गौतम बुद्ध और उनके बूढ़े शिष्य का किस्सा:  बुद्ध जयंती 12 मई को, बुद्ध की सीख रोज कुछ समय ध्यान करें और संयम के साथ काम करते रहें
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गौतम बुद्ध और उनके बूढ़े शिष्य का किस्सा: बुद्ध जयंती 12 मई को, बुद्ध की सीख रोज कुछ समय ध्यान करें और संयम के साथ काम करते रहें

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6 घंटे पहले

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हम अपनी उम्र को सालों में गिनते हैं, जन्म से लेकर वर्तमान तक के वर्षों को जोड़ते हुए, लेकिन क्या यही हमारी असली उम्र है? गौतम बुद्ध ने एक बूढ़े शिष्य को उम्र से जुड़ा रहस्य बताया है।

गौतम बुद्ध के एक वृद्ध शिष्य थे, सरल और शांत स्वभाव के। वे बुद्ध के साथ रहते थे और वर्षों से उनका सान्निध्य प्राप्त कर रहे थे। एक दिन बुद्ध ने उनसे पूछा, “क्या आयु होगी आपकी?”

शिष्य ने कहा, “यही कोई सत्तर वर्ष।”

बुद्ध मुस्कुराए और बोले, “नहीं, आप सही उम्र नहीं बता रहे हैं।”

यह सुनकर वृद्ध शिष्य चौंक गए। वे सोच में पड़ गए, क्या मुझसे कोई भूल हो गई? उन्होंने कहा, “तथागत, मैंने अपनी उम्र सच ही बताई है। मैं बूढ़ा हो गया हूं, दांत गिर चुके हैं, पोते-पोतियां हैं। मैं सत्तर का ही हूं। फिर आप ऐसा क्यों कह रहे हैं?”

बुद्ध ने बड़ी शांति से उत्तर दिया, “तुम्हारी उम्र केवल एक वर्ष है।”

अब शिष्य और अधिक व्याकुल हो गए। “कैसे?” उन्होंने पूछा।

बुद्ध ने उत्तर दिया, “तुमने जो उनहत्तर वर्ष दुनियादारी, इच्छाओं और भ्रम में बिताए, वे केवल शरीर के वर्ष थे। उन्होंने आत्मा की यात्रा में कोई योगदान नहीं दिया। पर जब तुमने धर्म की राह पर कदम रखा, जब तुमने सच्चे अर्थों में साधना, ध्यान और आत्मचिंतन को अपनाया, तब से ही तुम्हारा जीवन वास्तव में शुरू हुआ। वह अवधि अभी एक वर्ष की ही है। वही तुम्हारी सच्ची उम्र है।”

बुद्ध का ये संवाद सिर्फ एक वृद्ध शिष्य के लिए नहीं था, यह हर व्यक्ति के लिए है।

बुद्ध का यह दृष्टिकोण हमें यह सिखाता है कि जीवन की गिनती वर्षों से नहीं, चेतना से होती है। वही समय मूल्यवान है, जो हमने आत्मविकास, सदाचार और आत्मा की शुद्धि में बिताया है।

हममें से कई लोग वर्षों तक केवल दिन काटते हैं, कभी नौकरी, कभी व्यापार, कभी पारिवारिक जिम्मेदारियां। इन सबका महत्व अपनी जगह है, लेकिन यदि आत्मचिंतन, ध्यान, और आंतरिक शांति की ओर कोई प्रयास नहीं किया गया, तो वह समय केवल देह की उम्र है, आत्मा की नहीं।

जीवन में शांति पाने के लिए क्या करें?

हर दिन कुछ समय ध्यान को दें – केवल 10 मिनट का मौन और ध्यान भी आत्मा को जागृत कर सकता है, मन को शांत कर सकता है।

सदाचार और संयम अपनाएं – जीवन में नैतिकता और शुद्धता ही आत्मिक यात्रा की नींव है।

अंतरदृष्टि विकसित करें – केवल बाहरी दुनिया नहीं, भीतर की दुनिया को भी जानें।

धर्म और अध्यात्म को जीवन का हिस्सा बनाएं – किताबों, सत्संग और चिंतन के माध्यम से।

गौतम बुद्ध की यह छोटी-सी पर गहन कथा हमें आत्मविश्लेषण करने की सीख देती है। यह हमें बता रही है कि क्या हम वाकई जी रहे हैं या केवल जी रहे हैं, ऐसा सोच रहे हैं? हर व्यक्ति के पास जीवन में जागने का एक अवसर आता है। जब वह अवसर आता है, उसी क्षण जीवन प्रारंभ होता है। वही उस व्यक्ति की सच्ची उम्र कहलाती है।

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