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नई दिल्ली2 मिनट पहले
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जस्टिस अभय 31 अगस्त 2021 से सुप्रीम कोर्ट में बतौर जज रहे, और 24 मई 2025 को रिटायर हुए।
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस अभय ओका ने कहा कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राजनीतिक दबदबे से मुक्त रहनी चाहिए। इसके लिए मजबूत कानूनी व्यवस्था और स्वतंत्र संस्थाओं की सुरक्षा का ढांचा जरूरी है।
जस्टिस अभय रविवार को ठाणे में ‘फ्रीडम ऑफ स्पीच एंड अस’ विषय पर व्याख्यान दे रहे थे। उन्होंने संवैधानिक पदों पर नियुक्ति में जवाबदेही को लेकर सवाल उठाए।
उन्होंने कहा कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव लोकतंत्र की बुनियाद हैं। साथ ही, बोलने की आजादी मौलिक अधिकार है। किसी तर्क का जवाब शारीरिक ताकत से नहीं, तर्क से दिया जाना चाहिए।
रिटायर जस्टिस ओका ने 15 अक्टूबर को SIR को लेकर भी बयान दिया था। उन्होंने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट को मई 2026 में दिए SIR को सही ठहराने वाले अपने फैसले पर दोबारा विचार करना चाहिए।

चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर सवाल
जस्टिस ओका ने कहा कि ऐसी व्यवस्था और कानूनी प्रावधान होना जरूरी है, जिससे चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राजनीतिक दबदबे से तय न हो।
उन्होंने कहा कि पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने करीब 14 साल पहले कॉलेजियम व्यवस्था का प्रस्ताव दिया था। इसमें प्रधानमंत्री, लॉ मिनिस्टर, लोकसभा और राज्यसभा में विपक्ष के नेता तथा चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया शामिल होते।
उनके मुताबिक, इस व्यवस्था का मकसद चुनाव आयुक्तों के चयन की प्रक्रिया को वास्तव में स्वतंत्र बनाना था।
बोलने की आजादी लोकतंत्र के लिए जरूरी
अभय ओका ने कहा कि लोकतंत्र को बचाने के लिए बोलने की आजादी की रक्षा करनी होगी। इसके बिना जीवन अपना सार्थक अर्थ खो देता है।
उन्होंने कहा कि हर नागरिक को अपने विचार और नजरिए रखने का मौलिक अधिकार है। किसी बहस का जवाब बहस से दिया जाना चाहिए, शारीरिक बल से नहीं।
चुनाव आयुक्त पर सुप्रीम कोर्ट के 4 जज/पूर्व जज बयान दे चुके
- सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस उज्जल भुइयां: मतदाता अधिकारों को लेकर चिंता जताई थी। उन्होंने कहा कि लाखों लोगों को मतदान के अधिकार से वंचित करने वाली प्रक्रिया मनमानी और संवैधानिक व्यवस्था के विरुद्ध होगी।
- पूर्व CJI जस्टिस बीआर गवई: जस्टिस गवई ने भुइयां की टिप्पणी के औचित्य पर सवाल उठाए और कहा कि अदालत में लंबित मामले पर वर्तमान जज को सार्वजनिक टिप्पणी करने से बचना चाहिए।
- पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस रोहिंटन फली नरीमन: आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए, मतदाता सूची से बड़ी संख्या में नाम हटने और चुनाव आयोग के कामकाज पर चिंता जताई।
- पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस वी. गोपाल गौड़ा: आयोग और SIR की आलोचना की। SIR पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को वापस लेने की मांग की। आरोप लगाया कि आयोग ने कोर्ट में महत्वपूर्ण तथ्य नहीं रखे।
इनके अलावा पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस हेमंत गुप्ता और जस्टिस पंकज मित्तल का नाम भी शामिल है, जो उन 42 रिटायर जजों में शामिल, जिन्होंने खुले पत्र में चुनाव आयोग का समर्थन किया और उसके खिलाफ आरोपों को राजनीतिक हितों से प्रेरित बताया।








