6 घंटे पहलेलेखक: शिवाकान्त शुक्ल
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सवाल- मैं कोलकाता से हूं। मेरी 16 साल की बेटी क्लास 10 में पढ़ती है। पिछले कुछ दिनों से वह स्कूल के अपने एक क्रश के बारे में बताती है। कभी उसकी बातों से लगता है कि वह रिलेशनशिप के बारे में बहुत क्यूरियस है, तो कभी ऐसा लगता है, जैसे किसी फ्रेंड के इन्फ्लुएंस में वह डेटिंग एक्सप्लोर करना चाहती है।
मैं उसे सुनती हूं, ताकि वह मुझसे खुलकर बात करे, लेकिन मेरे मन में कुछ डर भी हैं। क्या वह इन सब चीजों के लिए इमोशनली मेच्योर है? कहीं वह सोशल प्रेशर में तो ऐसा नहीं कर रही है। बेटी से इस बारे में हेल्दी डायलॉग कैसे करूं। उसे डेटिंग की जिम्मेदारी और खतरे के बारे में कैसे समझाऊं?
एक्सपर्ट: डॉ. अमिता श्रृंगी, साइकोलॉजिस्ट, फैमिली एंड चाइल्ड काउंसलर, जयपुर
जवाब- यह अच्छी बात है कि आपकी बेटी आपसे अपने क्रश के बारे में बात कर रही है। यह एक पॉजिटिव साइन है। ज्यादातर बच्चे पेरेंट्स से ऐसी बातें छुपाते हैं। इसके चलते कई बार वे गलत रिश्तों में फंस जाते हैं।
हालांकि आपके खुलेपन ने बेटी को सेफ स्पेस दिया है। आप उसकी बातें सुनती हैं और उसे जज नहीं करतीं। एक पेरेंट और टीनएजर बच्चे के बीच यही हेल्दी रिश्ते की बुनियाद है। लेकिन यहां ये समझना भी जरूरी है कि आपकी बेटी अभी जिस उम्र से गुजर रही है, वहां उसके जीवन में रिश्ते, अट्रैक्शन, सेक्शुएलिटी, बॉडी-चेंजेस और सोशल प्रेशर जैसे कई नए अनुभव आने वाले हैं।
ऐसे में इन विषयों को घर में टैबू बनाने की बजाय, उन पर खुलकर साइंटिफिक तरीके से बातचीत करना बेहद जरूरी है। दरअसल बच्चे तभी भटकते हैं, जब उनसे किसी जरूरी विषय पर खुलकर चर्चा नहीं होती है। जब उन्हें स्पष्ट गाइडेंस नहीं मिलता, तब वे दोस्तों, इंटरनेट और सोशल मीडिया से आधी–अधूरी और गलत जानकारी हासिल करते हैं।
टीनएज में डेटिंग क्यूरियोसिटी क्यों बढ़ती है?
टीनएज वह उम्र है, जब बच्चे फीलिंग्स और रिश्ते की दुनिया को पहली बार गहराई से महसूस करते हैं। इस क्यूरियोसिटी को गलत नहीं समझना चाहिए। यह विकास का स्वाभाविक हिस्सा है। वे खुद को समझना चाहते हैं, दूसरों से कनेक्ट होना चाहते हैं।
इसी उम्र में उनके शरीर में कई हॉर्मोनल बदलाव आना शुरू होते हैं। लड़के और लड़कियों, दोनों में विपरीत जेंडर के प्रति आकर्षण पैदा होता है। यह प्रकृति का डिजाइन है, इसके पीछे प्योर साइंस है। कोई भी सोचकर ऐसा नहीं करता। यह स्वाभाविक रूप से होता ही है।
ये बात अलग है कि हमारे आसपास का माहौल, सोशल मीडिया और पॉपुलर कल्चर इस बारे में हमारी समझ और राय को प्रभावित करते हैं।

क्रश और प्यार में फर्क समझाएं
टीनएज में क्रश होना पूरी तरह नॉर्मल है। यह एक तरह का हल्का-सा आकर्षण होता है, जो अक्सर किसी की पर्सनैलिटी, लुक्स या बात करने के तरीके से जुड़ा होता है और समय के साथ बदल भी सकता है। लेकिन इस उम्र में कई बार बच्चे क्रश को ही प्यार समझ लेते हैं। इसके लिए बेटी को कुछ रिलेटेबल और आसान उदाहरण देकर समझाएं।
आप उससे कह सकती हैं कि “क्रश वो होता है, जिसके बारे में सोचकर अच्छा लगता है, एक्साइटमेंट होता है। लेकिन प्यार वो होता है, जिसमें सामने वाले की खुशी, सेफ्टी और इमोशंस की जिम्मेदारी भी महसूस होती है।”
आप यह भी समझा सकती हैं कि क्रश अक्सर जल्दी शुरू होता है और जल्दी बदल भी सकता है। वहीं प्यार धीरे-धीरे समझ, भरोसे और सम्मान से बनता है। क्रश में ज्यादा फैंटेसी होती हैं, जबकि प्यार में रियलिटी और जिम्मेदारी होती है। इससे बच्ची को क्रश और प्यार में अंतर समझ आएगा।
हर उम्र की जिम्मेदारी अलग है
आप अपनी बेटी को यह समझा सकती हैं कि रिलेशनशिप सिर्फ फीलिंग नहीं, एक इमोशनल जिम्मेदारी भी है। जैसे हमें पता होता है कि आग में हाथ डालेंगे तो हाथ जल सकता है। वैसे ही जिंदगी में भी हमारे हर फैसले, हर एक्शन का कोई परिणाम होता है। सही फैसलों का परिणाम सही और गलत फैसलों का परिणाम गलत होता है।
रिश्ते भी ऐसे ही होते हैं। रिश्ते एक जिम्मेदारी हैं। जिम्मेदारी उम्र के साथ धीरे–धीरे समझ में आती है। हर उम्र की जिम्मेदारी अलग होती है। जैसे छोटे बच्चों की जिम्मेदारी है स्कूल जाना, होमवर्क करना, एक्जाम पास करना और बड़ों की जिम्मेदारी है, जॉब करना, पैसे कमाना, घर संभालना।
हम बच्चों को तो जॉब करने या पैसे कमाने की जिम्मेदारी नहीं दे सकते क्योंकि अभी वे इतने मेच्योर नहीं हुए हैं। उसी तरह रिलेशनशिप की जिम्मेदारी भी उम्र और मेच्योरिटी के साथ आती है।
नोट: कुल मिलाकर कहने का आशय ये है कि बच्चा जो कर रहा है, उसे करने से रोकना नहीं है। उससे उसके बारे में खुलकर बात करनी है। रोजमर्रा की जिंदगी के सरल और आसानी से समझ में आने वाले उदाहरणों से समझाना है।
रिलेशनशिप का अच्छा-बुरा पक्ष
टीनएज रिलेशनशिप में कनेक्शन और इमोशनल सपोर्ट की बहुत जरूरत होती है। लेकिन साथ ही पढ़ाई से ध्यान भटकना, गलत फैसले लेना, डिजिटल रिस्क और इमोशनल ओवरलोड जैसे खतरे भी जुड़े होते हैं। डर दिखाने की बजाय संतुलित तरीके से रिश्ते के दोनों पहलू उसके सामने रखें। इससे बेटी खुद सोच-समझकर सही और गलत का फर्क कर सकेगी।

सोशल प्रेशर को नेविगेट करना
टीनएज में किशोरों को FOMO (फिअर ऑफ मिसिंग आउट) होता है। वे लगातार दूसरों से अपनी तुलना करते रहते हैं और यह तुलना बहुत असर भी डालती है। अगर आसपास या पियर ग्रुप में दोस्तों के बॉयफ्रेंड–गर्लफ्रेंड हैं तो भी बच्चे एक तरह का सोशल प्रेशर महसूस करते हैं। बच्चे को समझाएं कि रिलेशनशिप कोई प्रतियोगिता नहीं है। सबकी अपनी गति और अपना तरीका होता है।

डेटिंग पर बातचीत कैसे करें?
उसे यह मैसेज दें कि डेटिंग अपराध नहीं है, न ही शर्म की बात है। लेकिन असली बात है कि ये कब, कैसे और किसके साथ हो रहा है। उससे कहें कि अगर कभी कोई अच्छा लगे, किसी के प्रति अट्रैक्शन हो तो तुम मुझसे बात कर सकती हो। मैं बिल्कुल गुस्सा नहीं करूंगी। हम मिलकर समझेंगे कि वह रिश्ता ठीक है या नहीं।”
आपके रिएक्शन बैलेंस्ड होने चाहिए। अगर घबराहट, चिंता या गुस्सा दिखेगा तो बच्ची अपनी बातें शेयर करना बंद कर सकती है। दिल और दिमाग दोनों खुले रखें। उसकी पूरी बात सुनें और फिर धीरे से गाइड करें।
अगर वह किसी क्रश या दोस्त का जिक्र करती है तो कोशिश करें कि आप भी उस बच्चे को जानें, उसे घर पर आने दें, नॉर्मल बातचीत करें। जब माता-पिता बच्चे के दोस्तों से जुड़े रहते हैं तो बच्चे ज्यादा सेफ होते हैं और गलत फैसलों की संभावना कम हो जाती है।
डेटिंग की जिम्मेदारी समझाएं
बेटी को डेटिंग के इमोशनल साइड और बाउंड्रीज के बारे में भी समझाना जरूरी है, लेकिन डर दिखाकर नहीं। उसे बताएं कि रिलेशनशिप का असर उसकी पढ़ाई, फोकस और मानसिक सेहत पर भी पड़ सकता है।
साथ ही यह भी समझाएं कि रिश्तों में ब्रेकअप की संभावना होती है। अगर ऐसा हो जाए, तो खुद को कैसे संभालना है और कब मदद मांगनी है। उसके लिए ये सब जानना भी जरूरी है।

लाइफ बैलेंस सिखाना जरूरी
टीनएज में कई बार बच्चे रिश्ते में आ जाते हैं, लेकिन पेरेंट्स को नहीं बताते हैं। ऐसे में उन्हें लाइफ बैलेंस के बारे में समझाना भी बहुत जरूरी है। बेटी को बताएं कि रिलेशनशिप जिंदगी का एक हिस्सा है, पूरी जिंदगी नहीं। पढ़ाई, करियर, स्किल्स, हेल्थ और दोस्त, सबका अपना महत्व होता है। किसी एक के लिए बाकी सब को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
अगर कोई रिश्ता उसकी नींद, टाइम-टेबल, पढ़ाई या मानसिक शांति को डिस्टर्ब करने लगे तो वह हेल्दी नहीं हो सकता है। आप एक सिंपल और रियलिस्टिक रूटीन बनाने में उसकी मदद कर सकती हैं। जैसेकि-
- पढ़ाई के लिए एक तय समय, ताकि पढ़ाई डिसिप्लिन में रहे।
- फोन और सोशल मीडिया के लिए सीमित समय, जिससे वह डिजिटल ओवरलोड से बचे।
- अपने और परिवार के साथ क्वालिटी टाइम, ताकि इमोशनल बैलेंस बना रहे।
अंत में यही कहूंगी कि आपकी बेटी को हमेशा यह महसूस होना चाहिए कि ‘मैं कभी भी अपनी बात मम्मी को बता सकती हूं।’ यह विश्वास उसे गलत फैसलों से बचाएगा और भविष्य में भी आपके रिश्ते को मजबूत बनाए रखेगा। बेटी को आपका जजमेंट नहीं, आपका भरोसा और सपोर्ट चाहिए। वह खुद सही समय पर सही फैसला लेना सीख जाएगी।
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