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- Column By Pandit Vijayshankar Mehta Live In Such A Way In The Household That Enjoyment Is Achieved In Yoga And Yoga Is Achieved In Enjoyment
4 घंटे पहले
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पं. विजयशंकर मेहता
किसी फल में आम जैसी मिठास हो तो स्वाद बन जाएगा और उसी फल में नीम जैसी कड़वाहट हो तो स्वास्थ्य बन जाएगा। कबीरदास जी ऐसा ही फल थे। रवीन्द्रनाथ टैगोर ने कबीरदास जी के लिए मुक्तिदूत शब्द कहा था। कबीर से जुड़कर कौन-सी मुक्ति मिलती है? कबीर स्वयं गृहस्थ थे। उस काल के जितने संत हुए, उनकी गृहस्थी कबीरदास जी की गृहस्थी से बिल्कुल अलग थी।
कबीर ने यह समझाया कि घर-परिवार में रहकर भी आत्मा के माध्यम से ईश्वर तक पहुंचा जा सकता है। कबीर कहते थे कि पूजा-पाठ करते-करते मनुष्य का शरीर यंत्रवत हो जाता है। जबकि पूजा आदत नहीं, स्वभाव होनी चाहिए। गृहस्थी के लिए ही शायद कबीर ने लिखा होगा कि जिन ढूंढा तिन पाइयां, गहरे पानी पैठ।
गृहस्थी एक ऐसा सागर है, जिसमें डुबकी लगाने पर डूबने का डर नहीं है, बल्कि बंधन में ही मुक्ति है और मुक्ति में ही बंधन है। इसलिए कबीरदास जी को याद करते हुए अपनी गृहस्थी में ऐसे रहें कि योग में भोग और भोग में योग सध जाए।








