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8 घंटे पहलेलेखक: शिवाकान्त शुक्ल
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देश में नवरात्रि का पर्व उत्साह और भक्ति के साथ मनाया जा रहा है। जगह-जगह पंडाल सजे हैं, गरबा हो रहे हैं और माता के भजनों से माहौल भक्तिमय है। कई जगह मेलों की भी रौनक है। इन आयोजनों में एक चीज कॉमन है, वह है लाउडस्पीकर, जिनकी आवाज उत्सव के माहौल को और जीवंत बना देती है।
हालांकि, लाउडस्पीकर की आवाज जरूरत से ज्यादा तेज हो या लंबे समय तक उसके संपर्क में रहें तो सेहत पर बुरा असर पड़ता है। इससे सुनने की क्षमता प्रभावित होने के साथ ब्लड प्रेशर और दिल की धड़कन में भी बदलाव होते हैं। तेज शोर से हार्ट डिजीज का रिस्क बढ़ता है। कई मामलों में मौत भी हो जाती है।
साल 2025 में ‘नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन’ में पब्लिश एक मेटा-एनालिसिस के मुताबिक, लाउडस्पीकर की तेज आवाज से हाई BP, हार्ट डिजीज और स्ट्रोक का रिस्क बढ़ जाता है। ऐसे में लाउडस्पीकर से जुड़ी सावधानियों को समझना जरूरी है।
इसलिए आज ‘जरूरत की खबर’ में लाउडस्पीकर की तेज आवाज के संभावित हेल्थ रिस्क को समझेंगे। साथ ही जानेंगे कि-
- लाउडस्पीकर की तेज आवाज किन लोगों के लिए ज्यादा रिस्की है?
- भारत में लाउडस्पीकर साउंड को लेकर क्या नियम हैं?
एक्सपर्ट– डॉ. अरविंद अग्रवाल, डायरेक्टर, इंटरनल मेडिसिन, श्री बालाजी एक्शन मेडिकल इंस्टीट्यूट, दिल्ली
स्टोरी में आगे बढ़ें, उससे पहले पिछले कुछ सालों में लाउडस्पीकर की तेज आवाज से हुई मौतों के मामलों पर एक नजर डाल लेते हैं…

सवाल- लाउडस्पीकर की तेज आवाज हमारे ब्रेन और बॉडी पर क्या असर डालती है?
जवाब- इसका असर इस बात पर निर्भर करता है कि आवाज कितनी तेज है और हम कितनी देर तक उसके संपर्क में रहते हैं। सामान्य बातचीत की आवाज करीब 60 डेसिबल (dB) होती है, जबकि तेज लाउडस्पीकर की आवाज 85 से 110 डेसिबल या इससे ज्यादा होती है। डेसिबल आवाज की तीव्रता मापने की इकाई है। लंबे समय तक तेज शोर के संपर्क में रहने से कानों के साथ हमारे कई अंग प्रभावित होते हैं। इसे पॉइंटर्स से समझिए-
- तेज आवाज कान के जरिए ब्रेन तक पहुंचती है।
- ब्रेन इसे खतरे या तनाव के संकेत की तरह महसूस करता है।
- इससे शरीर का ‘स्ट्रेस सिस्टम’ एक्टिव होता है और एड्रेनलिन-कॉर्टिसोल जैसे हार्मोन रिलीज होते हैं।
- इसका असर नींद, ब्लड प्रेशर और हार्ट पर पड़ता है। इससे लंबे समय में हार्ट डिजीज का रिस्क बढ़ता है।
- लगातार शोर से सिरदर्द, चिड़चिड़ापन, थकान और फोकस में परेशानी होती है।
- तेज आवाज कान के अंदर मौजूद नाजुक हेयर सेल्स को नुकसान पहुंचाती है। इससे सुनने की क्षमता कम हो सकती है।
सभी रिस्क ग्राफिक में देखिए-

सवाल- तेज आवाज का हमारे हार्ट पर क्या असर होता है?
जवाब- इसे पॉइंटर्स से समझिए-
- तेज शोर का लगातार संपर्क ब्लड वेसल्स की अंदरूनी लेयर (एंडोथीलियम) की फंक्शनिंग को प्रभावित करता है।
- इससे ब्लड वेसल्स का फैलना और सिकुड़ना प्रभावित होता है और ब्लड प्रेशर कंट्रोल करने में परेशानी हो सकती है।
- लंबे समय तक शोर के संपर्क में रहने से हाई ब्लड प्रेशर का रिस्क बढ़ता है।
- हाई BP हार्ट पर प्रेशर बढ़ाता है। इससे समय के साथ हार्ट डिजीज का रिस्क बढ़ता है।
सवाल- तेज आवाज का कानों पर क्या असर होता है?
जवाब- इसे पॉइंटर्स समझिए-
- तेज आवाज से कान के पर्दे में कंपन होता है, जो कान के अंदरूनी हिस्से तक पहुंचता है। वहां मौजूद हेयर सेल्स पर इसका असर पड़ता है।
- तेज शोर के कारण इन सेल्स में ऑक्सिडेटिव स्ट्रेस बढ़ता है, जिससे उनकी काम करने की क्षमता प्रभावित होती है।
- हेयर सेल्स या उनसे जुड़े नर्व सिग्नल में गड़बड़ी होने पर कानों में सीटी, घंटी या भनभनाहट सुनाई दे सकती है।
- बार-बार या लंबे समय तक तेज आवाज के संपर्क से हेयर सेल्स स्थायी रूप से डैमेज हो सकते हैं।
- चूंकि इंसानों में ये सेल्स दोबारा नहीं बनते, इसलिए इनके नुकसान से सुनने की क्षमता स्थायी रूप से कम हो सकती है।

सवाल- लाउडस्पीकर की तेज आवाज किन लोगों के लिए ज्यादा रिस्की है?
जवाब- कुछ लोगों में तेज शोर का असर ज्यादा गंभीर हो सकता है। किन्हें रिस्क ज्यादा है, ग्राफिक में देखिए-

सवाल- कितने डेसीबल (dB) की आवाज को तेज या खतरनाक माना जाता है?
जवाब- इसका खतरा सिर्फ डेसीबल पर नहीं, बल्कि कितनी देर और कितनी बार उसके संपर्क में रहते हैं, इस पर निर्भर करता है।
आमतौर पर 85 dB या उससे ज्यादा आवाज में लंबे समय तक रहने से सुनने की क्षमता प्रभावित होती है। 100–120 dB की तेज आवाज में थोड़ी देर रहने से भी सुनने की क्षमता को नुकसान पहुंचता है। इसे ग्राफिक से समझिए-

सवाल- लाउडस्पीकर से होने वाले शोर से कैसे बचें?
जवाब- तेज आवाज से बचने के लिए सबसे जरूरी है कि साउंड से दूरी और एक्सपोजर टाइम दोनों कम रखें। सभी सावधानियां ग्राफिक में देखिए-

सवाल- भारत में लाउडस्पीकर साउंड को लेकर क्या नियम हैं?
जवाब- भारत में लाउडस्पीकर और पब्लिक एड्रेस सिस्टम के इस्तेमाल के लिए नॉइज पॉल्यूशन (रेगुलेशन एंड कंट्रोल) रूल्स, 2000 लागू हैं। इनके तहत-
- लाउडस्पीकर चलाने के लिए संबंधित अथॉरिटी से लिखित अनुमति जरूरी है।
- रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक लाउडस्पीकर या साउंड एम्प्लीफायर के इस्तेमाल पर रोक है।
- राज्य सरकार सांस्कृतिक, धार्मिक या त्योहारों के मौकों पर रात 10 बजे से 12 बजे तक सीमित छूट दे सकती है। यह छूट साल में अधिकतम 15 दिनों तक हो सकती है।
- शोर की सीमा इलाके के हिसाब से तय है। रेजिडेंशियल एरिया में दिन में 55 dB और रात में 45 dB, जबकि साइलेंस जोन में 50 dB और 40 dB की सीमा है।
- अस्पताल, शिक्षण संस्थान और कोर्ट के आसपास घोषित साइलेंस जोन में लाउडस्पीकर के इस्तेमाल पर विशेष प्रतिबंध लागू होते हैं।
सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड ने अलग-अलग क्षेत्रों के लिए शोर की अधिकतम सीमा तय की है। ग्राफिक में देखिए-

सवाल- तय सीमा से ज्यादा शोर होने पर कहां और कैसे शिकायत करें?
जवाब- इसे पॉइंटर्स से समझिए-
- संबंधित थाना या पुलिस चौकी में शिकायत दर्ज कराएं।
- राज्य के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (SPCB) से भी शिकायत कर सकते हैं।
- शिकायत में स्थान, समय और शोर का सोर्स स्पष्ट बताएं।
- संभव हो तो वीडियो या फोटो जैसे सबूत रखें।
- रात 10 बजे के बाद लाउडस्पीकर चलने पर समय जरूर बताएं।
सवाल- नियम तोड़ने पर क्या कार्रवाई हो सकती है?
जवाब- तय सीमा से ज्यादा शोर करने या बिना अनुमति लाउडस्पीकर चलाने पर पुलिस/प्रशासन कार्रवाई कर सकता है। स्थिति के अनुसार-
- लाउडस्पीकर या साउंड सिस्टम बंद कराया जा सकता है।
- उपकरण जब्त किए जा सकते हैं।
- नियमों के तहत कानूनी कार्रवाई भी हो सकती है।
- कार्रवाई और जुर्माने की राशि मामले और लागू राज्य/स्थानीय नियमों के अनुसार अलग हो सकती है।
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ग्राफिक्स- महेंद्र वर्मा
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