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नंदितेश निलय का कॉलम: 85 की उम्र में नोबेल शांति पुरस्कार मिलने के क्या मायने होते हैं?

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10 घंटे पहले

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नंदितेश निलय वक्ता, एथिक्स प्रशिक्षक एवं लेखक - Dainik Bhaskar

नंदितेश निलय वक्ता, एथिक्स प्रशिक्षक एवं लेखक

क्या आपको भी ऐसा महसूस होता है कि नोबेल पुरस्कारों की घोषणा होते ही तमाम तरह की सकारात्मकता हमें और हमारे आसपास के वातावरण को घेर लेती है? मुझे तो ऐसा ही लगता है। और भला क्यों न हो! एक तो तमाम विषय मानो फिर से हमारे जेहन में अपनी गम्भीरता लिए उतर पड़ते हैं, चाहे वह भौतिकी, रसायनशास्त्र, चिकित्सा हो या अर्थशास्त्र।

उधर बेसुध होती रीलबद्ध दुनिया को साहित्य के पुरस्कार की जब प्रतिध्वनि आती है, तो उसका ध्यान टूटता है और उसे यकीन होता है कि मनुष्य बिना किसी डिजिटल संगत के भी मानवीय संवेदना को महसूस कर सकता है। खैर, आज चर्चा शांति के पुरस्कार की।

जी हां, शांति का पुरस्कार, क्योंकि कोई नहीं बचा- न व्यक्ति, न नेतृत्व और न कोई संस्था- जो वैश्विक स्तर पर शांति की आवाज उन तमाम ड्रोनों, मिसाइलों और भेद बढ़ाते हृदयों तक पहुंचा सके। लेकिन नोबेल तो नोबेल ठहरा।

उसे न बढ़ती उम्र दिखी और न जाति, न धर्म, न रंग, न जेंडर और न ही किसी देश की सामरिक और आर्थिक शक्ति। उसने तो इस साल उस भारतीय तमिल मूल की दक्षिण अफ्रीकी महिला को शांति के पुरस्कार के लिए चुना, जो 85 वर्ष की हैं।

आप खुद ही अंदाजा लगाइए कि हमारे देश में 85 वर्ष के होने का क्या मतलब होता है? और हमारे आसपास के लोग उस व्यक्ति को इस उम्र के पायदान पर क्या अहसास कराते हैं? लेकिन वे तो नवी पिल्लई हैं, जो रंगभेद-विरोधी कैदियों का बचाव करने से लेकर दुनिया की प्रमुख अंतरराष्ट्रीय अदालतों और मानवाधिकार संस्थाओं में काम करती रही हैं। न उम्र, न रंग, न आर्थिक तंगी को उन्होंने रास्ते की बाधा बनने दिया और न उनको पहचानने में नोबेल समिति को कोई रोक पाया।

1941 में डरबन के क्लेयरवुड में एक गरीब तमिल परिवार में जन्मीं नवी पिल्लई रंगभेद के माहौल में पली-बढ़ीं। हार्वर्ड से कानून में डॉक्टरेट की डिग्री ली और वे ऐसा करने वाली पहली दक्षिण अफ्रीकी थीं। पर कोई भी लॉ फर्म उन्हें नौकरी पर नहीं रखना चाहती थी, क्योंकि गोरी सेक्रेटरी किसी गैर-गोरी महिला से निर्देश नहीं लेना चाहती थीं। फिर उन्होंने खुद की प्रैक्टिस शुरू की और नटाल में ऐसा करने वाली वे पहली गैर-गोरी महिला थीं।

उन्होंने रंगभेद-विरोधी कार्यकर्ताओं का बचाव किया, नजरबंद लोगों के साथ होने वाली यातना और अकेले कैद रखने की घटनाओं को उजागर किया। एक अहम केस जीता, जिससे रॉबेन आइलैंड पर मौजूद राजनीतिक कैदियों- जिनमें नेल्सन मंडेला भी थे- को कानून की किताबों तक पहुंच मिली।

नॉर्वेजियन नोबेल समिति ने जोर दिया कि बढ़ते युद्धों और ‘सही के बजाय ताकत’ की ओर बढ़ते झुकाव के बीच यह पुरस्कार इस बात को मान्यता देता है कि स्थायी शांति कानूनी सिद्धांतों और जवाबदेही पर टिकी होती है, न कि केवल ताकत पर।

नवी पिल्लई का भारत से गहरा नाता है। उनके पिता के परिवार की जड़ें तमिलनाडु के डिंडीगुल जिले के वथलागुंडु में थीं। उनके दादा-दादी 1890 के दशक में मद्रास प्रेसीडेंसी से नटाल में गन्ने के बागानों में काम करने के लिए अनुबंधित मजदूरों के तौर पर गए और उनके दादा के पैर भी इसी जद्दोजहद में कट गए।

उनके पिता बस ड्राइवर थे, लेकिन उन्होंने बेटों के साथ-साथ बेटियों की शिक्षा पर भी जोर दिया। पिता की मौत के बाद उन्होंने तमिलनाडु में अपने बचे हुए रिश्तेदारों को ढूंढा। और साथ-साथ, घृणा और युद्ध में गुम हो गई उस शांति को भी, जिसकी इस दुनिया को सबसे ज्यादा जरूरत है। हर वो नेतृत्व जो शांति की वकालत करता है, वह नवी पिल्लई की संगत में नोबेल पुरस्कार की आभा को महसूस कर सकता है!

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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