प्रो. चेतन सिंह सोलंकी का कॉलम:  जितनी खपत उतनी निर्भरता और जितनी निर्भरता उतनी असुरक्षा
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प्रो. चेतन सिंह सोलंकी का कॉलम: जितनी खपत उतनी निर्भरता और जितनी निर्भरता उतनी असुरक्षा

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10 घंटे पहले

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प्रो. चेतन सिंह सोलंकी आईआईटी बॉम्बे में प्रोफेसर - Dainik Bhaskar

प्रो. चेतन सिंह सोलंकी आईआईटी बॉम्बे में प्रोफेसर

हमारी आधुनिक जिंदगी ऊर्जा पर चलती है और ज्यादातर यह कार्बन-आधारित ऊर्जा होती है। दुनिया की कुल ऊर्जा खपत का 80% से अधिक हिस्सा आज भी जीवाश्म ईंधनों- कोयला, तेल और प्राकृतिक गैस- से आता है। लेकिन कुछ ही देश ऐसे हैं, जिन्हें कोयला, तेल और गैस जैसे कार्बन ऊर्जा स्रोतों की आपूर्ति का वरदान मिला है। बाकी देश आयात पर निर्भर रहते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि ऊर्जा हजारों किलोमीटर की दूरी तय करके अपने उपयोग की जगह पर पहंचती है।

कई बार, यह परिवहन समुद्र के संकरे रास्तों से होकर गुजरता है। जितनी अधिक दूरी और जितना संकरा मार्ग, उतना ही अधिक जोखिम। ये रास्ते, थोड़े से भी व्यवधान के प्रति बेहद संवेदनशील होते हैं। इन संकरे रास्तों में आने वाली जरा-सी भी गड़बड़ी बहुत बड़ी बाधा खड़ी कर देती है। यही कारण है कि इन्हें एनर्जी चोक-पॉइंट्स कहा जाता है।

ऐसे कुछ प्रमुख चोक-पॉइंट में शामिल हैं- स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (ओमान और ईरान के बीच), स्वेज नहर (मिस्र में), बाब-अल-मंदेब (यमन और जिबूती/एरिट्रिया के बीच), मलक्का जलडमरूमध्य (मलेशिया, इंडोनेशिया और सिंगापुर के बीच) और पनामा नहर (पनामा में)।

इनमें से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज अभी सर्वाधिक चर्चा में है। ये सभी चोक-पॉइंट्स केवल भौगोलिक स्थान नहीं हैं; ये वैश्विक ऊर्जा व्यवस्था की कमजोर नस हैं। ये नस जिसके हाथ में होगी, वह इसे अपनी सुविधा के अनुसार उपयोग कर सकता है और करता ही है।

विश्व के इन ऊर्जा चोक-पॉइंट्स पर निर्भरता एक नाजुक संतुलन बनाती है। 2021-22 में स्वेज नहर के अवरुद्ध होने की घटना ने दिखाया था कि वैश्विक व्यापार कितना संवेदनशील है। इसी तरह स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में तनाव वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ाता है।

इन्हें अकसर अलग-अलग घटनाओं के रूप में देखा जाता है, लेकिन ये एक गहरी सच्चाई उजागर करती हैं कि विश्व की ऊर्जा-व्यवस्था मजबूत नहीं है। आखिर यह कैसे हो सकता है कि ऊर्जा- जो आधुनिक जीवन और आधुनिक अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा है- वह खुद इतनी कमजोर हो? ऊर्जा पर यह निर्भरता पूरी दुनिया को अस्थिर बनाती है और देशों के बीच आपसी संघर्ष की आशंका पैदा करती है।

वास्तविक समस्या इन ऊर्जा चोक-पॉइंट्स की भौगोलिक स्थिति नहीं, हमारी ऊर्जा आपूर्ति की डिजाइन में है। हम आधुनिक मनुष्यों ने ऐसी वैश्विक ऊर्जा प्रणाली बनाई है, जिसमें उत्पादन कुछ क्षेत्रों में केंद्रित है और उपभोग पूरी दुनिया में फैला हुआ है।

यह असंतुलन ऊर्जा को सीमित मार्गों से गुजरने के लिए मजबूर करता है, जिससे जोखिम बढ़ता है। जितनी खपत, उतनी निर्भरता। जितनी निर्भरता, उतनी असुरक्षा। यह असुरक्षा आज, कल और दशकों बाद भी रहने वाली है।

हवा, पानी और मिट्टी का प्रदूषण भी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से कार्बन ऊर्जा का नतीजा है। ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन भी तेल, गैस और कोयले के कारण है। ऊर्जा आयात पर हमारी निर्भरता और दुनिया में फैली अस्थिरता को देखते हुए यह बेहद जरूरी है कि हम ऊर्जा आपूर्ति के लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था खोजें।

इस नई ऊर्जा व्यवस्था के तहत, मैं दो अहम बातों पर जोर देना चाहूंगा : पहली- इस नई व्यवस्था में यह अनिवार्य होना चाहिए कि व्यक्ति, संस्थाएं और देश अपनी ऊर्जा की खपत कम करें। और दूसरी- ऊर्जा की सभी जरूरतें जहां तक हो सके, स्थानीय स्तर पर ही पूरी की जाएं। इससे व्यवस्था अधिक मजबूत, न्यायसंगत और पृथ्वी की सीमाओं के अनुरूप बन सकती है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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