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- Derek OBrien Column: Elections In The Era Of Fake News, Deepfakes & Influencers
3 घंटे पहले
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डेरेक ओ ब्रायन लेखक सांसद और राज्यसभा में टीएमसी के नेता हैं
आज से लगभग दस हफ्तों के भीतर चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में चुनाव होने जा रहे हैं। अगर 2019 भारत का पहला ‘व्हाट्सऐप चुनाव’ था और 2024 पहला ‘डिजिटल-फॉरवर्ड’ चुनाव, तो 2026 को इन दोनों का मिला-जुला स्वरूप कहा जा सकता है। बताया जा रहा है कि 2029 ‘एआई’ का चुनाव होगा। मीडिया और राजनीति का उत्सुक विद्यार्थी होने के नाते इस पर मेरे कुछ विचार हैं।
फेक न्यूज : इसे बेलगाम पीत-पत्रकारिता ही कहा जा सकता है। सनसनीवाद आज बेरोकटोक फैलाया जाता है। चुनावों पर फेक न्यूज के असर को समझने के लिए पत्रकारिता शैली में पांच सवाल पूछने जरूरी हैं : क्या : भारत में इस शब्द की कोई कानूनी परिभाषा नहीं है, लेकिन ऑस्ट्रेलिया के ई-सेफ्टी कमिश्नर के अनुसार फेक न्यूज वे मनगढ़ंत खबरें हैं, जिन्हें किसी विशेष एजेंडे का समर्थन करने के लिए रचा जाता है।
कौन : भारत में हर पांच में से तीन इंटरनेट यूजर ऑनलाइन ही खबरें और जानकारियां प्राप्त करते हैं। ऐसे में फेक न्यूज का तेजी से फैलना चिंताजनक है। प्यू रिसर्च सेंटर के 2025 के एक सर्वे में 65% लोगों ने फर्जी खबरों और सूचनाओं को बड़ी चिंता बताया। क्यों : फेक न्यूज भारतीय चुनावों की एक संरचनात्मक विशेषता बन चुका है। भले ही वोट ऑफलाइन दिए जाते हों, लेकिन उनकी लड़ाई अब तेजी से ऑनलाइन लड़ी जा रही है। आज भारत में 90 करोड़ से अधिक इंटरनेट यूजर्स हैं। ऐसे में चंद ही क्लिक में धारणाओं को प्रभावित करना और नैरेटिव गढ़ना संभव हो गया है। इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस और साइबरपीस के एक अध्ययन से पता चला कि सभी फेक न्यूज में से 46% राजनीतिक प्रकृति की थीं।
कब : चुनावों के आसपास फेक न्यूज चरम पर होती हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार, 2019 के चुनावी वर्ष में फेक न्यूज से जुड़े मामलों में पिछले वर्ष की तुलना में 70% की वृद्धि हुई थी। कहां : डिजिटल प्लेटफॉर्म फेक न्यूज के तेज प्रसार को सक्षम बनाते हैं। छेड़छाड़ किए गए वीडियो, एआई-जनित तस्वीरें आदि तथ्य और कल्पना के बीच की रेखा को धुंधला कर देते हैं, जबकि एल्गोरिदम ऐसे कंटेंट को वायरल बनाने में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। भारत में लगभग 900 निजी टीवी चैनल हैं, जिनमें से करीब आधे न्यूज के हैं। टीवी की पहुंच आज भी गहरी है- देश के लगभग 23 करोड़ घरों में टीवी मौजूद है। हालांकि हाल के वर्षों में डिजिटल माध्यम की ओर स्पष्ट झुकाव देखने को मिला है।
इन्फ्लुएंसर्स : सोशल मीडिया के बढ़ते उपयोग के साथ ‘इन्फ्लुएंसर्स’ की इस क्षेत्र में काफी पकड़ बन गई है। ये वे व्यक्ति हैं, जिन्हें मजबूत शोध और प्रोडक्शन टीमों का समर्थन हासिल होता है और जिन्होंने अपनी व्यक्तिगत ब्रांड इक्विटी के बल पर एक बड़ी फॉलोइंग बना ली होती है। जेन-जी में केवल 13% ही ‘सेलेब्रिटीज’ को फॉलो करना पसंद करते हैं, जबकि 86% से अधिक इन्फ्लुएंसर्स को फॉलो करते हैं। इन इन्फ्लुएंसर्स की पहुंच इतनी अहम हो चुकी है कि कई वरिष्ठ राजनेताओं ने उनसे सक्रिय रूप से सम्पर्क किया है और उन्हें इंटरव्यू भी दिए हैं। केंद्र सरकार ने भी MyGov के तहत ‘इन्फ्लुएंसर एजेंसियों’ को पेनल में शामिल कर उनके साथ काम किया है।
डीपफेक : दक्षिण भारत की एक पार्टी के दिवंगत नेता का पार्टी बैठक में अपने विशिष्ट पहनावे में ‘उपस्थित’ होना, फिल्म उद्योग के दो प्रमुख अभिनेताओं का प्रधानमंत्री की आलोचना करना और सबसे बड़े विपक्षी दल का समर्थन करना, इस तरह के फर्जी डिजिटल-वीडियो पिछले लोकसभा चुनावों से पहले सामने आए थे। इन्हें डीपफेक कहा जाता है और ये अब राजनीतिक दलों तथा उनके प्रचार अभियान की कमान सम्भालने वाली एजेंसियों के सबसे प्रभावी औजारों में से एक बनते जा रहे हैं।
पिछले आम चुनावों में मतदान शुरू होने से पहले के साठ दिनों में मतदाताओं को पांच करोड़ एआई-जनरेटेड कॉल किए गए, जिनमें किसी राजनेता की आवाज को कृत्रिम रूप से इस तरह तैयार किया गया कि वह सीधे मतदाता से बात करता हुआ लगे। इन्हीं चुनावों के दौरान मेटा ने मुसलमानों और एक विपक्षी नेता के खिलाफ हिंसा के आह्वान वाले 14 एआई-जनरेटेड चुनावी विज्ञापनों को भी मंजूरी दी। चुनाव आयोग को ऐसे कंटेंट के प्रसार को नियंत्रित करने के लिए सख्त दिशानिर्देश तय करने चाहिए थे। लेकिन हाल ही में एसआईआर प्रक्रिया का जिस तरह से क्रियान्वयन किया गया, उसके मद्देनजर लगता है कि हम शायद एक गलत अपेक्षा कर रहे हैं।
भारत में हर 5 में से 3 इंटरनेट यूजर ऑनलाइन ही खबरें और जानकारियां प्राप्त करते हैं। ऐसे में फेक न्यूज का तेजी से फैलना चिंताजनक है। प्यू रिसर्च सेंटर के एक सर्वे में 65% लोगों ने फर्जी सूचनाओं को बड़ी चिंता बताया।
(ये लेखक के अपने विचार हैं। इस लेख के सहायक-शोधकर्ता अंजना अंचयिल, धीमंत जैन और वर्णिका मिश्रा हैं)








