एन. रघुरामन का कॉलम:  2026 से पहले खुद में साइबर कानून की बुनियादी समझ पैदा करें
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49 मिनट पहले

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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar

एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

बेंगलुरु की एक फाइनेंशियल टेक्नोलॉजी कंपनी में कार्यरत पोलेपल्ली अविनाश से 31 जनवरी 2023 को रिजवान नाम के एक व्यक्ति ने संपर्क किया। उसने खुद को एक्सिस बैंक प्रतिनिधि बताया और क्रेडिट कार्ड का ऑफर दिया। बैंक ने अविनाश से आधार, पैन और सैलरी स्लिप ले ली।

कुछ ही समय बाद अविनाश को बताया गया कि उनका आवेदन रिजेक्ट हो गया है और उन्हें कार्ड नहीं मिलेगा। लेकिन उनके पास 14.2 लाख रुपए का बिल पहुंचा दिया गया। अविनाश ने कहा कि इतनी बड़ी रकम खर्च करना तो दूर, उन्हें तो कार्ड ही नहीं मिला है। लेकिन बैंक अधिकारियों का कहना था कि कार्ड एक्टिव है और किसी अज्ञात व्यक्ति ने उससे कथित भुगतान भी किया है।

रिकवरी एजेंट जब अविनाश के घर आने लगे तो 6 जुलाई 2023 को उन्होंने साइबर क्राइम पुलिस से संपर्क किया और बैंक के अधिकृत एजेंट के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई। 10 जनवरी 2024 तक उन्हें पता चला कि इस फर्जी कार्ड के कारण उनका सिबिल स्कोर भी प्रभावित हुआ है।

बैंक ने शुरुआत में कार्रवाई का भरोसा दिया, लेकिन बाद में चुप्पी साध ली। इधर, रिकवरी का दबाव बढ़ता जा रहा था। मजबूरन अविनाश ने 2024 में बैंक पर अनुचित व्यवहार का आरोप लगाते हुए उपभोक्ता आयोग में शिकायत की। नोटिस मिलने के बावजूद एक्सिस बैंक आयोग के समक्ष पेश नहीं हुआ और मामला एकतरफा चला।

आयोग ने पाया कि बैंक ने न तो सही जांच की, न ही पुलिस में शिकायत दी और इन विसंगतियों के बावजूद रिकवरी के प्रयास जारी रखे। आयोग ने कथित एजेंट से वॉट्सएप चैट, रिकवरी रिकॉर्ड और पुलिस रिपोर्ट का हवाला देते हुए नवंबर 2025 में एक्सिस बैंक को 14.2 लाख रुपए की यह रिकवरी रोकने और मुकदमा खर्च के तौर पर 2 हजार रुपए चुकाने का आदेश दिया।

एक अन्य घोटाले में ठगों ने मुंबई की एक महिला से 3.75 करोड़ रुपए हड़प लिए। एक व्यक्ति ने खुद को ‘जस्टिस चंद्रचूड़’ बताते हुए वर्चुअल कोर्ट सुनवाई कराई। उसने महिला से मनी लॉन्ड्रिंग केस को लेकर पूछताछ की और उसकी जमानत खारिज करने की बात कही। जबकि महिला कहती रही कि वह दोषी नहीं है।

महिला से कहा गया कि वह अपनी पूरी संपत्ति जांच के लिए जमा कराए और सभी म्यूचुअल फंड भी रिडीम करे। अगस्त से अक्टूबर के बीच महिला ने 3.75 करोड़ रुपए ट्रांसफर कर दिए। लेकिन पैसा वापस नहीं मिला तो वह पुलिस के पास पहुंची। जांच के बाद पुलिस ने सूरत के 46 वर्षीय जितेंद्र बियाणी को पकड़ा, जिसको बुजुर्ग महिला से ठगी गई रकम के 1.7 करोड़ रुपए मिले थे।

हम कब समझेंगे कि भारतीय कानून में ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसी कोई अवधारणा नहीं है? कब जानेंगे कि आरबीआई नियमों के मुताबिक यदि हम क्रेडिट कार्ड से हुए अनधिकृत ट्रांजेक्शन की सूचना तीन कार्यदिवस में दे दें तो हमारी जिम्मेदारी शून्य हो जाती है?

यदि बैंक 30 दिनों में शिकायत का समाधान नहीं करता या आपको नजरअंदाज करता है, जैसा एक्सिस बैंक के मामले में हुआ- तो मामला आरबीआई बैंकिंग लोकपाल तक ले जाना चाहिए। हमें यह भी पता होना चाहिए कि सिबिल डिस्प्यूट रिजोल्यूशन पोर्टल इस्तेमाल करके कोई भी अनधिकृत अकाउंट की शिकायत कर सकता है और मामला निपटने तक उसे हटाने की मांग कर सकता है।

चूंकि डिजिटल लेनदेन अब जिंदगी का अनिवार्य हिस्सा बन चुका है तो हस्ताक्षर करके दिया गया हमारा हर दस्तावेज ठगों के हाथ में जाने का खतरा है। ऐसे में कानून की बुनियादी जानकारी से खुद को सुरक्षित रखना हमारी जिम्मेदारी है।

पुलिस और कानूनी एजेंसियां आप-हम जैसे आम लोगों को धमकाने के लिए नहीं होतीं। वे हमारी सुरक्षा के लिए हैं। वो हमारे साथ ठगों के जैसे बात नहीं करते। वो तो अपराधियों से बात करने का लहजा होता है और हर आम आदमी अपराधी नहीं होता।

फंडा यह है कि वादा करो कि 2026 के पहले महीने तक आप कानून की बुनियादी समझ हासिल कर लेंगे। ताकि हम अपनी बचत सुरक्षित रख सकें और कानून का पालन करने वाली एजेंसियों पर दबाव भी कम हो।

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