 नवंबर को है। इस तिथि पर रमा एकादशी व्रत किया जाता है। रमा महालक्ष्मी का ही एक नाम है। मान्यता है कि रमा एकादशी व्रत करने से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विशेष कृपा मिलती है और घर-परिवार में सुख-शांति, समृद्धि और प्रेम बना रहता है।
हिन्दी पंचांग के मुताबिक, कार्तिक कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 4 नवंबर को सुबह करीब 11:03 बजे शुरू होगी, इसका समापन 5 नवंबर को सुबह करीब 10:36 बजे होगा। उदया तिथि के आधार पर रमा एकादशी का व्रत 5 नवंबर को रख सकते हैं। एकादशी व्रत द्वादशी तिथि के साथ वाले दिन करना ज्यादा शुभ माना जाता है। व्रत का पारण अगले दिन यानी शुक्रवार, 6 नवंबर को कर सकते हैं।
रमा एकादशी पर ऐसे करें भगवान विष्णु की पूजा
उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के मुताबिक, रमा एकादशी पर सुबह जल्दी उठना चाहिए। स्नान के बाद सूर्य देव को जल चढ़ाएं। फिर घर के मंदिर में भगवान विष्णु के सामने दीपक जलाकर व्रत और पूजा करने का संकल्प लें।
इसके बाद भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और भगवान श्रीकृष्ण की विधि-विधान से पूजा करें। पूजा में भगवान को फूल, फल, मिठाई और तुलसी दल अर्पित करें। भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी का विशेष महत्व माना गया है। सुबह की पूजा के बाद शाम को भी भगवान की आरती करें। रात में घर के मंदिर में एकादशी व्रत की कथा पढ़ें अथवा सुनें। ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जप करें। दान-पुण्य करें।
रमा एकादशी व्रत से जुड़ी मान्यताएं और कथा
माना जाता है कि रमा एकादशी का व्रत करने से जाने-अनजाने में हुए पापों से मुक्ति मिलती है और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है। माता लक्ष्मी की पूजा करके घर में सुख-समृद्धि और धन-धान्य बढ़ने की कामना की जाती है।
दीपावली से पहले आने वाली महत्वपूर्ण एकादशी भी माना जाता है। इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की आराधना करने से परिवार में सुख-शांति और खुशहाली बनी रहने की मान्यता है।
पौराणिक कथा है कि पुराने समय में मुचुकुंद नाम के एक राजा थे। देवराज इंद्र उनके मित्र थे। राजा धार्मिक प्रवृत्ति के थे और हमेशा सत्य बोलते थे। उनके राज्य में सभी लोग एकादशी का व्रत रखते थे।
राजा की एक पुत्री थी, जिसका नाम चंद्रभागा था। उसका विवाह राजा चंद्रसेन के पुत्र शोभन के साथ हुआ था। एक बार शोभन अपनी पत्नी चंद्रभागा के साथ उसके पिता के घर पहुंचा। उस दिन एकादशी थी। राजा मुचुकुंद के राज्य में सभी लोग एकादशी पर अन्न-जल का त्याग करके व्रत रखते थे।
शोभन ने भी एकादशी का व्रत रखने का फैसला किया। यह देखकर चंद्रभागा चिंतित हो गई, क्योंकि उसे लगा कि उसका पति भूख-प्यास सहन नहीं कर पाएगा। शोभन ने पत्नी से कोई ऐसा उपाय पूछा, जिससे वह व्रत भी कर सके और उसे भूखा भी न रहना पड़े।
हालांकि, चंद्रभागा को ऐसा कोई उपाय नहीं मालूम था। इसके बाद शोभन ने भगवान पर विश्वास करके व्रत शुरू कर दिया, लेकिन भूख-प्यास के कारण उसकी हालत बिगड़ गई और अंततः उसकी मृत्यु हो गई। पति की मृत्यु से चंद्रभागा बहुत दुखी हुई। रमा एकादशी व्रत के शुभ फल से शोभन की आत्मा को मंदराचल पर्वत के शिखर पर स्थित देवनगर में स्थान मिला। वहां उसे सुख-सुविधाओं के साथ जीवन प्राप्त हुआ। एक दिन राजा मुचुकुंद मंदराचल पर्वत पहुंचे। वहां उन्होंने अपने दामाद शोभन को सुखी और प्रसन्न अवस्था में देखा। वापस लौटकर राजा ने यह बात अपनी पुत्री चंद्रभागा को बताई।
यह समाचार सुनकर चंद्रभागा बहुत प्रसन्न हुई। इसके बाद उसने भी रमा एकादशी का व्रत किया। इस व्रत के शुभ फल से चंद्रभागा अपने पति शोभन के पास पहुंच गई। इस तरह रमा एकादशी की कथा में व्रत, श्रद्धा और भगवान विष्णु की भक्ति का महत्व बताया गया है।





