जयती घोष का कॉलम:  महाशक्तियों के टकराव में विकासशील देश पिस रहे हैं
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जयती घोष का कॉलम: महाशक्तियों के टकराव में विकासशील देश पिस रहे हैं

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6 घंटे पहले

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जयती घोष मैसाचुसेट्स एमहर्स्ट यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर - Dainik Bhaskar

जयती घोष मैसाचुसेट्स एमहर्स्ट यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर

ट्रम्प के व्यापक टैरिफ ने जो आर्थिक अराजकता फैलाई है, उसका खामियाजा विकासशील देशों को भुगतना पड़ेगा। बाजारों को तब थोड़ी राहत महसूस हुई थी, जब ट्रम्प ने अपने ज्यादातर ‘जैसे को तैसा’ टैरिफ पर 90 दिन के विराम की घोषणा की थी। हालांकि चीन को इससे बाहर रखा और उलटे उसका टैरिफ बढ़ाकर 245 फीसदी कर दिया था। टैरिफ से वैश्विक व्यापार और वित्त में उथल-पुथल के जोखिम बने हुए हैं।

अमेरिकी आयातों पर सार्वभौमिक 10% टैरिफ अब भी लागू है। स्टील, एल्युमीनियम, ऑटोमोबाइल और ऑटो पार्ट्स पर 25% का सेक्टर-विशेष टैरिफ भी लागू है। स्मार्टफोन, कंप्यूटर और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को छूट मिली है, जबकि फार्मास्यूटिकल्स, सेमीकंडक्टर, कॉपर और लकड़ी पर नए शुल्क लगाने की धमकी दी गई है।

कुल मिलाकर, इन उपायों से आयातित वस्तुओं की उपलब्धता कम हो जाएगी, अमेरिकी उपभोक्ताओं के लिए कीमतें बढ़ जाएंगी और निर्यातक देशों पर भारी लागत आएगी। लेकिन आखिरकार, हर देश पर लगाए जाने वाले टैरिफ, भविष्य में होने वाली बातचीत पर निर्भर होंगे, जहां अमेरिका के कठोर रुख की आशंका है। ट्रम्प ने विदेशी नेताओं के प्रति पहले ही नापसंदगी जता दी है।

चीनी इनपुट पर निर्भर अमेरिकी उपभोक्ताओं और घरेलू उत्पादकों के लिए निहितार्थ बहुत गहरे हैं। चीनी स्वामित्व वाली फैक्ट्रियों से निकलने वाले उत्पादों के प्रति ट्रम्प के खुले अविश्वास ने अमेरिकी बाजार तक पहुंच बनाए रखने की उम्मीद रखने वाली सरकारों को वैकल्पिक सोर्सिंग और उत्पादन विकल्प तलाशने पर मजबूर कर दिया है।

वैश्विक सप्लाई चेन के लिए बाधाएं आएंगी। ट्रम्प की नीतियों की अनिश्चितता ने भविष्य के घटनाक्रमों का अनुमान लगाना लगभग असंभव बना दिया है। बेतरतीब फैसले, अचानक उलटफेर और बार-बार घोषणाएं करना समस्या को और बढ़ा देता है।

बढ़ती अनिश्चितता से निवेश का कम होना तय है क्योंकि व्यवसाय नई परियोजनाएं रद्द कर देंगे और विस्तार की योजनाओं को रोक देंगे। वे होने वाले घटनाक्रमों का इंतजार करेंगे। इसके बाद की मंदी अमेरिकी विकास और रोजगार पर भारी पड़ सकती है, जिसके परिणाम ट्रम्प के टैरिफ के प्रत्यक्ष आर्थिक प्रभावों से कहीं ज्यादा होंगे।

इससे भी बुरी बात यह है कि अमेरिका, चीन से व्यापार युद्ध में नहीं जीत सकता। चीनी सरकार यह जानती है और वह लंबी अवधि का खेल खेल रही है। दो महाशक्तियों के बीच आर्थिक युद्ध किसी भी समय बड़े वित्तीय संकट या सैन्य टकराव में बदल सकता है।

खतरे की घंटी पहले ही बज चुकी है। लंबे समय से दुनिया की सबसे सुरक्षित संपत्ति माने जाने वाले अमेरिकी ट्रेजरी बिलों की मांग में गिरावट अमेरिका के आर्थिक नेतृत्व में कम होते भरोसे का संकेत है। इसके अलावा अमेरिकी स्टॉक, बॉन्ड और डॉलर में एक साथ गिरावट, संपत्ति की कीमतों के वैश्विक बेंचमार्क के तौर पर अमेरिकी ट्रेजरी की क्षमता पर संदेह को दर्शा रही है।

जैसा कि पिछले आर्थिक संकटों में हुआ था, अमेरिकी अर्थव्यवस्था प्रभावित तो होगी, लेकिन सबसे भारी बोझ विकासशील देशों पर पड़ेगा। रद्द या विलंबित निर्यात ऑर्डर पहले से ही उत्पादन को कमजोर कर रहे हैं और बेरोजगारी को बढ़ावा दे रहे हैं।

विकासशील देशों के सॉवरेन बॉन्ड के यील्ड स्प्रेड पर पहले ही असर दिखने लगा है, खासतौर पर निम्न और मध्यम आय वाली अर्थव्यवस्थाओं में। मालदीव, श्रीलंका, गैबॉन और जाम्बिया जैसे कर्ज के बोझ में दबे देशों के सॉवरेन बॉन्ड में 10% से अधिक की गिरावट आई।

दुर्भाग्य से, विकासशील देश इस तरह की वित्तीय और आर्थिक उथल-पुथल से बहुत परिचित हैं। दशकों से कई देश मुद्रा अवमूल्यन, बढ़ती उधारी लागत, तनावपूर्ण सार्वजनिक वित्त, जबरन खर्च में कटौती और घरेलू बाजार की अस्थिरता के चक्र में फंसे हुए हैं, जिसने निवेश और निजी क्षेत्र की गतिविधि को बाधित किया है।

ट्रम्प के टैरिफ से आयातित वस्तुओं की उपलब्धता कम हो जाएगी, अमेरिकी उपभोक्ताओं के लिए कीमतें बढ़ जाएंगी और निर्यातक देशों पर भारी लागत आएगी। ग्लोबल ट्रेड में गिरावट आ रही है, वैश्वीकरण कम आकर्षक हो रहा है।

(© प्रोजेक्ट सिंडिकेट)

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