पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम:  सवाल उठाने से पहले एक प्रश्न खुद से भी पूछें
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पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम: सवाल उठाने से पहले एक प्रश्न खुद से भी पूछें

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30 मिनट पहले

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पं. विजयशंकर मेहता - Dainik Bhaskar

पं. विजयशंकर मेहता

आजकल बिना सोचे-समझे सवाल उछालना तासीर हो गया है। राजनेताओं के निर्णय और व्यवस्था पर खूब सवाल उछाले जा रहे हैं। महाकुम्भ की व्यवस्था पर भी सवाल उछाले जा रहे हैं। जब हमारे सामने सवाल उठाने का अवसर आए तो पहले सवाल को ठीक से जानिए, क्योंकि एक सवाल का एक उत्तर नहीं होता।

कई उत्तर होते हैं। यदि अपने सवाल को ठीक से समझेंगे तो हमें ही उत्तर मिल जाएगा। पांडवों ने कौरवों के साथ जुआ खेला ​था। कौरवों ने उसमें छल किया था। लेकिन समझदारी पांडवों की भी नहीं मानी जा सकती। दुर्योधन ने दु:शासन को द्रौपदी के वस्त्रों पर हा​थ डालने का आदेश दिया था। यह अपमानजनक अप्रिय घटना थी।

इसमें दुर्योधन राजनेताओं की तरह भूमिका निभा रहा था और दु:शासन नौकरशाहों की तरह। आज भी राजनेताओं के आदेश पर नाैकरशाह ऐसे बहुत काम करते हैं। जब हम कोई सवाल उठाएं तो खुद से भी पूछें क्या हम सवाल उठाने लायक हैं। आज दुनिया की व्यवस्था कौरव-पांडवों की द्यूत क्रीड़ा की तरह है। हमें व्यवस्था पर टिप्पणी से पहले समझदारी से काम लेना चाहिए।

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