![]()
कंदनी कुमारी झारखंड के लातेहार जिले में रहने वाली 16 साल की लड़की है। उसका नाम स्कूल रजिस्टर और सर्टिफिकेट में सही लिखा है, पर आधार कार्ड में कुमारी कांतनी किरण लिखा है। उसने चार बार आधार सुधारने की कोशिश की, लेकिन हर बार आवेदन रिजेक्ट हो गया। आप भी ऐसे बच्चों या बड़ों को जानते होंगे, जिन्हें ऐसी ही समस्याएं हैं। उनके आधार कार्ड पर उनका नाम या दूसरी जानकारी, स्कूल सर्टिफिकेट, बैंक अकाउंट या वोटर आईडी पर दी गई जानकारी से मेल नहीं खाती। इन गलतियों को ठीक करवाना कम पढ़े-लिखे व गरीब लोगों के लिए मुश्किल, महंगा और समय लेने वाला होता है। इन असंगतियों का कारण यह है कि आधार डेटाबेस में डेमोग्राफिक डिटेल्स भरोसेमंद नहीं हैं। नाम अकसर जल्दबाजी में, सही वर्तनी पर ध्यान दिए बिना डाले गए। जन्मतिथियां मौके पर ही बना दी गईं। साथ ही, कई लोगों के कई नाम होते हैं, या एक ही नाम की कई वर्तनी होती हैं। सरिता उरांव नाम की आदिवासी महिला को सरिता देवी या सरिता ओराइन के नाम से भी जाना जा सकता है। शुरुआती वर्षों में, जब बड़े पैमाने पर आधार नंबर जारी किए जा रहे थे, तब यूआईडीएआई डेमोग्राफिक डिटेल्स को लेकर ज्यादा चिंतित नहीं थी। उस समय ये डिटेल्स शेयर नहीं किए जाने थे। आधार का मुख्य मकसद बायोमैट्रिक सत्यापन था। इसका मतलब है किसी व्यक्ति का आधार नंबर बायोमैट्रिक रीडर में डालना, उसकी उंगली या आंखों को स्कैन करना और सत्यापित करना कि वह नंबर उसी व्यक्ति का है। इसके लिए नाम, जन्मतिथि या पते जैसे डिटेल्स की जरूरत नहीं होती। लेकिन बाद में आधार का इस्तेमाल सिर्फ बायोमैट्रिक सत्यापन के लिए ही नहीं, ई-केवाईसी के लिए भी होने लगा। अगर आपका बैंक अकाउंट है, तो आप ई-केवाईसी से परिचित होंगे। जब बैंक में आपका बायोमैट्रिक सत्यापन होता है, तो बैंक आधार डेटाबेस से आपका नाम और दूसरे डिटेल्स निकालता है। फिर वह इनकी तुलना अपने रिकॉर्ड में मौजूद डिटेल्स से करता है। अगर डिटेल्स मेल खाते हैं, तो आपका ई-केवाईसी सफल होता है। अगर नहीं, तो बैंक आपके अकाउंट को तब तक फ्रीज कर सकता है, जब तक कि असंगतियां ठीक नहीं हो जातीं। कई लोगों के लिए इन असंगतियों को ठीक करना मुश्किल होता है। अगर आपके आधार और बैंक अकाउंट में नाम की वर्तनी अलग-अलग है, तो इसे कैसे ठीक किया जाएगा? एक तरीका यह है कि बैंक अकाउंट में वर्तनी ठीक कर ली जाए। लेकिन यह जटिल हो सकता है और बैंक मैनेजर ऐसा करने से हिचकिचाते हैं। इसके बजाय वे ग्राहक से आधार ठीक करवाने के लिए कहते हैं। लेकिन यह भी मुश्किल हो सकता है। पिछले कुछ वर्षों में बैंकिंग सिस्टम में ई-केवाईसी की वजह से बहुत दिक्कतें आई हैं। लाखों लोग आधार और बैंक रिकॉर्ड में असंगतियों की वजह से अपने खाते से बाहर हो गए। ऐसी समस्याएं दूसरे मामलों में भी सामने आ रही हैं। उदाहरण के लिए, बच्चों की “अपार’ आईडी तब तक नहीं बन सकती, जब तक स्कूल रिकॉर्ड में नाम की वर्तनी आधार से मेल न खाए। और अकसर दोनों में फर्क होता है, जैसा कि कंदनी के साथ हुआ। उसका अकाउंट खोलते समय बैंक ने आधार का इस्तेमाल किया था। अगर वह आधार को स्कूल सर्टिफिकेट से मिलाने के लिए ठीक करवाती है, तो नई असंगति सामने आ जाएगी। यह सब आधार में डेमोग्राफिक डेटाबेस के भरोसेमंद नहीं होने के कारण हो रहा है। चूंकि यूआईडीएआई इस डेटाबेस का निर्माता और संरक्षक है, इसलिए उसे इसके लिए जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए। दुर्भाग्य से, यूआईडीएआई पर संसदीय निगरानी का प्रावधान आधार एक्ट से हटा दिया गया था। (ये लेखक के अपने विचार हैं)
Source link








