गुरुवार को मार्गशीर्ष पूर्णिमा और भगवान दत्तात्रेय का प्रकट उत्सव:  पवित्र नदियों में स्नान करने और दान-पुण्य करने की परंपरा, जानिए मार्गशीर्ष पूर्णिमा से जुड़ी परंपराएं
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गुरुवार को मार्गशीर्ष पूर्णिमा और भगवान दत्तात्रेय का प्रकट उत्सव: पवित्र नदियों में स्नान करने और दान-पुण्य करने की परंपरा, जानिए मार्गशीर्ष पूर्णिमा से जुड़ी परंपराएं

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  • Margashirsha Purnima On 4th December, Lord Dattatreya Jayanti On 4th December, Significance Of Margshirsh Purnima, Rituals About Purnima In Hindi

13 घंटे पहले

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गुरुवार, 4 दिसंबर को अगहन (मार्गशीर्ष) मास की अंतिम तिथि पूर्णिमा है। इस तिथि पर भगवान दत्तात्रेय का प्रकट उत्सव भी मनाया जाता है। मार्गशीर्ष पूर्णिमा पर पवित्र नदियों में स्नान, दान-पुण्य और भगवान विष्णु, दत्तात्रेय का पूजन करने की परंपरा है। मान्यता है कि इस पूर्णिमा पर स्नान और दान करने से उतना पुण्य मिलता है, जितना पुण्य यज्ञ करने से मिलता है।

उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के मुताबिक, मार्गशीर्ष मास में भगवान श्रीकृष्ण की विशेष पूजा की जाती है, क्योंकि द्वापर युग श्रीकृष्ण ने मार्गशीर्ष मास को खुद का स्वरूप बताया था। इसका जिक्र महाभारत, श्रीमद्भगवद् गीता में है। इस दिन तीर्थ या किसी पवित्र नदी में स्नान करके दान करने से जाने-अनजाने में किए गए पापों का नाश होता है। इस महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी पर गीता जयंती मनाई जाती है, इसलिए पूर्णिमा पर गीता का पाठ भी करना चाहिए।

ये है भगवान दत्तात्रेय अवतार की कथा

  • श्रीमद् भगवद् पुराण में बताया गया है कि दत्तात्रेय विष्णु जी के अवतार हैं। उनका जन्म मार्गशीर्ष पूर्णिमा पर प्रदोष काल में हुआ था। प्रदोष काल यानी सूर्यास्त के आसपास का समय।
  • अनुसुइया और अत्रि मुनि की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उनके पुत्र के रूप में जन्म लिया था। अत्रि मुनि के घर पुत्र रूप में आने से विष्णु जी दत्त और अत्रि पुत्र होने से आत्रेय कहलाए। दत्त और आत्रेय के संयोग से उनका नाम दत्तात्रेय पड़ा। इनकी माता अनुसुइया अपने पतिव्रत धर्म की वजह से प्रसिद्ध हैं।
  • एक बार देवी सरस्वती, महालक्ष्मी और सती माता को अपने पतिव्रत धर्म पर बहुत गर्व हो गया था। उस समय नारद मुनि ने तीनों देवियों को अनुसुइया के बारे में बताया और कहा कि अनुसुइया का पतिव्रत धर्म सबसे महान है।
  • तीनों देवियों ने नारद मुनि की बात सुनकर अपने-अपने पतियों से कहा कि वे अनुसुइया के पतिव्रत धर्म की परिक्षा लें। तीनो देवियों की बात मानकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश साधुवेश में अनुसुइया की परीक्षा लेने पहुंच गए।
  • तीनों साधुओं ने अनुसुइया से निर्वस्त्र होकर भिक्षा देने के लिए कहा। सती अनुसुइया ने अपने तप बल से तीनों साधुओं को छ:-छ: माह का शिशु बना दिया और फिर उन्हें स्तनपान कराया और अपने पास ही रख लिया।
  • जब बहुत समय तक तीनों देव देवियों के पास नहीं पंहुचे, तब तीनों देवियां अनुसुइया के पास पहुंची और उनसे प्रार्थना की कि वे तीनों देवों फिर से उनका स्वरूप लौटा दें। अनुसुइया ने तीनों बालकों को ब्रह्मा, विष्णु और महेश का स्वरूप लौटा दिया। तीनों देवताओं ने अनुसुइया से प्रसन्न होकर उनके यहां पुत्र रूप में जन्म लेने का वर दिया। बाद में अनुसुइया के गर्भ से ब्रह्मा के अंश से चंद्र, शिव जी के अंश से दुर्वासा और विष्णु जी के अंश से दत्तात्रेय का जन्म हुआ।

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