डॉ. चन्द्रकान्त लहारिया का कॉलम:  अगर ठीक से इस्तेमाल न करें तो दवाइयां भी जहर से कम नहीं हैं
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डॉ. चन्द्रकान्त लहारिया का कॉलम: अगर ठीक से इस्तेमाल न करें तो दवाइयां भी जहर से कम नहीं हैं

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6 घंटे पहले

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डॉ. चन्द्रकान्त लहारिया, जाने माने चिकित्सक - Dainik Bhaskar

डॉ. चन्द्रकान्त लहारिया, जाने माने चिकित्सक

ईसा पूर्व 5वीं सदी से 1,600 ईस्वी तक, दुनिया की लगभग सभी पद्धतियों में दवा के नाम पर जड़ी-बूटियां दी जाती थी। वे अधिकतर बेस्वाद, कड़वी और न खाने लायक होती थीं। इलाज की सुविधा सिर्फ उच्च वर्ग और अमीर लोगों के पास थी। ऐसे में कड़वी दवाई कैसे पिलाई जाए? तो जड़ी-बूटियों को चाशनी या शहद में मिलाकर देने की शुरुआत हुई।

यह दवा खिलाने का एक विलासितापूर्ण रूप था। बाद में इन्हें सिरप कहा जाने लगा, जो अरबी भाषा के शराब शब्द से आया है। शराब शब्द को वाइन या अल्कोहल से बने पेय से जोड़ने की शुरुआत तो 17वीं शताब्दी के आसपास यूरोप और एशिया के देशों से हुई।

खांसी- जो एक आम समस्या है- के लिए सिरप सदियों से मांग में रहे हैं। लेकिन भारत में कफ सिरप का अत्यधिक और अनुचित उपयोग होता है। डॉक्टर इन सिरप को नियमित रूप से लिखते हैं। अगर डॉक्टर न लिखें तो मरीज खुद ही मांग लेते हैं कि खांसी की दवाई भी लिख दीजिए। फिर सालों-साल तक परिवार के किसी भी सदस्य को खांसी होती है तो वही दवा पिला दी जाती है। लोग दवा की दुकानों पर जाकर उन्हें खरीद लाते हैं।

हमारे देश में बच्चों में खांसी और नाक बहने के सबसे बड़े कारणों में धूल और प्रदूषण से एलर्जी हैं। सूखी खांसी अधिकतर वायरल इन्फेक्शन्स से होती है। खांसी आना एक सामान्य लक्षण है, जिसका उद्देश्य सांस की नाली से बलगम को हटाना है, ताकि वो फेफड़ों में जाकर नुकसान नहीं पहुंचाए। लेकिन कफ सिरप के नुकसान अधिक, फायदे न के बराबर होते हैं।

वैसे भी, अधिकतर मामलों में खांसी पांच से सात दिन में अपने आप ठीक हो जाती हैं। लेकिन जब बच्चों के स्वास्थ्य की बात आती है तो माता-पिता धीरज नहीं रख पाते। कफ सिरप मर्ज का इलाज नहीं करते। लेकिन इनसे तात्कालिक राहत मिलती है, इसलिए लोगों की नजर में इन दवाओं का परसीव्ड या कथित मूल्य अधिक है।

इसी कारण, अनुमानों के अनुसार भारत में कफ सिरप का बाजार 21 हजार करोड़ रुपए सालाना है। सोचिए, जिस चीज का कोई फायदा नहीं उस पर हम कितना पैसा बर्बाद कर रहे हैं। जबकि यही काम गुनगुना पानी या शहद भी कर सकता है।

भारत में इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स- जिसके सदस्य करीब 40,000 बाल रोग विशेषज्ञ हैं- की संस्था है। इस अकादमी के श्वसन रोग समूह का मशविरा है कि दो साल से छोटे बच्चों को कफ सिरप नहीं दिए जाने चाहिए।

इनका इस्तेमाल सिर्फ चार साल से बड़े बच्चों में हो और वो भी तब, जब खांसी से बहुत अधिक परेशानी हो या बच्चा सो नहीं पा रहा हो। उसमें भी सिर्फ एक कॉम्पोनेन्ट वाले कफ सिरप इस्तेमाल किए जाने चाहिए। इस समूह का मशविरा है कि एक से अधिक कॉम्पोनेन्ट वाले कफ सिरप बेतुके हैं और हानिकारक हो सकते हैं।

देश में दवाओं की नियामक संस्था केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन ने भारत में बिक रहे अधिकतर कॉम्बिनेशन कफ सिरप को इर्रैशनल संयोजन का दर्जा दिया है। लेकिन ये फिर भी बनते हैं, डॉक्टरों द्वारा लिखे जाते हैं, और खूब बिकते हैं।

यह हमारे देश में अनावश्यक रूप से दवाइयां लिखे और इस्तेमाल किए जाने का प्रमाण है। एंटीबायोटिक्स का इस्तेमाल छोटी-मोटी दिक्कतों जैसे गले में खराश, मौसमी खांसी और वायरल फीवर के लिए किया जाता है। लोग दर्द की गोलियां भी लोग अकसर अपनी मर्जी से लेते रहते हैं। इससे दर्द की जड़ तो खत्म नहीं होती है, लेकिन किडनी और लिवर को नुकसान होता है।

झोलाछाप डॉक्टर स्टेरॉयड से भरी दवाएं लिखते हैं। गैस और एसिडिटी की दवाइयां लोग सालों-साल लेते रहते हैं। मल्टीविटामिन आम प्रिस्क्रिप्शन का हिस्सा बन चुके हैं। इनसे दवा कंपनियों के अलावा किसी काे फायदा नहीं होता। (ये लेखक के निजी विचार हैं)

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