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श्रोता बड़ा हो या छोटा, कथा-सत्संग में उसका सम्मान बराबरी का होना चाहिए। भेदभाव के मामले में अब कोई जगह नहीं बची। छोटे-बड़े का चक्कर घर में और बाहर समान रूप से चल रहा है। तुलसीदास जी ने वो दृश्य लिखा है, जिसमें गरुड़ जी भुशुंडि जी से कथा सुनने गए थे- कथा अरंभ करै सोइ चाहा, तेही समय गयउ खगनाहा। भुशुंडि जी कथा आरंभ करना ही चाहते थे कि उसी समय पक्षीराज गरुड़ जी वहां पहुंच गए। उन्हें देखकर सब हर्षित हुए। उनका बहुत आदर-सत्कार, स्वागत किया गया। बैठने के लिए सुंदर आसन दिया गया। यह व्यवहार प्रत्येक उस व्यक्ति के साथ होना चाहिए, जो सत्संग में उपस्थित रहे। लेकिन आजकल कथा के मंचों से कही जा रही और की जा रही बातें बड़बोल और तमाशे का रूप ले रही हैं। सुधि वक्ता और गंभीर श्रोता, दोनों इससे दु:खी हैं- क्योंकि ये एकमात्र आयोजन और स्थल बचा था, जहां पहुंचकर आदमी अपनी आत्मा तक की यात्रा आसानी से कर सकता था।
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