एन. रघुरामन का कॉलम:  ‘कोविड-दयालुता’ की भावना को फिर से जगाने की जरूरत है
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एन. रघुरामन का कॉलम: ‘कोविड-दयालुता’ की भावना को फिर से जगाने की जरूरत है

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1960 के दशक के उत्तरार्ध में एक दिन मैंने नागपुर के सीताबर्डी की मुख्य सड़क पर स्थित ‘विश्रांति गृह’ नामक रेस्तरां के बाहर अपनी साइकिल खड़ी की, ताकि वहां बैठी दंतविहीन वृद्धा से कुछ गजरे खरीद सकूं। जैसे ही वे उन्हें पैक करने लगीं, रेस्तरां के भीतर से एक वेटर बाहर आया और उन्हें पत्ते के कटोरे में दो गरम इडलियां और एक कप साम्भर थमा दिया। वृद्धा ने उसे धन्यवाद दिया और धीमे से कहा, मैंने अभी तक अपनी ‘बोहनी’ भी नहीं की है। वेटर ने उत्तर दिया, साहब ने कहा है कि आपको भुगतान करने की जरूरत नहीं है। फिर उसने आगे जोड़ा कि उन्होंने देखा आपने अभी तक कुछ खाया नहीं है और आपके नाश्ते का समय काफी पहले ही बीत चुका है। वृद्धा ने कैश काउंटर की ओर देखा, जहां रेस्तरां के मालिक मणि अय्यर अपनी सुपरिचित सफेद धोती और आधी बांह की कमीज पहने बैठे थे। वृद्धा ने उनकी तरफ देख कृतज्ञता में सिर झुकाया; अय्यर ने बस मुस्कराकर हाथ हिलाया और ग्राहकों से पैसे लेने में व्यस्त हो गए। जब वृद्धा ने मुझे गजरे थमाए, तो धीमे-से फुसफुसाकर कहा, वो भगवान का रूप हैं। मैं मुस्कराया और चला गया। जब मैंने बाद में यह बात अपनी मां को बताई तो उन्होंने कहा, जब आप किसी के चेहरे पर भूख पढ़ सकें, तब उसे भोजन देना चाहिए। मणि अय्यर इसमें निपुण थे; वे रोजाना अपने दरवाजे से गुजरने वाले असंख्य भूखे चेहरों को जो देखते थे। मां उपरोक्त शब्दों का अपने जीवन में पालन भी करती थीं। हर गर्मी में- मानसून से पहले- मजदूर हमारे घर की दीवारों पर सफेद रंग पोतने और छत पर लगी पारम्परिक, हाथ से बनी मिट्टी की खपरैलें बदलने आते थे। दोपहर के भोजन के समय मैं उन्हें एक कोने में बैठे देखता था, जहां वे अखबार में लपेटकर लाई सूखी रोटियां निकालकर, उन्हें केवल प्याज और हरी मिर्च के साथ खाते थे। उन्हें देखते हुए मैंने अकसर अपनी मां की आंखों में आंसू देखे। वे मजदूरों के लिए पहले से ही कुछ ग्रेवी वाला आइटम बनाकर रखती थीं। घर का बना ये भोजन करते समय उन मजदूरों के चेहरे पर चमक देखते ही बनती थी। दशकों बाद, कोविड लॉकडाउन के दूसरे दिन सड़कों पर खामोशी पसरी हुई थी। केवल चिड़ियों के चहचहाने की आवाजें ही सुनाई देती थीं। कभी-कभार कोई सरकारी वाहन भी निकल जाता था। ग्यारहवें माले पर मौजूद मेरे फ्लैट से देखने पर दुनिया बहुत वीरान लगती थी। तब एक दिन एक पड़ोसी ने इंटरकॉम पर कॉल करके एक सवाल पूछा : आपके सिक्योरिटी गार्ड्स के भोजन का बंदोबस्त कैसे होगा? अपने परिवारों की रक्षा करने की हड़बड़ी में हममें से बहुतों ने इस बारे में सोचा तक नहीं था। तुरंत हमारी पूरी बिल्डिंग एकजुट हो गई। हमने एक वॉट्सएप रोस्टर बनाया और उसमें यह शेड्यूल तैयार किया कि गार्ड्स को कौन चाय देगा और कौन उनके लिए जलपान का प्रबंध करेगा। वह ‘कोविड-दयालुता’ का एक छोटा-सा, किंतु संगठित प्रयास था, जो कुछ सप्ताहों तक चलता रहा और जिसकी मदद से हम लंबे समय तक टिके रहे। इस शनिवार को जब मैंने कुकिंग की बढ़ती लागत के बारे में पढ़ा तो मुझे ये तमाम बातें याद हो आईं। छोटे रेस्तरां संचालक और स्ट्रीट वेंडर्स रसोई गैस की कीमतों में लगातार तीसरी बढ़ोतरी के कारण दबाव में आ गए हैं। पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के कारण वैश्विक लागत बढ़ने से, 19 किलो का कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर लगभग 1,000 रुपए बढ़कर 3,000 रुपए से अधिक का हो गया है। खाद्य तेलों और श्रम की अस्थिर लागतों के साथ मिलकर भोजनालयों- विशेष रूप से स्ट्रीट वेंडर्स को कीमतें 20-30% तक बढ़ाने या अपने उत्पादों की मात्रा को कम करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। इसने मुझे सोचने पर मजबूर किया कि जब एक कप चाय पहले ही सबसे छोटे कप में केवल दो घूंट भर मिलती है, तो एक स्ट्रीट वेंडर इसमें और कितना हिस्सा कम कर सकता है? अब- पहले से कहीं अधिक- हमें उन चेहरों को फिर से देखना होगा, ठीक वैसे ही जैसे मेरी मां और मणि अय्यर देखते थे- और उस दयालुता को याद रखना होगा, जो तब खाली जगहों को भरती है, जब अर्थव्यवस्था ऐसा नहीं कर पाती। फंडा यह है कि दयालुता का एक छोटा-सा कृत्य भी न केवल उसे पाने वाले के जीवन को, बल्कि कई बार देने वाले को भी गहराई से बदल सकता है। इस बार, यदि संभव हो, तो इसे करके देखिए।



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