पवन के. वर्मा का कॉलम:  2026 में हमें बहुत सारी चीजें अलग तरह से करनी होंगी
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पवन के. वर्मा का कॉलम: 2026 में हमें बहुत सारी चीजें अलग तरह से करनी होंगी

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6 घंटे पहले

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पवन के. वर्मा पूर्व राज्यसभा सांसद व राजनयिक - Dainik Bhaskar

पवन के. वर्मा पूर्व राज्यसभा सांसद व राजनयिक

बीते वर्ष को देखने के दो तरीके होते हैं। पहला, उसके प्रमुख घटनाक्रमों को यंत्रवत रूप से रेखांकित भर करना; और दूसरा, उनका मूल्यांकन करना, उनके प्रासंगिक पहलुओं को चिह्नित करना और यह देखना कि आने वाले वर्ष में क्या किए जाने की आवश्यकता है।

मेरे विचार से, 2025 को चार केंद्रीय मुद्दों के लिए याद किया जाएगा : चुनाव प्रक्रिया की स्वतंत्रता और निष्पक्षता को लेकर उठते सवाल; दिल्ली तथा उससे सटे क्षेत्रों में साफ हवा का संकट; हमारे पड़ोस में जारी उथल-पुथल और ट्रम्प की अप्रत्याशित हरकतों के कारण भारत-अमेरिका संबंधों में पैदा हुई अस्थिरता।

बिहार में एसआईआर को जिस तरह से अंजाम दिया गया, और अब जिस तरीके से इसे पूरे देश में किया जा रहा है, वह बहुत सारे प्रश्न अनुत्तरित छोड़ देता है। यहां मतदाता सूची की शुचिता सुनिश्चित करने के चुनाव आयोग के अधिकार पर सवाल नहीं हैं। लेकिन जिस अंदाज में वो अपनी इस जिम्मेदारी का निर्वहन करता है, वह जरूर चिंताओं के दायरे में है।

यह धारणा लगातार मजबूत हो रही है कि इस प्रक्रिया में पर्याप्त पारदर्शिता का अभाव है। और यह इस अन्य धारणा का परिणाम है कि संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार चुनाव आयोग की स्वायत्तता अपेक्षित स्तर की नहीं रह गई है।

वास्तविक लोकतंत्र यह सुनिश्चित करते हैं कि प्रतिस्पर्धी दलों के बीच होने वाले चुनाव निष्पक्ष हों और उनके नियम सभी पर समान रूप से लागू हों। इसके लिए स्वतंत्र चुनाव आयोग अनिवार्य है। और इसके लिए यह जरूरी है कि उसके आयुक्त तटस्थ हों। वे किसी दल के प्रति झुके न हों। यदि यह विश्वास खंडित होता है तो चुनावों की वैधता सवालों के घेरे में आ जाती है। 2025 ने इस संदर्भ में एक चेतावनी दी है। 2026 को आवश्यक सुधार सुनिश्चित करने होंगे।

2025 में जारी वायु संकट- जिसने उत्तर भारत को हांफने पर मजबूर कर दिया और दिल्ली के निवासियों का दम घोंट दिया- ने भी नागरिकों को यह पूछने पर विवश किया कि यह समस्या हर साल क्यों दोहराई जाती है? इससे भी अधिक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि जब इसके भयावह नतीजे अच्छी तरह से मालूम हैं, तब भी सरकार इसे ठीक करने के लिए ठोस कदम क्यों नहीं उठाती?

सरकार को इस आपदा के सामने असहाय देखना इस धारणा को जन्म देता है कि सत्ता में बैठे लोग केवल वहीं पर सक्रिय होते हैं, जहां वोट दांव पर हों। नागरिकों की ओर से यदि कोई संगठित पहल नहीं हो तो सरकारें बस इंतजार करती रहती हैं कि सालाना संकट अपने आप टल जाए। लेकिन 2025 ने संकेत दिया है कि लोग अब कह रहे हैं : बहुत हुआ। 2026 वह वर्ष हो सकता है, जब नागरिक जवाबदेही की मांग करें। और तब सरकार को कार्रवाई करनी ही होगी।

अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर, पहले नेपाल और फिर बांग्लादेश में उभरे जेन-जी विद्रोह ने भारत को अलग-थलग करने की चीन और पाकिस्तान की दुर्भावनापूर्ण मंशाओं को आगे बढ़ाने में मदद ही की। विशेष रूप से बांग्लादेश में शेख हसीना को उनके शासन के प्रति बढ़ती अलोकप्रियता के बारे में समय रहते सचेत न कर पाना हमारी कूटनीतिक विफलता रही।

लगता है कि हमने वहां के विपक्ष के साथ संवाद के रास्ते खुले रखे बिना अपने सारे दांव उन्हीं पर लगा दिए। जमात-ए-इस्लामी जैसे अतिवादी दलों और भारत-विरोधी तत्वों को वित्तपोषित और प्रोत्साहित करने में पाकिस्तान की भूमिका का आकलन न कर पाना भी एक चूक रही।

उधर पाकिस्तान में, कट्टरपंथी जनरल मुनीर का उभार चिंता का विषय है। मुनीर का ट्रम्प के साथ भोजन करना, सऊदी अरब को रिझाना और चीन के साथ तालमेल बैठाना भी इसी कड़ी में है। ट्रम्प पर हमारा भरोसा भी गलत साबित हुआ और उनके पक्षपातपूर्ण टैरिफों का हमने आक्रामक ढंग से प्रतिकार भी नहीं किया। जबकि चीन ने ट्रम्प की धमकियों का डटकर सामना किया और अब ट्रम्प अमेरिका और चीन से मिलकर बने ‘जी-2’ की बात कर रहे हैं।

हम आशा ही कर सकते हैं कि 2026 में हालात बेहतर होंगे। नए साल की शुरुआत बीते साल पर आत्ममंथन का अवसर भी देती है। 2026 इसी के लिए एक आमंत्रण है, और आवश्यक सुधारात्मक कदम उठाने का भी। नववर्ष की शुभकामनाएं।

हम आशा ही कर सकते हैं कि 2026 में हालात 2025 की तुलना में बेहतर होंगे। नए साल की शुरुआत बीते साल पर आत्ममंथन का अवसर देती है। 2026 इसी के लिए एक आमंत्रण है। आवश्यक सुधारात्मक कदम उठाने का भी। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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