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इन दिनों हमारे आसपास शोर तो बहुत है, लेकिन आवाजें कम हो गई हैं? मेट्रो का सफर हो या दफ्तर का लंच ब्रेक, हर कोई स्मार्टफोन में डूबा है। एरिजोना यूनिवर्सिटी के हालिया शोध के आंकड़े बताते हैं कि इंसान अब पहले के मुकाबले बहुत कम बातें कर रहे हैं। इस स्टडी के अनुसार 2005 से 2019 के बीच औसत व्यक्ति द्वारा रोजाना बोले जाने वाले शब्दों की संख्या 28% घटी है। मनोवैज्ञानिक मैधियास मेहाल कहते हैं, शुरुआत में लगा कि डेटा में कुछ गलती है। विश्लेषण से पता चला कि हम हर साल औसतन 1.2 लाख शब्द कम बोल रहे हैं। 2005 में एक इंसान दिनभर में करीब 16,600 शब्द बोलता था, 2019 तक गिरकर 12 हजार से नीचे आ गई। यह गिरावट 25 साल से कम उम्र के युवाओं में ज्यादा है, जो भावनाएं कहने के बजाय टेक्स्ट या इमोजी के जरिए व्यक्त करना बेहतर समझते हैं। प्रो. मेहल चेतावनी देते हैं कि टेक्स्ट मैसेज कभी भी आवाज की जगह नहीं ले सकते। बोलते वक्त चेहरे के हाव-भाव, आवाज का उतार-चढ़ाव व शारीरिक भाषा जो गहराई पैदा करती है, वह मैसेज की ‘अस्पष्टता में खो जाती है। भावनाएं समझाने के लिए इमोजी मददगार हैं पर वे उस अपनेपन व समक्ष की बराबरी नहीं कर सकते जो बातचीत से आती है। प्रोफेसर जिलियन सेंडस्ट्रोम ने किताब ‘वन्स अपॉन ए स्ट्रेंजर में लिखा है, ‘अजनबियों से छोटी-छोटी बातें मानसिक स्वास्थ्य के लिए ‘बूस्टर’ का काम करती हैं। वह कहती हैं, ‘जब हम किसी पड़ोसी या दुकान पर खड़े अजनबी से मुस्कुराकर बात करते हैं, तो मूड बेहतर होता है. महसूस होता है कि दुनिया बेहतर है।’ बातचीत करना ‘स्किल’ है। हम अभ्यास छोड़ देंगे, तो धीरे-धीरे सामाजिक रूप से अक्षम हो जाएंगे। जिलियन मानती हैं कि हमें खुद को बातचीत के लिए थोड़ा ‘पुश’ करना चाहिए। ये छोटी-छोटी बातें ही हमें इस दुनिया में होने का अहसास कराती हैं। वे कहती हैं, अगली बार जब आप कतार में खड़े हों या किसी सहकर्मी के पास बैठे हों, तो फोन निकालने के बजाय छोटी सी बातचीत शुरू करें। याद रखिए, आपके शब्द ही समाज को जोड़ने वाला सबसे मजबूत पुल है।’ आधुनिक साधनों ने घटाए छोटी-छोटी बातचीत के मौके स्टडी के अनुसार लोग अब पहले से ज्यादा अकेले वक्त बिता रहे हैं। सामाजिक जुड़ाव घटने के साथ रिमोट वर्क बढ़ा है, जिससे कार्यस्थल पर सहयोग भी घटा। मेहल कहते हैं, जब लोग काम व फुर्सत दोनों में साथ कम वक्त बिताते हैं, तो बातचीत के मौके घट जाते हैं। यह बदलाव आमने-सामने की बातचीत को दुर्लभ बना रहा है। आधुनिक साधनों ने स्मॉल टॉक’ घटाई है। पब्लिक स्पेस में छोटी बातचीत घट रही है, क्योंकि संपर्क के बिना भुगतान, डिजिटल ऑर्डरिंग व तेज खरीदारी ने आपसी संवाद की जरूरत घटई। किराना या रेस्त्रों में बिना बात किए ऑर्डर व भुगतान संभव है। इससे रोजमर्रा की जिंदगी सरल हुई पर सामाजिक जीवन नीरस हो गया।
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