![]()
इस महीने की शुरुआत में मणिपुर में सामूहिक दुष्कर्म की शिकार हुई एक 20 वर्षीय युवती ने दम तोड़ दिया। दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में पीड़िता की बहन के ये शब्द मुझे कभी नहीं भूलेंगे- ‘कोई उसे न्याय नहीं दिला सका।’ भारत में महिलाओं के लिए न्याय के क्या मायने हैं? देखें कि कैसे हमारा कानूनी-तंत्र ही महिलाओं के पक्ष को कमजोर करता है। 1. भारतीय दंड संहिता, 1860 में संहिताबद्ध और भारतीय न्याय संहिता की धारा 63 में कायम रखे गए कानून के तहत पति द्वारा पत्नी के साथ उसकी सहमति के बिना बनाए गए यौन संबंध को दुष्कर्म नहीं माना गया है। यह कानून विवाह में महिलाओं की सहमति के सिद्धांत को नकारता है, क्योंकि पत्नी के निर्णय के बजाय पति के यौन-अधिकार को महत्व देता है। यद्यपि महिलाएं घरेलू हिंसा से संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत नागरिक समाधानों की मांग कर सकती हैं, लेकिन वैवाहिक दुष्कर्म पर आपराधिक कार्रवाई से इनकार एक ऐसी व्यवस्था को मजबूत करता है, जिसमें किसी स्त्री के अपने शरीर पर अधिकार को उसके वैवाहिक स्टेटस के समक्ष नगण्य माना जाता है। 1971 में 42वीं विधि आयोग रिपोर्ट ने वैवाहिक दुष्कर्म को अपराध घोषित करने की सिफारिश की थी, लेकिन उसे माना नहीं गया। 2. बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 और उससे संबंधित कानूनों के तहत विवाह की न्यूनतम आयु महिलाओं के लिए 18 और पुरुषों के लिए 21 वर्ष है। लेकिन इस भेद का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। यदि उद्देश्य कम उम्र में विवाह को रोकना है तो यह सभी जेंडर के लिए समान होना चाहिए। और यदि उद्देश्य महिलाओं की सुरक्षा ही है, तो उनके लिए विवाह की आयु को कम रखना इस लक्ष्य को मजबूत कैसे बना सकता है? उलटे यह इस धारणा को वैधता देता है कि विवाह के समय स्त्री और पुरुष की आयु में अंतर होना चाहिए। ऐसा करके यह स्त्री की पुरुष पर निर्भरता को बढ़ावा देता है और उनकी शिक्षा को सीमित करता है। जो कानून असमानता को संस्थागत रूप देता हो, वह गरिमा को बढ़ावा देने का दावा नहीं कर सकता। 3. दाम्पत्य सहवास की बहाली (आरसीआर) का प्रावधान पति या पत्नी को यह अधिकार देता है कि यदि दूसरा जीवनसाथी कोई उचित कारण सिद्ध किए बिना अलग रह रहा हो, तो उसे साथ रहने के लिए बाध्य किया जा सके। यह प्रावधान हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 9 और विशेष विवाह अधिनियम की धारा 22 में संहिताबद्ध है। यह विवाह को सहमति पर आधारित संबंध के बजाय सहवास के कानूनी दायित्व के रूप में देखता है। इसके चलते विवाह-संबंध से अलग होकर रहने वाले व्यक्तियों- अधिकतर महिलाओं पर यह बोझ डाल दिया जाता है कि वे अपने निर्णय को तर्कसंगत ठहराएं, फिर भले ही अलगाव का कारण भावनात्मक, मानसिक या यौन उत्पीड़न ही क्यों न हो। चूंकि वैवाहिक दुष्कर्म अपराध नहीं है, इसलिए यह प्रावधान महिलाओं को ऐसी परिस्थितियों में लौटने के लिए मजबूर कर सकता है, जो उनकी गरिमा से समझौता करती हों। 4. पॉक्सो कानून, 2012 के तहत यौन उत्पीड़न संबंधी अपराधों में असहमति का प्रमाण आवश्यक नहीं है। इसका अर्थ यह है कि यदि 18 वर्ष से कम आयु के किशोर-किशोरी किसी यौन क्रिया में संलिप्त हैं, तो इसमें उनकी सहमति अप्रासंगिक हो जाती है। पॉक्सो के अंतर्गत बड़ी संख्या में दर्ज होने वाले मुकदमे किशोरों के बीच सहमति-आधारित प्रेम संबंधों से जुड़े होते हैं। ऐसे मुकदमे अकसर स्वयं उनके परिजनों द्वारा दर्ज किए जाते हैं, जो विशेषकर अंतर-जातीय, अंतर-धार्मिक या सामाजिक रूप से अस्वीकार्य संबंधों में लड़कियों की पसंद को नियंत्रित करना चाहते हैं। यौन शोषण और सहमति से बनाए संबंधों के बीच भेद किए बिना यह कानून किशोरों की स्वायत्तता पर तो अंकुश लगाता है, लेकिन उनके साथ होने वाले दुर्व्यवहार के विरुद्ध संरक्षण प्रदान नहीं कर पाता। 5. भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 69 विवाह के झूठे वादे के आधार पर बनाए यौन संबंध को अपराध घोषित करती है। यह इस धारणा पर आधारित है कि महिलाओं की यौन सहमति विवाह की अपेक्षा से ही जुड़ी होती है। इस तरह सहमति पर आधारित संबंधों को भी धोखा बता दिया जाता है। रिश्तों में इरादे समय के साथ बदलते हैं, लेकिन स्पष्ट कानूनी मानकों के अभाव में यह प्रावधान दुरुपयोग की संभावना पैदा करता है। जब तक हमारे कानूनों में सहमति सशर्त बनी रहेगी, तब तक महिलाओं के लिए न्याय भी सशर्त ही रहेगा- जो गरिमा, समानता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संवैधानिक वादे के विपरीत है। वैवाहिक दुष्कर्म पर आपराधिक कार्रवाई से इनकार एक ऐसी व्यवस्था को मजबूत करता है, जिसमें किसी स्त्री के अपने शरीर पर अधिकार को उसके वैवाहिक स्टेटस के समक्ष नगण्य माना जाता है। वैवाहिक दुष्कर्म अपराध क्यों नहीं है?
(ये लेखक के अपने विचार हैं। इस लेख की सहायक शोधकर्ता चाहत मंगतानी हैं।)
Source link








