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- India Ethanol Procurement Policy | Maize Farmers Impact & Food Security
40 मिनट पहलेलेखक: डॉ. सीके जैन
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डॉ. सी.के. जैन अनाज इथेनॉल निर्माता संघ के प्रेसिडेंट हैं।
तेल विपणन कंपनियों (OMCs) ने इथेनॉल सप्लाई ईयर 2026–27 के लिए 1100 करोड़ लीटर इथेनॉल की खरीद के टेंडर जारी किए हैं। हालांकि, खरीद की इस व्यवस्था से भारत की कृषि प्राथमिकताओं, खाद्य सुरक्षा और लंबे समय के औद्योगिक विकास को लेकर कई बुनियादी सवाल खड़े होते हैं।
टेंडर से गन्ने के रस, चीनी के घोल और बी-हैवी शीरे (चीनी बनाने के दौरान निकलने वाला गाढ़ा, चिपचिपा और मीठा तरल पदार्थ) को बाहर रखा गया है। ऐसे में अब इथेनॉल की लगभग पूरी जरूरत अनाज से बने इथेनॉल से पूरी करनी होगी। इसमें सी-हैवी शीरे और दूसरे मंजूर स्रोतों का सीमित योगदान रहेगा।
पिछले साल गन्ने से बनने वाले इथेनॉल के लिए शुरुआती तौर पर करीब 289 करोड़ लीटर की खरीद तय की गई थी। अब इस बड़ी मांग को दूसरे स्रोतों, खासकर अनाज की ओर मोड़ना होगा।
उत्पादन क्षमता ज्यादा लेकिन जरूरत कम, इससे कम कीमत में बिकेगा इथेनॉल
इथेनॉल की जरूरत 1100 करोड़ लीटर है, जबकि इंडस्ट्री की उम्मीद है कि सप्लायर इससे दोगुने से भी ज्यादा इथेनॉल बनाने की क्षमता की पेशकश कर सकते हैं।
टेंडर में अलग-अलग कच्चे माल से बनने वाले इथेनॉल के लिए अलग-अलग खरीद कीमतें तय की गई हैं। जरूरत से ज्यादा इथेनॉल की पेशकश होने पर कंपनियों के बीच टेंडर पाने के लिए कड़ी होड़ होगी। ऐसे में कम कीमत वाली श्रेणियां बनाने वालों के लिए ज्यादा आकर्षक हो सकती हैं, भले ही उस कीमत पर इथेनॉल बनाने का खर्च निकालना मुश्किल हो।
सस्ता इथेनॉल बनाने के लिए टूटे चावल का इस्तेमाल बढ़ेगा
भारतीय खाद्य निगम (FCI) के पास चावल कम होने के कारण खराब अनाज (DFG), खासकर टूटे चावल से इथेनॉल बनाने का काम बढ़ सकता है। इससे बनने वाले इथेनॉल की खरीद कीमत 64 रुपये प्रति लीटर है। वहीं, मक्का से बने इथेनॉल की कीमत 68.86 रुपये प्रति लीटर है।
इंडस्ट्री को उम्मीद है कि खराब अनाज और टूटे चावल से बनने वाले इथेनॉल की मात्रा पिछले साल के करीब 80 करोड़ लीटर से बढ़कर 700 करोड़ लीटर से ज्यादा हो सकती है।
इससे एक सीधा सवाल उठता है: टूटे चावल की इतनी बड़ी मात्रा आखिर आएगी कहां से?
भारत की जैव-ईंधन नीति के तहत, खराब अनाज में टूटे हुए चावल और इंसानों के खाने के अयोग्य अनाज शामिल हैं। हालांकि, टूटे हुए चावल का मतलब हमेशा यह नहीं होता कि वे खराब हैं या खाने लायक नहीं हैं। इनका बड़े पैमाने पर सेवन किया जाता है, और इनका इस्तेमाल फूड प्रोसेसिंग और पशुओं के चारे में भी होता है।
अगर इन अनाजों से इथेनॉल बनाने की मांग बड़े पैमाने पर बढ़ती है, तो खाने, पशुओं के चारे और ईंधन के लिए अनाज की सीधी प्रतिस्पर्धा शुरू हो सकती है। इससे अनाज की कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं और खाद्य महंगाई भी बढ़ सकती है।
सरकार इथेनॉल की खरीद पर प्रति लीटर कुछ रुपए बचा सकती है, लेकिन इसके बदले में खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ाकर उपभोक्ताओं पर कहीं बड़ा बोझ डाल सकती है।
किसान मक्का की खेती क्यों जारी रखेंगे?
2023 से सरकार मक्का को इथेनॉल उत्पादन के लिए औद्योगिक अनाज के तौर पर बढ़ावा दे रही है। इसके लिए इथेनॉल की कीमतों में प्रोत्साहन दिया गया और किसानों को धान जैसी ज्यादा पानी लेने वाली फसलों से मक्का की खेती की ओर आने के लिए अभियान चलाए गए।
लेकिन नए टेंडर में मक्का से बने इथेनॉल पर मिलने वाला प्रोत्साहन 5.79 रुपये से घटाकर 2.79 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया है। इससे मक्का से बने इथेनॉल की खरीद कीमत घटकर 68.86 रुपये प्रति लीटर रह गई है।
इसके अलावा, टेंडर की शर्तों के अनुसार, एक बार जब बोली लगाने वाला कम कीमत पर आवंटन हासिल कर लेता है, तो वह कच्चा माल तो बदल सकता है, लेकिन उसके इथेनॉल की कीमत में कोई बदलाव नहीं होगा।
इससे भी अहम बात यह है कि अगर 64 रुपये प्रति लीटर की कीमत पर बिकने वाले टूटे चावल से बने इथेनॉल की प्रतिस्पर्धा के कारण मक्का से इथेनॉल बनाने वाली कंपनियों पर भी अपनी लागत इसी स्तर तक लाने का दबाव पड़ता है, तो इसका असर आखिरकार मक्का किसानों पर भी पड़ेगा।
अगर मक्का किसानों को अपनी फसल इतनी कम कीमत पर बेचने के लिए मजबूर होना पड़े कि 64 रुपये प्रति लीटर की दर पर इथेनॉल बनाना फायदे का सौदा रहे, तो वे मक्का की खेती जारी क्यों रखेंगे?
किसान ऐसी फसलों की ओर रुख करेंगे, जिनसे उन्हें बेहतर और ज्यादा भरोसेमंद कमाई हो सके।
इसके नतीजे सिर्फ इथेनॉल तक सीमित नहीं रहेंगे। भारत कई सालों से ऐसी घरेलू मक्का अर्थव्यवस्था विकसित करने की कोशिश कर रहा है, जो इथेनॉल, स्टार्च, पशुओं के चारे और दूसरे उद्योगों की जरूरत पूरी कर सके।
किसानों के लिए किसी औद्योगिक बाजार में लगातार मांग बने रहना जरूरी है। इससे उन्हें उत्पादन बढ़ाने और खेती का रकबा बढ़ाने में निवेश करने का भरोसा मिलता है। इस बाजार को कमजोर करने से कृषि विविधीकरण को बढ़ावा देने की सरकार की अपनी कोशिशें उलट सकती हैं।
क्या सरकार टिकाऊ घरेलू कृषि आपूर्ति व्यवस्था के जरिए भारत की औद्योगिक ताकत बढ़ाने के बड़े लक्ष्य से भटक गई है?
चावल को बढ़ावा, लेकिन धान की खेती कम करने की कोशिश?
इसमें विरोधाभास साफ दिखाई देता है।
सरकार कई सालों से खासकर जमीन के नीचे पानी की कमी से जूझ रहे राज्यों में पानी की ज्यादा खपत वाली धान की खेती पर निर्भरता कम करने की कोशिश कर रही है। चावल को पहले से ही सरकारी खरीद, सब्सिडी और सार्वजनिक खर्च के रूप में काफी मदद मिलती है।
इसके बावजूद, इथेनॉल नीति अब चावल और टूटे चावल के लिए एक बड़ा अतिरिक्त औद्योगिक बाजार तैयार करने का खतरा पैदा कर रही है। इससे उस फसल की खेती करना आर्थिक रूप से ज्यादा फायदेमंद हो सकता है, जिससे किसानों को दूर ले जाने की सरकार कोशिश कर रही है।
जब कृषि नीति के जरिए मक्का की खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है, तो इथेनॉल की खरीद व्यवस्था के जरिए उसकी व्यावसायिक संभावनाओं को कमजोर क्यों किया जा रहा है?
खरीद की प्राथमिकताओं पर दोबारा विचार करने की जरूरत
भारत का इथेनॉल कार्यक्रम कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करने, किसानों की आमदनी बढ़ाने, फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने और देश में औद्योगिक क्षमताएं विकसित करने के मकसद से शुरू किया गया था।
अगर खरीद की व्यवस्था में सिर्फ एक्स-मिल कीमतों को प्राथमिकता दी जाती है, तो इससे ये बड़े लक्ष्य कमजोर पड़ सकते हैं।
सरकार को मक्का की खेती के लिए व्यावसायिक प्रोत्साहन बनाए रखने, खाने योग्य टूटे चावल के इथेनॉल में इस्तेमाल को सावधानी से नियंत्रित करने और यह सुनिश्चित करने की जरूरत है कि कच्चे माल की खरीद देश की व्यापक कृषि प्राथमिकताओं के मुताबिक हो।
सबसे सस्ता इथेनॉल जरूरी नहीं कि भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए भी सबसे सस्ता साबित हो।
मक्का और गन्ना किसानों को पीछे धकेलने और चावल से बनने वाले इथेनॉल की मांग बढ़ाने की आशंका के बीच नया टेंडर एक बुनियादी सवाल खड़ा करता है:
क्या भारत टिकाऊ इथेनॉल अर्थव्यवस्था बना रहा है या सिर्फ चावल के लिए एक और सब्सिडी वाला बाजार तैयार कर रहा है, जिसकी कीमत किसानों, उपभोक्ताओं और देश के लंबे समय के औद्योगिक विकास को चुकानी पड़ेगी?
(ये लेखक के अपने विचार हैं)







