जयती घोष का कॉलम:  ‘गैंगस्टर साम्राज्यवाद’ के विरोध में दुनिया एक हो
टिपण्णी

जयती घोष का कॉलम: ‘गैंगस्टर साम्राज्यवाद’ के विरोध में दुनिया एक हो

Spread the love




ट्रम्प की लेन-देन आधारित, प्रभाव-क्षेत्रों वाली भू-राजनीतिक और वैश्विक आर्थिक सोच ऊपर से जितनी बेतरतीब दिखती है, वैसी वह है नहीं। ध्यान से देखें तो आपको उनकी सोच के पीछे स्पष्ट पैटर्न नजर आ सकते हैं। इसकी साफ झलक मादुरो के अपहरण और वेनेजुएला के तेल भंडारों पर नियंत्रण हासिल करने के लिए वहां एक कठपुतली सरकार स्थापित करने की कोशिशों में दिखती है। ट्रम्प के “डोनरो डॉक्ट्रिन’ के केंद्र में यह विश्वास है कि अमेरिका अपने स्वघोषित “बैकयार्ड’ में बेधड़क होकर जो चाहे कर सकता है। इससे दुनिया में यह संकेत जाता है कि दूसरी अन्य महाशक्तियां- विशेष रूप से चीन भी अपने क्षेत्र में ऐसा कर सकता है। अमेरिका अपने लिए यह अधिकार भी सुरक्षित रखता है कि वह जहां चाहे अपने रणनीतिक हितों को आगे बढ़ाए- जिसमें ग्रीनलैंड भी शामिल है। ट्रम्प के इस रवैये को भारतीय अर्थशास्त्री प्रभात पटनायक ने सटीक शब्दों में “गैंग्स्टर साम्राज्यवाद’ कहा है। यह पूंजीवाद की औपनिवेशिक जड़ों की याद दिलाता है, जब लोगों और राज्यों के बीच के रिश्ते उनकी ताकत के आधार पर तय होते थे। इससे जुड़े गहरे नैतिक और वैधानिक सवालों को एक क्षण के लिए अलग रख दें, तब भी मूल प्रश्न बना रहता है कि क्या यह रणनीति वास्तव में काम कर सकती है? क्या दुनिया को बड़ी शक्तियों के बीच बांट देना खुद पूंजीवाद की स्थिरता और गतिशीलता के लिए अच्छा है, जबकि वैश्विक अर्थव्यवस्था पहले से कहीं अधिक अस्थिर और दिशाहीन दिखाई दे रही है? इतिहास के सबक तो हमें यही बताते हैं कि इसका उत्तर स्पष्ट रूप से ‘नहीं’ है। पिछली दो सदियों में पूंजीवाद कभी प्रतिस्पर्धी राष्ट्रों के बीच तीखे टकराव के दौर से गुजरा है तो कभी ऐसे कालखंडों से जब एकमात्र प्रभुत्वशाली महाशक्ति नियम बनाने वाली और उन्हें लागू करने वाली- दोनों की भूमिका में रही है। उन्नीसवीं सदी में यह भूमिका यूके ने निभाई थी, जिसने अपने यूरोपीय प्रतिद्वंद्वियों से कहीं बड़ा औपनिवेशिक साम्राज्य खड़ा किया था। बीसवीं सदी के मध्य से यह स्थान मुख्यतः अमेरिका के पास रहा है। ट्रम्प की विदेश-नीति की बुनियाद इस धारणा पर टिकी है कि जिस अमेरिकी-नेतृत्व वाली वैश्वीकरण की प्रक्रिया ने कभी अमेरिकी पूंजी के हित साधे थे, उसके लाभ अब चीन जैसी शक्तियों के उभार के साथ घट चुके हैं। और इसका इलाज यह है कि सैन्य-वर्चस्व और आर्थिक ताकत के बल पर उन क्षेत्रों में संसाधनों और बाजारों पर नियंत्रण स्थापित किया जाए, जिन्हें वे अमेरिका के प्रभाव-क्षेत्र के रूप में देखते हैं। इसका अर्थ है अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के दिखावे तक को त्याग देना, लोकतंत्र और मानवाधिकारों के नाम पर ओढ़ी गई शालीनता को ताक पर रख देना और खुलेआम उस पुराने सिद्धांत को अपनाना, जिसमें ताकत ही अधिकार बन जाती है और जिसमें संसाधनों की लूट को हर लिहाज से जायज ठहराया जाता है। लेकिन यह रणनीति जहां अमेरिकी मजदूरों और छोटे कारोबारों के लिए विनाशकारी है, वहीं यह बड़ी अमेरिकी कंपनियों के हितों को भी कमजोर करती है। आर्थिक संसाधन अलग-अलग प्रभाव-क्षेत्रों में बंद नहीं रहते। बाजार एक-दूसरे में गुंथे होते हैं। अमेरिकी कॉर्पोरेट के कुछ हिस्सों को भले इससे लाभ हो- जैसे कि सैन्य-औद्योगिक कॉम्प्लेक्स जिसने यूक्रेन और मध्य पूर्व के युद्धों से भारी मुनाफा कमाया है- लेकिन अन्य हितों को नुकसान होगा। वे बहुराष्ट्रीय कंपनियां खासी प्रभावित होंगी, जो भौगोलिक रूप से फैली आपूर्ति शृंखलाओं पर निर्भर हैं। जो वित्तीय संस्थान निर्बाध कैपिटल-फ्लो के आदी हैं, उनके अवसर सिमटेंगे। और बिग टेक कंपनियां- जिनका पूरा कारोबार ही दुनिया भर से डेटा तक पहुंच पर टिका है- खुद को प्रमुख बाजारों से बाहर पाएंगी। आज की वैश्विक चुनौतियों को देखते हुए यह साफ है कि ट्रम्प की मनमानी का सामना करने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग पहले से कहीं ज्यादा जरूरी हो गया है। सामूहिक कार्रवाई अब कोई विकल्प नहीं, एकमात्र रास्ता बन गई है।
(@प्रोजेक्ट सिंडिकेट)



Source link

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *