ज्यां द्रेज का कॉलम:  देश में स्वास्थ्य सेवाएं मुनाफे से प्रेरित नहीं होनी चाहिए
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ज्यां द्रेज का कॉलम: देश में स्वास्थ्य सेवाएं मुनाफे से प्रेरित नहीं होनी चाहिए

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फिल्म ‘हजारों ख्वाहिशें ऐसी’ का एक दृश्य मुझे याद आता है। क्रोधित मजदूर जमींदार को मारना चाहते हैं। लेकिन जब डर के मारे जमींदार को हार्ट अटैक आ जाता है, तो वे उसकी मदद के लिए दौड़ पड़ते हैं। लेकिन अगर मजदूर जमींदार को मारना चाहते थे तो उसकी जान क्यों बचा रहे हैं? शायद उन्हें लगता है बीमार होने पर दुश्मन को भी सहायता का हक है। कई देशों ने स्वास्थ्य सेवा के अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए कड़ी मेहनत की है। सोवियत रूस पहला देश था, जिसने सभी को मुफ्त सार्वजनिक सुविधा के रूप में स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराई। 30 के दशक में श्रीलंका और न्यूजीलैंड ने सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवा की शुरुआत की। 1948 में ब्रिटेन ने नेशनल हेल्थ सर्विस की स्थापना की, जो आज तक सभी नागरिकों को निःशुल्क स्वास्थ्य सेवा प्रदान करती है। आज दुनिया के अधिकांश विकसित देश किसी न किसी रूप में सभी लोगों को मुफ्त स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध करा रहे हैं। मुख्य अपवाद अमेरिका है। इनमें से कई देश सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवा सुनिश्चित करने के लिए कुछ हद तक स्वास्थ्य बीमा पर निर्भर करते हैं। हालांकि यह व्यावसायिक बीमा के बजाय सामाजिक बीमा के रूप में होता है। इसका एक उदाहरण कनाडा है। वहां स्वास्थ्य बीमा अनिवार्य और सार्वभौमिक है। सभी निवासी एक समान स्वास्थ्य बीमा योजना में शामिल होते हैं। वहां सार्वजनिक और निजी- दोनों तरह के स्वास्थ्य केंद्र हैं, लेकिन अधिकांश निजी स्वास्थ्य केंद्र गैर-लाभकारी हैं। सामाजिक बीमा वाले अन्य देशों में भी अधिकांश स्वास्थ्य केंद्र गैर-लाभकारी ही होते हैं, चाहे सार्वजनिक हों या निजी। लाभकारी स्वास्थ्य केंद्रों को कड़ाई से नियंत्रित किया जाता है। भारत में सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में सभी के लिए निःशुल्क स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध होने की बात कही जाती है। लेकिन वास्तव में ये सेवाएं बहुत सीमित हैं और मरीजों को अक्सर दवाइयों या जांच के लिए पैसे देने पड़ते हैं। इसके अलावा, सरकारी अस्पतालों में बहुत भीड़ होती है। जब मरीज सरकारी अस्पतालों से निराश हो जाते हैं तो वे निजी अस्पतालों या नर्सिंग होम की ओर जाते हैं। वे भारी शुल्क वसूलते हैं, लेकिन सेवाएं अच्छी हों- इसकी गारंटी नहीं होती। हाल के वर्षों में सरकार द्वारा प्रायोजित स्वास्थ्य बीमा योजनाएं बढ़ी हैं। प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना लगभग 60 करोड़ लोगों को प्रति वर्ष 5 लाख रु. का स्वास्थ्य बीमा कवर प्रदान करती है। राज्य सरकारों द्वारा संचालित कई स्वास्थ्य बीमा योजनाएं भी हैं। इन योजनाओं में नामांकित मरीज किसी भी स्वास्थ्य केंद्र में जा सकते हैं। उन्हें निर्धारित प्रोटोकॉल के अनुसार निःशुल्क उपचार प्राप्त करने का अधिकार है। लेकिन कई बार निजी अस्पताल मरीजों से शुल्क वसूलते हैं। ये स्वास्थ्य बीमा योजनाएं, सामाजिक बीमा प्रणालियों के विपरीत लाभकारी सेवाओं को बढ़ावा देती हैं। उदाहरण के लिए, जन आरोग्य योजना के तहत पैनल में शामिल लगभग आधे अस्पताल लाभकारी हैं और लगभग दो-तिहाई धनराशि इन्हें ही दी जाती है। स्वास्थ्य बीमा भारत की स्वास्थ्य सेवा प्रणाली की व्यावसायिक क्षेत्र पर निर्भरता को और गहराता है। लाभ-प्रेरित स्वास्थ्य सेवा न तो न्यायसंगत होती है और न ही दक्ष। यह न्यायसंगत इसलिए नहीं है, क्योंकि गरीब लोगों को स्वास्थ्य सेवा से बाहर कर देती है। और यह दक्ष इसलिए नहीं है, क्योंकि बाजार-तंत्र की दक्षता उपभोक्ताओं की उत्पाद का आकलन करने की क्षमता पर निर्भर करती है। यदि आप छाता खरीदना चाहते हैं, तो आप उसे पहले देख सकते हैं और उसके डिजाइन, रंग, सामग्री, दाम आदि के आधार पर तय कर सकते हैं कि वह आपको पसंद है या नहीं। लेकिन जब आप स्वास्थ्य सेवा खरीदते हैं, तो आप उस ‘उत्पाद’ को पहले से नहीं देख सकते और किसी भी स्थिति में उसका मूल्यांकन करने में सक्षम नहीं होते। आप पूरी तरह डॉक्टर पर निर्भर होते हैं। यही कारण है कि निजी स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में इतना शोषण दिखता रहता है। यदि भारत स्वास्थ्य के अधिकार को साकार करना चाहता है, तो उसे सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं में भारी निवेश करना होगा। अच्छे स्वास्थ्य के बिना विकसित भारत का कोई अर्थ नहीं है। आदर्श रूप से स्वास्थ्य सेवा सार्वजनिक सेवा होनी चाहिए, न कि मुनाफा-प्रेरित व्यवसाय। दुनिया भर में सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवा की रीढ़ गैर-लाभकारी स्वास्थ्य सेवाएं हैं। अच्छे स्वास्थ्य के बिना विकसित होने का अर्थ नहीं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)



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