ज्येष्ठ मास से जुड़ी मान्यताएं:  अधिक मास की वजह से ज्येष्ठ महीना 59 दिनों का, जानिए भगवान विष्णु की पूजा में किन बातों का ध्यान रखें
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ज्येष्ठ मास से जुड़ी मान्यताएं: अधिक मास की वजह से ज्येष्ठ महीना 59 दिनों का, जानिए भगवान विष्णु की पूजा में किन बातों का ध्यान रखें

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21 मिनट पहले

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अभी ज्येष्ठ मास चल रहा है। इस साल हिन्दी पंचांग का अतिरिक्त महीना यानी अधिक मास ज्येष्ठ में रहेगा, इसलिए यह महीना 59 दिनों का है। अधिक मास को पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। 16 मई तक ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष रहेगा, इसके बाद 17 मई से अधिक मास शुरू होगा, जो कि 15 जून तक चलेगा। इसके बाद ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष शुरू हो जाएगा, जो कि 29 जून तक रहेगा। अधिक मास में विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, जनेऊ संस्कार जैसे मांगलिक कार्यों के लिए मुहूर्त नहीं रहते हैं।

उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के मुताबिक, ज्येष्ठ मास और अधिक मास में भगवान विष्णु और उनके अवतारों की पूजा खासतौर पर करनी चाहिए। अधिक मास को भगवान विष्णु के एक नाम ‘पुरुषोत्तम’ के कारण पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। ज्येष्ठ और अधिक मास में भगवान विष्णु की पूजा में किन बातों का खास ध्यान रखना चाहिए…

  • ज्येष्ठ मास ग्रीष्म ऋतु का चरम समय होता है, इसी कारण इसे तप, संयम, सेवा और भक्ति का काल भी कहते हैं। शास्त्रों में इस मास में जल दान, व्रत, भगवान विष्णु और इनके अवतारों का विशेष पूजन करने की सलाह दी गई है।
  • मान्यता है कि ज्येष्ठ मास में विष्णु पूजन करने से वैसा ही पुण्य मिलता है, जैसा पुण्य यज्ञ करने से मिलता है। इस समय जल, शीतलता और दान से जुड़े शुभ काम करने चाहिए, क्योंकि यह समय शरीर और मन दोनों की परीक्षा लेता है।
  • भगवान विष्णु को सृष्टि का पालनहार माना गया है, इसलिए जो भक्त इनकी भक्ति करता है, उसके जीवन में सुख-शांति बनी रहती है और उसकी सभी समस्याएं दूर होती हैं। विष्णु जी के साथ ही श्रीकृष्ण और श्रीराम की भी विशेष पूजा करनी चाहिए।
  • ज्येष्ठ मास में रोज सुबह जल्दी जागना चाहिए। स्नान के बाद सूर्य को जल चढ़ाएं। इसके लिए तांबे के लोटे में जल भरें और ऊँ सूर्याय नम: मंत्र का जप करते हुए सूर्य को अर्घ्य चढ़ाएं।
  • सूर्य पूजा के बाद घर के मंदिर में भगवान विष्णु, श्रीकृष्ण की पूजा करें। पूजा में दक्षिणावर्ती शंख से भगवान का अभिषेक करें। इसके लिए केसर मिश्रित दूध का इस्तेमाल बहुत शुभ माना जाता है। भगवान को पंचामृत अर्पित करें। पंचामृत दूध, दही, घी, शहद और मिश्री मिलाकर बनाना चाहिए। मिठाई का भोग तुलसी के पत्तों के साथ लगाएं। ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय, कृं कृष्णाय नम: मंत्र का जप करें।
  • पूजा के साथ ही विष्णु सहस्रनाम, भगवद्गीता पाठ और श्रीकृष्ण नाम का जप भी करना चाहिए। आप चाहें तो राधे-राधे नाम का जप भी कर सकते हैं।

इन दिनों में मंत्र जप करने का विशेष महत्व है। अपने इष्टदेव के मंत्रों का जप करें। जैसे-

  • श्री गणेशाय नम:,
  • ऊँ नम: शिवाय,
  • ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय,
  • दुं दुर्गायै नम:,
  • ऊँ महालक्ष्मयै नम:,
  • कृं कृष्णाय नम:,
  • रां रामाय नम:,
  • ऊँ रामदूताय नम:

विष्णु पूजा में शुद्धता, श्रद्धा और निष्काम भाव सबसे जरूरी हैं। केवल बाहरी विधि नहीं, बल्कि मन की पवित्रता ही पूजा को सफल बनाती है। मन के नकारात्मक विचार दूर करें। सकारात्मक और नि:स्वार्थ भाव से पूजा करें। इन दिनों में दान-पुण्य भी नि:स्वार्थ भाव से ही करें।

ज्येष्ठ मास में जलदान को सर्वोच्च दान कहा गया है। राहगीरों, पशु-पक्षियों और जरूरतमंदों को ठंडा जल देना विष्णु कृपा का माध्यम माना गया है। इस समय तामसिक भोजन से बचने की कोशिश करें। हल्का, सात्विक आहार लेने से मौसम संबंधी कई बीमारियों से बचाव हो सकता है। इससे शरीर में संतुलन बना रहता है।

भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण के मंदिरों में करें दर्शन-पूजन

ज्येष्ठ मास में श्रीकृष्ण की भक्ति का स्वरूप अधिकतर प्रेम और स्मरण पर आधारित होता है। उनके बाल स्वरूप, मुरलीधर रूप और गीता उपदेशक स्वरूप, तीनों का ध्यान करें। इन दिनों में मथुरा, बद्रीनाथ, जगन्नाथ पुरी जैसे तीर्थ क्षेत्रों की यात्रा और दर्शन कर सकते हैं। ये तीनों तीर्थ भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण से संबंधित हैं। गंगा, यमुना, शिप्रा, नर्मदा जैसी पवित्र नदियों में स्नान भी करना चाहिए।

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