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19वीं शताब्दी में उपनिवेशवाद ने सैन्य-शक्ति के बल पर देशों को लूटा था। बाद में नव-उपनिवेशवाद ने सैन्य के साथ ही आर्थिक दमखम के जरिए देशों को अधीनता में धकेला। आज ट्रम्प का टैरिफ साम्राज्यवाद हमारे सामने है। स्वाभाविक तौर पर भारत-अमेरिका ट्रेड डील में कुछ न कुछ लेन-देन तो होना ही था और जल्दबाजी में कोई उत्साह दिखाने या निंदा करने की प्रवृत्ति भी ठीक नहीं। लेकिन जो ब्योरे सार्वजनिक हुए, उनमें यह बात चिंता का विषय बनी है कि क्या अमेरिका हमारी तेल-खरीद को नियंत्रित कर रहा है? अमेरिकी सरकार ने एक मॉनिटरिंग कमेटी बनाने के लिए प्रेजिडेंशियल ऑर्डर भी जारी किया है। ये कमेटी निगरानी रखेगी कि भारत रूस से ‘सीधे या परोक्ष रूप से’ तेल न खरीदे। ऐसी कोई भी व्यवस्था हमारी सम्प्रभुता को चुनौती जैसी है। विदेश मंत्री ने इस पर इतना ही कहा है कि ‘हमारे विकल्पों में राष्ट्रीय हित ही केंद्र में रहेगा, जो पर्याप्त उपलब्धता, उचित मूल्य और आपूर्ति की विश्वसनीयता पर निर्भर करेगा।’ अतीत में भी भारत ने हमेशा राष्ट्रीय हित को रणनीतिक स्वाय्तता के संदर्भ में परिभाषित किया है। यह न तो दुनिया से अलग-थलग रहना था, न ही नासमझी भरा आदर्शवाद। यह इस बात की स्वीकारोक्ति थी कि औपनिवेशिक अधीनता से उबर रहे एक सभ्यतागत राष्ट्र को इस निर्णय का अधिकार सुरक्षित रखना चाहिए कि वह किससे व्यापार करे, किससे मित्रता रखे और अपने लोगों के कल्याण की रक्षा कैसे करे। इस सिद्धांत को कभी छोड़ा नहीं गया। सवाल ये है कि क्या कोई तीसरा देश एक सम्प्रभु राष्ट्र को यह निर्देश दे सकता है कि वह क्या चीजें खरीदे, किससे, कितनी मात्रा में और किस मूल्य पर खरीदे? रियायती दरों पर आपूर्ति उपलब्ध होने पर भी भारत को यह सुझाव देना कि वह स्वेच्छा से अपने ऊर्जा-विकल्पों को सीमित कर ले, उससे यह अपेक्षा करने जैसा है कि वह अपने सम्प्रभु अधिकारों की अनदेखी कर दे। अगर कहीं पर रियायती दरों पर तेल हमारे लिए उपलब्ध हो तो उसे खरीदना तो हमारा अपना निर्णय ही होना चाहिए। जब प्रतिबंधों को एकतरफा तरीके से और अपने देश की सीमाओं से बाहर लागू किया जाता है तो वे देशों के बीच समान सम्प्रभुता की अवधारणा को चुनौती देते हैं। ऐसे किसी दबाव के आगे झुकना उस सत्ता को स्वीकारना होगा, जिसमें कुछ देश न सिर्फ अपने, बल्कि दूसरों के लिए भी कानून बनाते हैं। जो ऐसी सहमति देने के समर्थन में हैं, उनका तर्क है कि अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी हमारे लिए बहुत मायने रखती है और हम उसे जोखिम में नहीं डाल सकते। नि:संदेह यह सही है, लेकिन साझेदारियों को कायम रखने के लिए आपसी सम्मान जरूरी है। भारत ने बार-बार दिखाया है कि वह किसी का अनुगामी बने बिना भी उनसे मजबूत रिश्ते रख सकता है। वास्तव में यह स्वायत्तता ही तो भारत को एक मूल्यवान साथी बनाती है, न कि एक आज्ञाकारी साझेदार। यदि आज भारत रूस से तेल खरीद को लेकर प्रतिबंधों को स्वीकार लेता है तो कल रक्षा खरीद, टेक्नोलॉजी पार्टनरशिप या उन देशों से रिश्तों को लेकर भी दबाव बनाया जा सकता है, जो अमेरिका को असुविधाजनक लगते हैं। एक बार आंतरिक निर्णय-प्रक्रिया पर बाहरी वीटो का सिद्धांत स्वीकार लिया, तो यह राह बेहद जोखिमभरी हो जाएगी। यह न तो अमेरिका के साथ साझेदारी के खिलाफ कोई दलील है, न किसी विशेष सप्लायर का बचाव। यह बुनियादी सिद्धांतों की बात है। भारत का राष्ट्रीय हित तभी सबसे सुरक्षित रहता है, जब विकल्पों का चुनाव नई दिल्ली में हो, कहीं और से नहीं। एक स्वतंत्र देश को अपनी मर्जी से खरीदारी करने के लिए किसी की अनुमति की जरूरत नहीं है। भारत ने बार-बार यह दिखाया है कि वह किसी का अनुगामी बने बिना दुनिया की विभिन्न ताकतों से मजबूत रिश्ते रख सकता है। वास्तव में यह स्वायत्तता ही तो भारत को एक मूल्यवान साथी बनाती है, न कि एक आज्ञाकारी साझेदार। (ये लेखक के अपने विचार हैं)
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