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नई दिल्ली। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के डॉक्टरों ने जन्मजात फेफड़ों की गंभीर बीमारी से जूझ रहे चार महीने के बच्चे की दुर्लभ लंग स्पेयरिंग सर्जरी कर चिकित्सा क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। बच्चे के दोनों फेफड़े कॉन्जेनिटल पल्मोनरी एयरवे मालफॉर्मेशन (सीपीएएम) से प्रभावित थे। सामान्य परिस्थितियों में ऐसे मरीजों में फेफड़े का पूरा लोब निकालना पड़ता है, लेकिन विशेषज्ञों ने माइक्रो सर्जरी के जरिए केवल संक्रमित हिस्से को हटाकर स्वस्थ फेफड़े को सुरक्षित रखा। सफल ऑपरेशन के 48 घंटे बाद ही बच्चे को अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। डॉक्टरों के अनुसार, बीमारी की पहचान गर्भावस्था के दौरान ही हो गई थी। जांच में दोनों फेफड़ों में सिस्ट मिलने के कारण भविष्य में संक्रमण और सांस लेने में गंभीर दिक्कत की आशंका थी। इसी वजह से पारंपरिक लोबेक्टमी के बजाय सेगमेंटेक्टॉमी तकनीक अपनाई गई, ताकि बच्चे के फेफड़ों की कार्यक्षमता लंबे समय तक सुरक्षित रह सके। थोरेकोस्कोपिक तकनीक से निकाले सेगमेंट सर्जरी के दौरान दाहिने फेफड़े के सबसे जटिल माने जाने वाले सेगमेंट-9 और सेगमेंट-10 को थोरेकोस्कोपिक (की-होल) तकनीक से निकाला गया। ऑपरेशन के समय सिलेक्टिव लंग वेंटिलेशन तकनीक अपनाई गई, जिसमें एक फेफड़े पर सर्जरी के दौरान दूसरा फेफड़ा शरीर को ऑक्सीजन देता रहा। एम्स के अनुसार, कुछ महीनों बाद बाएं फेफड़े की भी इसी प्रकार सर्जरी की जाएगी। स्वस्थ ऊतक को सुरक्षित रखना सबसे बड़ी चुनौती इस ऑपरेशन को पीडियाट्रिक सर्जरी विभागाध्यक्ष डॉ संदीप अग्रवाल, प्रो विशेष जैन, डॉ अभिषेक और पीडियाट्रिक सर्जरी, एनेस्थीसिया, रेडियोलॉजी व नवजात गहन चिकित्सा विभाग की संयुक्त टीम ने अंजाम दिया। डॉ संदीप अग्रवाल ने कहा, सबसे बड़ी चुनौती फेफड़े के गहरे प्रभावित हिस्से को निकालते हुए स्वस्थ ऊतक को सुरक्षित रखना थी। हमारा प्रयास केवल सर्जरी करना नहीं, बल्कि बच्चे के फेफड़ों की भविष्य की कार्यक्षमता को बचाना था, जिसे टीमवर्क और आधुनिक तकनीक की मदद से संभव बनाया गया।
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