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शाम के करीब सात बजे का समय है। गुरुग्राम के एक कैफे में 20-25 युवा घेरा बनाकर बैठे हैं। कोई आईटी प्रोफेशनल है, कोई कॉलेज छात्र, तो कोई स्टार्टअप में काम करता है। गिटार, कांगो और ढोलक की धुनों के बीच शुरू होता है सामूहिक हनुमान चालीसा का पाठ..इसे ये युवा ‘स्पिरिचुअल जैमिंग’ कहते हैं। हर मंगलवार यहां यह अनोखा संगम बनता है, जहां भक्ति और म्यूजिक साथ चलते हैं। गुरुग्राम से करीब 2200 किमी दूर चेन्नई में कुछ ऐसा ही नजारा है। यहां गुड डीड्स क्लब की ‘भजन क्लबिंग’ में युवा आधुनिक वाद्ययंत्रों और धुनों के साथ भजन और सूफी गीतों को क्लब-स्टाइल ऊर्जा में पेश कर रहे हैं। कुछ युवा इन भजनों पर झूम रहे हैं कुछ आंख बंद करके ध्यान मुद्रा में बैठे हैं। संकेत साफ हैं, भारत की नई पीढ़ी धर्म को अपने तरीके से जी रही है, जहां परंपरा और टेक्नोलॉजी, भक्ति और ब्रांडिंग साथ-साथ चल रहे हैं। धार्मिकता और आध्यात्मिकता मंदिरों-मठों से निकलकर कैफे, को-वर्किंग स्पेस और डिजिटल कम्युनिटी तक पहुंच चुकी है। भारतीय युवाओं में बढ़ रही है धार्मिकता – प्यू रिसर्च के अनुसार दुनिया के कई देशों में धर्म छोड़ने वाले बढ़ रहे हैं और 2025 में दुनिया की 25% आबादी ऐसी थी जो किसी धर्म को नहीं मानती थी। इसके विपरीत, भारत की युवा आबादी, जो इसकी कुल जनसंख्या का 65% है, धर्म और आध्यात्मिकता से फिर से जुड़ती दिख रही है। लगभग 97% भारतीय अपने आराध्य में विश्वास रखते हैं। – लगभग 60% भारतीय नियमित रूप से प्रार्थना या पूजा करते हैं, जो दुनिया के कई विकसित देशों की तुलना में कहीं ज्यादा है। पिछले साल आयोजित कुंभ में अभी तक के कुंभ मेलों में सबसे अधिक युवाओं की शिरकत का रिकॉर्ड बना। उत्तर प्रदेश सरकार के अनुमान के अनुसार, पवित्र स्नान करने वाले लगभग 66 करोड़ लोगों में से आधे से अधिक 30 वर्ष से कम आयु के थे। – न्यूज एजेंसी यूएनआई के कुछ माह पुराने एक अध्ययन में 55% जेन जी उत्तरदाताओं ने कहा कि वे रोज प्रार्थना करते हैं। 48% सप्ताह में कम से कम एक बार मंदिर जाते हैं। करीब 30% ने कहा कि वे महीने में कम से कम एक बार कथा, भजन या संगत जैसे धार्मिक आयोजन में शामिल होते हैं। सबसे खास बात ये है कि इसमें सबसे अधिक संख्या कॉलेज शिक्षित और शहरी युवाओं की है। ये मेटा-आधुनिकतावाद का युग युवा साहित्यकार, शिक्षाविद और विचारक रश्मि बजाज कहती हैं, ‘हम उत्तर-धर्मनिरपेक्ष युग में जी रहे हैं। यह आधुनिकतावाद और उत्तर-आधुनिकतावाद के बाद का मेटा-आधुनिकतावाद का युग है। अब मानसिकता में एक अभूतपूर्व बदलाव स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है और बहुत से लोग धर्म और आध्यात्मिकता को बड़े पैमाने पर अपना रहे हैं। समकालीन परिदृश्य का एक अत्यंत महत्वपूर्ण, गौरतलब तथ्य जेन-जी की धर्म और आध्यात्मिकता में निरंतर बढ़ रही रुचि है। भजन-क्लबिंग, मेडिटेशन, धार्मिक तीर्थाटन में युवाओं की उत्साहपूर्ण भागीदारी इस नई प्रवृत्ति को रेखांकित करती है।’ बदलाव में सोशल मीडिया भी शामिल युवाओं में धार्मिकता बढ़ाने में डिजिटाइजेशन और सोशल मीडिया का भी बड़ा हाथ है। जेन-जी के लोग गौर गोपाल दास, श्री श्री रविशंकर, आचार्य प्रशांत, जग्गी वासुदेव जैसे स्पिरिचुअल लीडर्स को इंस्टाग्राम, यूट्यूब और पॉडकास्ट पर फॉलो कर रहे हैं। इंस्टाग्राम पर आचार्य प्रशांत के 1.2 करोड़ फॉलोअर्स हैं, गौर गोपाल दास के करीब 97 लाख और श्री श्री रविशंकर के 50 लाख से ज्यादा फॉलोअर्स हैं। आचार्य प्रशांत के मुताबिक, ‘कई युवा कहते हैं कि वे धार्मिक नहीं, आध्यात्मिक हैं। मतलब है कि वे कर्मकांड और पहचान की राजनीति से दूरी बनाकर जीवन के अर्थ खोजना चाहते हैं।’ आध्यात्मिकता को पर्सनल एक्सपीरियंस की तरह देख रहे युवा, डिजिटल सर्च बढ़ी – भारतीय युवा पारंपरिक पूजा-पाठ की बजाय आध्यात्मिकता को पर्सनल एक्सपीरियंस के रूप में देख रहे हैं। ग्लोबल कंसल्टिंग कंपनी कैंटार की इंडिया इन सर्च रिपोर्ट के अनुसार, भारत में ‘भजन क्लबिंग’ की सर्च में 26,900% तक की बढ़ोतरी हुई है। – महाभारत एआई की खोज में 400% की बढ़ोतरी हुई और गीता जीपीटी की खोज में 83% की वृद्धि हुई। यहां तक कि शादी के लिए महिला पंडित की खोज भी दोगुनी हो गई और नवरात्रि के उपहारों की मांग में 267% की वृद्धि हुई।
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