संजय अग्रवाल का कॉलम:  हमने अपनी पूर्ण क्षमताओं का अभी तक दोहन नहीं किया है
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संजय अग्रवाल का कॉलम: हमने अपनी पूर्ण क्षमताओं का अभी तक दोहन नहीं किया है

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भारत की विश्वसनीय, लो-कार्बन ऊर्जा सुरक्षा की खोज में एक रणनीतिक साधन के रूप में थोरियम पुनः उभर रहा है। लेकिन यदि इसे एक संभावना से आगे बढ़ाकर बिजली संयंत्रों तक भी पहुंचाना है तो नीतिगत, टेक्नोलॉजी और संस्थागत अंतरालों को पाटना होगा। वैश्विक स्तर पर, थोरियम को लंबे समय से यूरेनियम के मुकाबले अधिक सुरक्षित व प्रचुर विकल्प के रूप में देखा गया है। 1950 से 1970 के दशकों में अमेरिका और यूरोप में किए गए प्रयोग व्यावसायिक पैमाने तक नहीं पहुंच पाए, क्योंकि सस्ते यूरेनियम, लाइट-वॉटर रिएक्टरों के प्रभुत्व और हथियारों से लिंक्ड फ्यूल-साइकिल्स ने निवेश को अन्यत्र मोड़ दिया था। भारत इस संदर्भ में एक उल्लेखनीय अपवाद रहा है, क्योंकि डॉ. होमी भाभा के तीन-चरणों वाले परमाणु कार्यक्रम की परिकल्पना हमारे विशाल थोरियम भंडार के आधार पर ही की गई थी। पहले चरण में प्राकृतिक यूरेनियम और हैवी-वॉटर रिएक्टर्स, दूसरे चरण में फास्ट ब्रीडर रिएक्टर्स और तीसरे चरण में थोरियम-आधारित प्रणालियां। फिर भी, बड़े पैमाने पर थोरियम का उपयोग अभी तक नहीं किया जा रहा है। संसदीय उत्तरों (2015) में अनुमान लगाया गया था कि फास्ट ब्रीडर टेस्ट रिएक्टर (एफबीटीआर) के 2040 के दशक में स्थायी पैमाने पर पहुंचने के 3-4 दशकों बाद ही कॉमर्शियल थोरियम रिएक्टर संभव हो सकेंगे- यानी 2070-2080 तक की टाइमलाइन। आज भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर का एडवांस्ड हैवी-वॉटर रिएक्टर- जो अपनी लगभग 60% ऊर्जा थोरियम से प्राप्त करता है- टेक्नोलॉजिकल तत्परता का प्रतीक है। भारत की दीर्घकालिक परमाणु योजना में जो कमियां हैं, उनके लिए हमारा विजन कम और सीक्वेंसिंग, संसाधन-प्रबंधन तथा राजनीतिक अर्थव्यवस्था अधिक जिम्मेदार रही है। तीन-चरणों वाली रणनीति ने यह मान लिया था कि हैवी-वॉटर रिएक्टरों का तीव्र विस्तार होगा, फास्ट ब्रीडर रिएक्टर समय पर स्थापित होंगे और जटिल ईंधन निर्माण में सक्षम एक औद्योगिक इकोसिस्टम विकसित होगा- लेकिन इन धारणाओं को बार-बार प्रतिबंधों, वित्तीय सीमाओं और परियोजनाओं में होने वाले विलंबों ने कमजोर किया है। 1962 के परमाणु ऊर्जा अधिनियम के तहत सार्वजनिक क्षेत्र के प्रभुत्व ने एक अपने में बंद और अतिशय सतर्क कार्य-संस्कृति को जन्म दिया। इनोवेशन और विस्तार कुछ ही सार्वजनिक उपक्रमों और अनुसंधान केंद्रों तक सीमित रहे, जहां प्रतिस्पर्धी दबाव या वैश्विक एकीकरण का अभाव था। इन कमियों के कारण अपेक्षा से अधिक समय तक कोयले और आयात पर हमारी निर्भरता बनी रही। जहां प्रेशराइज्ड हैवी-वॉटर रिएक्टर (चरण-1) की क्षमता बढ़ी, वहीं प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर और थोरियम आधारित चरण (चरण-2 और 3) पीछे रह गए। “शांति’ कानून (भारत में बदलाव के लिए परमाणु ऊर्जा के सतत दोहन और विकास विधेयक, 2025) ने 1962 के परमाणु ऊर्जा अधिनियम और 2010 के परमाणु क्षति के लिए नागरिक दायित्व अधिनियम का स्थान ले लिया है। यह निजी भारतीय कंपनियों को रिएक्टरों के निर्माण, स्वामित्व, संचालन की अनुमति देता है तथा ईंधन निर्माण- जिसमें यूरेनियम-235 का रूपांतरण, परिशोधन और एक सीमा तक संवर्धन शामिल है- में भागीदारी की भी अनुमति देता है। संवेदनशील गतिविधियां सरकार के लिए सुरक्षित हैं। इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि “शांति’ अधिनियम राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित अपवादों के अधीन, परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोगों के लिए पेटेंट की अनुमति देता है। थोरियम के संदर्भ में, यह संयुक्त उपक्रमों और निजी क्षेत्र के नेतृत्व वाली डेमंस्ट्रेशन-परियोजनाओं के लिए भी एक स्पेस रचता है। डॉ. होमी भाभा के तीन-चरणों वाले परमाणु कार्यक्रम की परिकल्पना हमारे विशाल थोरियम भंडार के आधार पर ही की गई थी। इसमें तीसरे चरण में थोरियम-आधारित प्रणालियां थीं। फिर भी, बड़े पैमाने पर थोरियम का उपयोग अभी तक नहीं किया जा रहा है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)



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