डेरेक ओ ब्रायन का कॉलम:  क्या इतिहास रचने की कगार पर हैं विपक्ष में बैठे सांसद?
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डेरेक ओ ब्रायन का कॉलम: क्या इतिहास रचने की कगार पर हैं विपक्ष में बैठे सांसद?

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3 घंटे पहले

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डेरेक ओ ब्रायन
राज्यसभा में टीएमसी के नेता - Dainik Bhaskar

डेरेक ओ ब्रायन राज्यसभा में टीएमसी के नेता

संसद का सत्र चल रहा है। लोकसभा और राज्यसभा के गलियारों में चर्चा तेज है कि विपक्ष की कई पार्टियां जल्द ही मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) के खिलाफ पद से हटाने का प्रस्ताव ला सकती हैं। यदि ऐसा प्रस्ताव पेश किया जाता है- जैसा मुझे लगता है कि होगा- तो यह इस तरह की पहली घटना होगी।

पिछले 75 वर्षों में 25 सीईसी रहे हैं, लेकिन आज तक संसद के किसी सदन में उनके खिलाफ हटाने का प्रस्ताव नहीं लाया गया है। तो क्या सीईसी एक अनचाहा रिकॉर्ड बनाने जा रहे हैं? सीईसी को हटाने के लिए लोकसभा के 100 या राज्यसभा के 50 सदस्यों को स्पीकर या चेयरमैन को नोटिस देना होता है।

यदि नोटिस स्वीकार लिया जाता है, तो मामले की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति बनाई जाती है। यदि समिति आरोपों को सही पाती है, तो प्रस्ताव पर विचार किया जाता है। इसे दोनों सदनों में विशेष बहुमत से पारित होना होता है यानी कुल सदस्य संख्या का बहुमत और उपस्थित तथा मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई का समर्थन।

संविधान के अनुसार सीईसी को सिद्ध दुर्व्यवहार या अक्षमता के आधार पर पद से हटाया जा सकता है। सिद्ध दुर्व्यवहार में शक्तियों का जानबूझकर दुरुपयोग, संवैधानिक कर्तव्यों का पक्षपातपूर्ण ढंग से निर्वहन करते हुए एक दल को दूसरों पर प्राथमिकता देना तथा सीईसी की स्वतंत्रता और निष्पक्षता में जनता के विश्वास को कमजोर करने वाले कार्य शामिल हो सकते हैं।

संविधान सभा की बहसों के दौरान डॉ. आम्बेडकर ने कहा था, चुनाव मशीनरी कार्यपालिका के नियंत्रण से बाहर होनी चाहिए। इस सिद्धांत को सुप्रीम कोर्ट ने 2023 के अनूप बर्नवाल बनाम भारत सरकार मामले में भी दोहराया था, जब उसने यह फैसला दिया था कि सीईसी और चुनाव आयुक्तों का चयन तीन सदस्यीय समिति द्वारा किया जाना चाहिए, जिसमें प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और सीजेआई शामिल हों।

लेकिन इसके कुछ ही महीनों बाद सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले की अनदेखी करते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यावधि) अधिनियम, 2023 लागू किया। अधिनियम की धारा 7 ने एक चयन समिति बनाई, जिसमें प्रधानमंत्री अध्यक्ष होंगे और लोकसभा में विपक्ष के नेता सहित आश्चर्यजनक रूप से प्रधानमंत्री द्वारा नामित कैबिनेट मंत्री होंगे।

यह व्यवस्था कार्यपालिका को बहुमत (तीन में से दो सदस्य) देती है, जिससे सरकार को नियुक्तियों पर नियंत्रण मिल जाता है। चुनाव आयोग का एक लंबा और गौरवशाली इतिहास रहा है। सुकुमार सेन भारत के पहले चुनाव आयुक्त थे। उन्हें पहला आम चुनाव कराने का महत्वपूर्ण दायित्व दिया गया था। उस समय भारत में 17.6 करोड़ लोग मतदान के पात्र थे। इनमें लगभग 85% निरक्षर थे। 16,500 क्लर्क, 56,000 प्रोसिडिंग अधिकारी और दो लाख से अधिक पुलिसकर्मी तैनात किए गए थे।

पहाड़ी इलाकों के गांवों तक पहुंचने के लिए नदियों पर पुल बनाए गए। छोटे द्वीपों तक पहुंचने के लिए नौसेना के जहाज चले। यह लोकतंत्र के लिए दुनिया का सबसे बड़ा अभ्यास था। 17वें सीईसी डॉ. एसवाय कुरैशी ने मतदाता साक्षरता के लिए सिस्टेमैटिक वोटर्स एजुकेशन एंड इलेक्टोरल पार्टिसिपेशन (स्वीप) की शुरुआत की।

उन्होंने पेड न्यूज और ओपिनियन पोल के खिलाफ भी स्पष्ट रुख अपनाया। 23वें सीईसी सुनील अरोरा ने तकनीक का उपयोग करते हुए 93 करोड़ से अधिक मतदाताओं का एक डेटाबेस तैयार किया और एक राष्ट्रव्यापी फोन हेल्पलाइन नंबर शुरू किया।

फिर हम वर्तमान की स्थिति तक कैसे पहुंचे, जब विपक्षी पार्टियां मिलकर सीईसी को हटाने की अभूतपूर्व कार्रवाई पर विचार कर रही हैं? भले ही नोटिस केवल एक सदन में लाया जा सकता है, लेकिन लगता है कि विपक्ष इसे दोनों सदनों में लाने पर विचार कर रहा है। यह एक मजबूत संदेश होगा।

विपक्ष देश की संस्थाओं की निष्ठा की रक्षा के लिए हर उपलब्ध संवैधानिक साधन का उपयोग कर रहा है। अगर नोटिस को सरकार द्वारा ग्रहण नहीं किया जाता है, तो कार्यपालिका और सीईसी के बीच मौन समझौते को लेकर संदेह उठेंगे।

1991 में भी संसद में टीएन शेषन को सीईसी पद से हटाने को लेकर भारी हंगामा हुआ था, लेकिन कोई औपचारिक नोटिस दाखिल नहीं किया गया। 2006 में एनडीए ने नवीन चावला को पद से हटाने की मांग करते हुए एक ज्ञापन दिया था। लेकिन उसमें भी कोई संसदीय प्रक्रिया शामिल नहीं थी। तो क्या आज विपक्ष में बैठे सांसद इतिहास रचने की कगार पर हैं?

  • विपक्षी दल सीईसी को हटाने की कार्रवाई पर विचार कर रहे हैं। इसे दोनों सदनों में लाने पर मनन चल रहा है। देश की संस्थाओं की निष्ठा की रक्षा के लिए विपक्ष हर उपलब्ध संवैधानिक साधन का उपयोग कर रहा है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं। इस लेख के सहायक शोधकर्ता चाहत मंगतानी, आयुष्मान डे और वर्णिका मिश्रा हैं)

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