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- Outsourcing Life: Health & Dependency Concerns | Dr. Lahariya Column
8 घंटे पहले
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डॉ. चन्द्रकान्त लहारिया, जाने माने चिकित्सक
भारत में मोबाइल, सस्ता डेटा और नए ऐप्स ने जीवन को आसान बनाया है। किराना घर तक आ जाता है, टैक्सी दरवाजे पर मिल जाती है, खाना मोबाइल स्क्रीन से थाली तक पहुंच जाता है। लेकिन अब ऐप के जरिये मानवीय सहायता भी ऑन-डिमांड मिलने लगी है- यानी कोई व्यक्ति आपके साथ बाजार जाएगा, आपके बैग उठाएगा, आपके लिए लाइन में खड़ा होगा, आपको पानी देगा, आपके लिए कुर्सी लगाएगा और आपकी छोटी-बड़ी निजी सुविधाओं का ध्यान रखेगा। इसे आधुनिक सेवा, सुविधा और रोजगार का नया मॉडल बताया जा रहा है। लेकिन क्या यह सचमुच सुविधा है या सामंतवाद का नया ऐप आधारित संस्करण?
सुविधा बुरी नहीं है। लेकिन जब वो हमें बीमार, निष्क्रिय, निर्भर और असंवेदनशील बनाने लगे, तब हमें रुककर सोचना चाहिए। ऐप से मंगाई गई सुविधा सस्ती लग सकती है, पर उसकी सामाजिक और स्वास्थ्यगत कीमत महंगी है। देश को तय करना होगा कि वह बराबरी, आत्मनिर्भरता और स्वास्थ्य की ओर बढ़ेगा या डिजिटल सामंतवाद की ओर? पहले यह रवैया दरबारों, क्लबों और नौकरों की कतारों में दिखता था। अब वही मानसिकता मोबाइल ऐप, डिजिटल भुगतान और स्टार्टअप की चमकदार भाषा में लौट रही है।
किसी व्यक्ति को रोजगार देना भी गलत नहीं है। आखिर सेवा-क्षेत्र अर्थव्यवस्था का जरूरी हिस्सा है। ड्राइवर, घरेलू सहायक, सुरक्षा गार्ड, नर्सिंग अटेंडेंट, डिलीवरी वर्कर- ये सब भी सम्मानजनक और आवश्यक काम करते हैं। समस्या काम में नहीं, उस मानसिकता में है, जिसमें एक सक्षम, स्वस्थ और चल-फिर सकने वाला व्यक्ति अपना पानी खुद उठाने, अपना सामान खुद संभालने, अपनी बारी आने तक लाइन में खड़े रहने या कुछ कदम पैदल चलने को भी अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा के खिलाफ समझने लगे। जब सुविधा प्रदर्शन बन जाए, तब वह वह असमानता का तमाशा बन जाती है।
यह विचार केवल सामाजिक रूप से ही चिंताजनक नहीं, स्वास्थ्य की दृष्टि से भी नुकसानदेह है। आधुनिक शहरी भारत पहले ही बैठी हुई जीवनशैली, मोटापा, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, फैटी लिवर, पीठ दर्द, तनाव और नींद की कमी से जूझ रहा है। डॉक्टर रोज मरीजों को यही सलाह देते हैं कि अधिक चलें, सीढ़ियां चढ़ें, छोटे काम खुद करें, शरीर को रोजमर्रा की गतिविधियों में लगाएं। लेकिन ऐप-आधारित सुविधा संस्कृति हमें उलटी दिशा में धकेल रही है। यह कहती है- आप मत चलिए, कोई और चलेगा। आप मत उठाइए, कोई और उठाएगा। आप लाइन में मत खड़े रहिए, कोई और खड़ा रहेगा। यानी शरीर को निष्क्रिय और अहंकार को सक्रिय रखिए।
स्वास्थ्य केवल जिम में एक घंटा पसीना बहाने से नहीं बनता। स्वास्थ्य दिनभर की छोटी-छोटी शारीरिक गतिविधियों से बनता है- बाजार में चलना, अपना सामान उठाना, घर के छोटे काम करना, बस या मेट्रो तक पैदल जाना, कतार में खड़े रहना, पानी खुद लेना, बच्चों के साथ खेलना।
ऐसी गतिविधियों को वैज्ञानिक भाषा में नॉन-एक्सरसाइज एक्टिविटी कहा जाता है। आधुनिक जीवन में यही सबसे तेजी से गायब हो रही हैं। जब हम हर छोटे काम को आउटसोर्स कर देते हैं, तब हम सिर्फ पैसा खर्च नहीं करते; अपनी मांसपेशियों, हड्डियों, मेटाबॉलिज्म, आत्मनिर्भरता को भी कमजोर करते हैं।
रोजगार जरूरी है, लेकिन हर रोजगार सामाजिक प्रगति नहीं होता। सभ्य समाज केवल नौकरियों की संख्या से नहीं बनता; वह काम की गरिमा, श्रमिक अधिकारों, सामाजिक बराबरी और मानवीय संबंधों की मर्यादा से भी बनता है। हमें ऐसी अर्थव्यवस्था चाहिए, जो लोगों को सम्मान दे।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)









