जया एकादशी आज, जानिए व्रत की विधि और कथा:  श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को बताया था इस एकादशी से मिलता है हजार सालों की तपस्या करने जितना पुण्य
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जया एकादशी आज, जानिए व्रत की विधि और कथा: श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को बताया था इस एकादशी से मिलता है हजार सालों की तपस्या करने जितना पुण्य

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आज जया एकादशी है। इसे कुछ क्षेत्रीय परंपराओं में भीष्म एकादशी भी कहते हैं। मान्यता है कि सूर्य के उत्तरायण होने के बाद पितामह भीष्म ने इसी दिन शरीर त्याग करने का पूरा मन बनाया था। माघ महीने की इस एकादशी का महत्व पद्म पुराण में बताया है। भविष्य पुराण में श्रीकृष्ण और युधिष्ठिर संवाद में इस एकादशी का जिक्र है। स्कंद पुराण में भी जया एकादशी व्रत के नियम और व्रत करने का फल बताया है। भविष्योत्तर पुराण में लिखा है कि जब युधिष्ठिर ने माघ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी के फल और विधि के बारे में पूछा, तब श्रीकृष्ण ने उन्हें इस एकादशी की कथा और विधि सुनाई। श्रीकृष्ण ने इसे पापियों के पाप दूर करने वाली और मुक्ति देने वाली एकादशी बताया है। सबसे पहले श्रीकृष्ण ने ही इस एकादशी के बारे में बताया है। पद्म पुराण में बताई जया एकादशी की कथा धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पुछा – माघ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या नाम है, इसकी विधि क्या है और इसे करने से क्या फल मिलता है?
श्रीकृष्ण ने कहा – इसे जया एकादशी कहते हैं। यह एकादशी पुण्य देने वाली है। ये मनुष्यों के सभी पापों का नाश कर उसे पिशाच योनि से मुक्ति दिलाती है। इस विषय में तुम्हें एक प्राचीन कथा सुनाता हूँ। प्राचीन काल में स्वर्ग के नंदन वन में इंद्र की सभा लगी थी। वहां माल्यवान नाम का गंधर्व गाना गा रहा था और पुष्पवती नाम की अप्सरा नृत्य कर रही थी। इस दौरान दोनों एक-दूसरे पर मोहित हो गए, जिससे उनके गाने और नाचने की लय बिगड़ गई। इसे इंद्र ने सभा का अपमान माना और दोनों को स्वर्ग से निकालकर धरती पर पिशाच बनने का श्राप दे दिया। श्राप के कारण दोनों हिमालय की तराई में पिशाच बनकर रहने लगे। वहां उनका न तो खाना मिलता था, न पानी और न ही वो सो पाते थे। भूख और कड़ाके की ठंड से परेशान रहते थे। संयोग से माघ महीने के शुक्ल पक्ष एकादशी के दिन अत्यधिक दुख के कारण उन्होंने पूरे दिन कुछ नहीं खाया और रात भर ठंड के कारण जागते हुए भगवान को याद करते रहे। अनजाने में ही उनसे जया एकादशी का पूरा उपवास और रात्रि जागरण हो गया। इस कठिन व्रत से भगवान विष्णु प्रसन्न हुए और अगले दिन सुबह होते ही दोनों पिशाच योनि से निकलकर अपने दिव्य गंधर्व और अप्सरा के स्वरूप में आ गए। आकाश से विमान आया और वे स्वर्ग पहुँचे। इंद्र ने जब उन्हें दोबारा दिव्य रूप में देखा तो आश्चर्य से इसकी वजह पुछी। माल्यवान ने बताया कि यह भगवान विष्णु की कृपा और जया एकादशी व्रत से हुआ। इंद्र बहुत खुश हुए और उन्हें दोबारा स्वर्ग में जगह दे दी। व्रत का फल (फलश्रुति)
भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा – जो लोग पूरी श्रद्धा से जया एकादशी का व्रत करते हैं। उन्हें हजार सालों की तपस्या के समान फल मिलता है। जो इस कथा को पढ़ते या सुनते हैं, वो ब्रह्महत्या जैसे पापों से मुक्त होकर स्वर्ग के अधिकारी बनते हैं। पद्म पुराण के अनुसार जया एकादशी व्रत करने का प्रामाणिक तरीका
एकादशी व्रत तीन दिनों की प्रक्रिया है। यानी इसमें दशमी, एकादशी और द्वादशी तीनों दिन शामिल होते हैं। एकादशी व्रत एक दिन पहले से ही शुरू हो जाता है। दशमी तिथि पर सात्विक भोजन करना चाहिए। सूर्यास्त के बाद खाना न खाएं। एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठकर नहाएं और व्रत करने का संकल्प लें। इस दिन ‘निराहार’ यानी बिना भोजन किए रहने का विधान है। सेहत ठीक न हो तो ‘फलाहार’ किया जा सकता है, लेकिन अन्न यानी चावल, गेहूं और किसी भी तरह का अनाज नहीं खाया जाता। पूरे दिन भगवान का नाम जप और पूजा होती है। रात को जागरण करते हुए कीर्तन किया जाता है। अगले दिन यानी द्वादशी को ब्राह्मण भोजन करवाने के बाद ‘पारण’ यानी व्रत खोला जाता है।



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