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- Priyadarshan Column: AI Steals Memory, Will It Steal Imagination Too?
10 घंटे पहले
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प्रियदर्शन लेखक और पत्रकार
एआई को लेकर हमारा उत्साह कितना वैज्ञानिक है और कितना उपभोक्तावादी? क्या हम एआई से पैदा होने वाली वास्तविक सम्भावनाओं या चुनौतियों के प्रति सचेत हैं? या हम उसे बस इस्तेमाल में आने वाली ऐसी चीज समझ रहे हैं, जिससे हमारा बहुत सारा काम आसान हो जाएगा? या ऐसा खतरा जिससे कई नौकरियां चली जाएंगी? या जिससे नई तरह की नौकरियां पैदा होंगी?
दिल्ली में पिछले दिनों सम्पन्न हुई एआई समिट के दौरान जो चर्चा रही, उससे लगभग यही सारी बातें निकलकर आती रहीं। एआई हमारे लिए खेती आसान कर देगा, कारोबार आसान कर देगा, इलाज आसान कर देगा, कुछ नौकरियां खत्म करेगा तो नई नौकरियां पैदा करेगा। इस चर्चा में इस उपभोक्तावादी समझ के साथ यह ऐलान भी जुड़ा रहा कि भारत आने वाले वर्षों में एआई क्रांति के पीछे नहीं चलेगा, बल्कि उसको आकार देगा।
इसमें शक नहीं कि एआई बिल्कुल एक ऐसी क्रांति का आगाज है, जिसके वास्तविक परिणामों से हम अब तक अनजान हैं। जानकार इसे औद्योगिक क्रांति से बड़ी बता रहे हैं, जिसके बाद दुनिया बदल गई थी।
युवल नोआ हरारी अपनी किताब “नेक्सस’ में इसके खतरों से आगाह कर चुके हैं। उनके मुताबिक एआई सूचनाओं का परमाणु बम साबित होगा। उससे बड़ी फिक्र यह है कि पहली बार मनुष्य सभ्यता के सामने एक ऐसी मशीन है, जो खुद फैसले कर सकती है। सैन्य उपक्रमों या एटमी अभियानों में इसका इस्तेमाल खतरनाक भी हो सकता है।
एआई की वजह से सूचनाओं को ग्रहण करने की हमारी क्षमता, संवेदना का वहन कर सकने का हमारा अभ्यास काफी कुछ बदल सकते हैं। कृत्रिम मेधा हमारे लिए कविता-उपन्यास भी लिख देगी और टीवी सीरियल भी बना देगी।
इस लिहाज से इस नए प्रयोग के आगे हमें कुछ सतर्क-सावधान रहने की जरूरत है। लेकिन हमने माहौल कुछ ऐसा बना रखा है कि इस एआई क्रांति को हर जगह अमल में लाएंगे- शिक्षा हो, स्वास्थ्य हो या कोई दूसरा क्षेत्र। स्कूलों-कॉलेजों में पढ़ाई के लिए नए-नए एआई मॉडल पेश किए जा रहे हैं। लेकिन एआई बच्चों को पढ़ाएगा तो उनका स्वाभाविक विकास हो पाएगा?
स्लेट या कॉपी पर रेखाएं खींचने, आकार बनाने, अक्षर सीखने, वाक्य गढ़ने आदि की जो प्रक्रिया होती है, जिसमें अंगुलियों में फंसी पेंसिल या कलम सहायक होती है और जिसमें कई बार अपना लिखा-रचा मिटाने या काटने की जरूरत भी पड़ती है, वह वास्तविक शिक्षण है।
यह शब्द ज्ञान भर नहीं है, या इतिहास-भूगोल, गणित-विज्ञान का ऐसा पाठ नहीं है, जो एआई पढ़ा दे और उसे लेकर बच्चे जीवन के मैदानों में उतर जाएं। कॉपी-पेंसिल-रबर से रगड़-रगड़ कर धीरज के साथ सबकुछ सीखने वाले बच्चे जीवन में भी रचने-मिटाने का पाठ सीखते हैं। लेकिन एआई के तराशे हुए ज्ञान से निकले बच्चे उतने ही यांत्रिक हो सकते हैं, जितने कृत्रिम मेधा के मॉडल।
बेशक, तकनीक से डरने की जरूरत नहीं है- यह इतिहास ने बताया है। मगर मेरी तरह के लोगों की फिक्र यह है कि इंटरनेट ने हमारी स्मृति छीन ली, एआई हमारी कल्पनाशीलता न छीन ले। अब हम कुछ भी याद नहीं रखते, सब नेट पर खोज लेते हैं- अपनों के नाम-पते-नम्बर और उनके घर तक ले जाने वाले रास्ते तक। तकनीक का अगला आक्रमण हमारी कल्पनाशीलता पर होना है, क्योंकि हम सारे चित्र, सारे नक्शे, सारी कलात्मक वस्तुएं एआई से बनवा लेने की कल्पना कर रहे हैं।
एआई का आगमन एक सच्चाई है। इस दुनिया में वैज्ञानिक ढंग से उतरेंगे तो वाकई एआई क्रांति को आकार देने में कुछ योगदान दे पाएंगे। लेकिन अगर कारोबारी या सजावटी-दिखावटी ढंग से सोचेंगे तो जगहंसाई ही करवाएंगे।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)









