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इस साल राज्यसभा के द्विवार्षिक चुनाव सामान्य से अधिक चर्चा में रहे। चूंकि 37 सीटों में से 26 उम्मीदवार निर्विरोध चुने गए तो प्रथमदृष्टया लग सकता था कि चुनाव साधारण रहे होंगे। लेकिन ये एक तरीके से भाजपा का शो बन गए। पार्टी को उसकी जरूरत से भी ज्यादा सीटें मिल गईं। इसमें बिहार, ओडिशा और हरियाणा में हुई क्रॉस वोटिंग का अहम योगदान रहा, जिसने सीधे-सीधे विपक्षी दलों को नुकसान पहुंचाया। चुनावों ने ये भी दिखाया कि भाजपा की अपने उम्मीदवारों को सशक्त बनाने और विरोधियों को कमजोर करने की दोधारी रणनीति का मुकाबला करने में विपक्ष विफल रहा। लेकिन चुनावों का असली महत्व तो नीतीश कुमार के अप्रत्याशित नामांकन और शरद पवार के फिर से राज्यसभा में जाने में था। और इसी में भाजपा की सफलता की कहानी छिपी है। नीतीश और पवार, दोनों ही भारतीय राजनीति के दिग्गज हैं। दोनों ही अपने-अपने राज्यों में कई बार मुख्यमंत्री और केंद्र सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं। यहां तक कि दोनों को कभी प्रधानमंत्री पद का दावेदार तक माना जाता था। दोनों ही आज स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे हैं। भाजपा काफी समय से ‘पाटलिपुत्र’ की गद्दी पर नजरें गढ़ाए थी। वह तो 2025 का बिहार चुनाव भी नीतीश के नेतृत्व में लड़ने से हिचकिचा रही थी, लेकिन बाद में उसे मानना पड़ा। चूंकि चुनाव नीतीश के नाम पर जीता गया और जदयू ने अपनी सीटें लगभग दोगुनी कर लीं तो भाजपा ने भी उन्हें ही मुख्यमंत्री बनाए रखने का निर्णय किया- भले ही वह 89 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी थी, जबकि नीतीश के पास 85 सीटें थीं। हालांकि यह सभी को पता था कि मौका मिलते ही भाजपा पटना में नेतृत्व परिवर्तन का प्रयास करेगी और मुख्यमंत्री की कुर्सी पर अपना कोई नेता बैठाएगी। बिहार भाजपा का ड्रीम प्रोजेक्ट था, जहां वह कभी सरकार नहीं बना पाई थी। लेकिन बदलाव इतनी जल्दी होगा, इसकी उम्मीद कम थी। सबसे जटिल मसला यह था कि नीतीश को कैसे हटने के लिए राजी किया जाए? क्योंकि अपने मुख्यमंत्री पद को बरकरार रखने के लिए ही तो वे इतनी मशक्कत करते आ रहे थे। पटना की गद्दी पर बने रहने के लिए ही उन्होंने कई बार गठबंधन बदले थे। भाजपा की सफलता केवल यही नहीं है कि उसने नीतीश को बिहार से अपदस्थ कर दिया, बल्कि यह है कि ऐसा उसने स्वयं नीतीश की सहमति से किया। नीतीश ने खुद कहा कि वे अब राज्यसभा का अनुभव लेना चाहते हैं। लेकिन बेटे निशांत को उपमुख्यमंत्री पद देना ही उनके कुर्सी छोड़ने का कारण नहीं हो सकता। नीतीश पूर्व समाजवादी हैं और परिवारवाद के खिलाफ रहे राम मनोहर लोहिया व कर्पूरी ठाकुर के अनुयायी रहे हैं। वे चाहते तो बेटे को कभी भी राजनीति में ला सकते थे, लेकिन उन्होंने कभी ऐसा नहीं किया। वैसे याद रहे कि इस समय जदयू के 12 लोकसभा सांसद भाजपा के लिए बेहद अहम हैं। चूंकि भाजपा 240 सांसदों के साथ लोकसभा में अल्पमत में है, इसलिए वह अपने सहयोगियों पर निर्भर है। वह सुनिश्चित करना चाहेगी कि लोकसभा में उसकी सीटों के गणित को किसी प्रकार का खतरा नहीं हो। शरद पवार का निर्विरोध निर्वाचन भी इसी परिप्रेक्ष्य में गौरतलब है। भाजपा ने उनके खिलाफ उम्मीदवार नहीं उतारा, जैसे उसने बिहार और ओडिशा के विपक्षी दलों के सामने उतारे थे। इसी से उन राज्यों में क्रॉस वोटिंग हुई और विपक्ष हारा। पवार को महा विकास अघाड़ी ने राज्यसभा के लिए नामित किया था। इसके तीन दलों में एनसीपी (एसपी) सबसे छोटी सहयोगी है। बाकी दो दल कांग्रेस और शिवसेना (यूबीटी) हैं। इस फैसले ने सभी को चौंकाया, क्योंकि पवार तो संन्यास लेने की बात कर रहे थे। ऐसे में शिवसेना को चिंता है कि भविष्य में पवार एनडीए की सहयोगी एनसीपी के करीब जा सकते हैं, जिसका नेतृत्व दिवंगत अजित पवार कर रहे थे। सभी जानते हैं कि शरद और अजित गुट के बीच विलय की बातचीत चल रही थी। महा विकास अघाड़ी ने शायद यह सोचते हुए पवार को उम्मीदवार बनाया कि उन्हें पर्याप्त समर्थन मिल जाएगा, जबकि किसी अन्य का भाजपा विरोध कर सकती है। भाजपा के इस सद्भावना भरे रवैए से लग रहा है कि उसे उम्मीद है शरद पवार की पार्टी के आठ सांसद भी जरूरत पड़ने पर रिजर्व फोर्स की तरह लोकसभा में उसके काम आ सकते हैं। कुल मिलाकर, नीतीश का राज्यसभा जाना उन्हें और जदयू पर उनकी पकड़ को कमजोर करने वाला है। जबकि पवार का दोबारा राज्यसभा में जाना उन्हें और उनकी पार्टी को मजबूती देगा। और ये दोनों ही कदम अंततः भाजपा को और ताकतवर करेंगे। बिहार, ओडिशा और हरियाणा में हुई क्रॉस वोटिंग ने विपक्षी दलों को नुकसान पहुंचाया। भाजपा की अपने उम्मीदवारों को सशक्त बनाने और विरोधियों को कमजोर करने की दोधारी रणनीति का मुकाबला करने में विपक्ष विफल रहा।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं।)
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