पुरुषों की पुरानी सोच और असमानता ने घटाई जन्म दर:  क्लाउडिया ने कहा भत्ते और छुट्टिया समाधान नहीं; जब वे मददगार से आगे बढ़कर साझेदार बनेंगे तभी आंगन चहकेंगे
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पुरुषों की पुरानी सोच और असमानता ने घटाई जन्म दर: क्लाउडिया ने कहा भत्ते और छुट्टिया समाधान नहीं; जब वे मददगार से आगे बढ़कर साझेदार बनेंगे तभी आंगन चहकेंगे

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‘मैंने जीवन का बड़ा हिस्सा एक सवाल को समझने में लगाया है- दुनिया भर में जन्म दर आखिर इतनी तेजी से क्यों गिर रही है? बीते 50 वर्षों के आंकड़ों को देखने पर एक दिलचस्प बात सामने आई। चाहे अमेरिका हो, यूरोप हो, एशिया हो या कोई और देश…लगभग हर जगह बच्चों की संख्या घट रही है। ऐसा लगा मानो पूरी दुनिया में कोई साझा कारण सक्रिय हो। हम इस ‘जनसांख्यिकीय संकट’ को सिर्फ मातृत्व अवकाश या नकद भत्ते देकर हल नहीं कर सकते। इसके लिए हमें समाज की बुनियाद में बदलाव चाहिए। जब मुझे अर्थशास्त्र के लिए नोबेल से नवाजा गया, तो लोगों को लगा कि मेरा काम आंकड़ों और पुराने दस्तावेजों तक सीमित है। पर सच तो यह है कि मेरा शोध हर उस स्त्री की कहानी है, जो सुबह अलार्म बजने से लेकर रात को लाइट बंद करने तक लगातार ‘बैलेंसिंग एक्ट’ कर रही है। बीते कुछ दशकों में दुनिया के लगभग हर कोने में जन्म दर में भारी गिरावट आई है। पर सच यह है कि महिलाएं मां तो बनना चाहती हैं, लेकिन वे ‘सुपरवुमन’ बनकर खुद को होम कर देने की मंशा नहीं रखतीं। बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में महिलाओं को एक बेशकीमती चीज मिली-‘अपनी मर्जी’। हमने पढ़ाई की, करियर चुना और गर्भनिरोधकों के जरिए अपने शरीर पर हक पाया। पर जैसे-जैसे हम आगे बढ़ीं, गहरा विरोधाभास पैदा हो गया। अमेरिका से एशिया तक हालात मिलते-जुलते हैं। जब महिलाएं पढ़-लिखकर आर्थिक रूप से स्वतंत्र होती हैं, तो बच्चे पैदा करने की कीमत सिर्फ अस्पताल खर्च नहीं रहती। असली कीमत होती है करिअर ब्रेक, प्रमोशन खोना और पहचान का धुंधला पड़ना। यही विरोधाभास हर जगह दिखता है। जन्म दर गिरने का सीधा संबंध पुरुषों की जिम्मेदारी से है- रिसर्च असल समस्या आंकड़ों में नहीं, बल्कि घर के भीतर तालमेल की कमी में है। मेरी रिसर्च बताती है कि जन्म दर गिरने का सीधा संबंध पुरुषों की जिम्मेदारी से है। आधुनिक महिला को ऐसा साथी चाहिए जो बराबरी से जिम्मेदारी निभाए। पर पुरुष परंपराओं से चिपके रहते हैं और महिलाएं भविष्य की ओर देखती हैं, तो टकराव होता है। अगर महिला को भरोसा नहीं कि उसका साथी डायपर बदलने से स्कूल मीटिंग तक बराबर भागीदारी करेगा, तो वह मां बनने का फैसला टाल देती है। अर्थशास्त्र की भाषा में कहें, तो जब तक पुरुष खुद को जिम्मेदार पिता साबित नहीं करते, वे महिलाओं की नजर में बेकार बने रहते हैं। समस्या ऐसे दूर होगी सरकारों व कंपनियों को ऐसी नीतियां बनानी होंगी जो पुरुषों को भी पितृत्व अवकाश लेने के लिए प्रेरित करें। घर का काम सिर्फ महिलाओं का नहीं रहेगा, तब बच्चे बोझ नहीं लगेंगे। पुरुषों को समझना होगा कि जेंडर समानता उनके लिए खतरा नहीं, बल्कि खुशहाल परिवार की गारंटी है। जब महिलाओं को भरोसा होगा कि उनकी आजादी व मातृत्व साथ-साथ चल सकते हैं, तभी घरों में फिर से किलकारियां गूंजेंगी। समाधान आजादी छीनना नहीं, बल्कि उसे सहारा देना है।’



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