प्रो. मनोज कुमार झा का कॉलम:  एक समाज के रूप में सभ्य संवाद हमारा दायित्व है
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प्रो. मनोज कुमार झा का कॉलम: एक समाज के रूप में सभ्य संवाद हमारा दायित्व है

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6 घंटे पहले

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प्रो. मनोज कुमार झा राजद से राज्यसभा सांसद - Dainik Bhaskar

प्रो. मनोज कुमार झा राजद से राज्यसभा सांसद

जामिया मिलिया इस्लामिया में मेरी पहली नौकरी के दौरान मेरे एक सहकर्मी अक्सर कहा करते थे कि जिन लोगों के तर्कों में ताकत की कमी होती है, वे अक्सर आक्रामकता का सहारा लेते हैं। या जब तर्क विफल हो जाता है तो लोग डराने-धमकाने का सहारा लेते हैं। आज भी यह बात मेरे दिमाग में बनी हुई है। जब भी मैं लोगों को बातचीत में अपने डेसिबल लेबल को बढ़ाते हुए देखता हूं, तो मेरे पूर्व सहकर्मी के वो शब्द प्रतिध्वनित होने लगते हैं।

हम जाने कैसे भूल गए हैं कि एक सभ्य समाज और विचारशील लोकतंत्र में- तर्क, साक्ष्य और विचारों के संवेदनशील आदान-प्रदान के माध्यम से ही अनुनय जीता जाता है। हम एक चिंताजनक प्रवृत्ति के मूक गवाह बनते जा रहे हैं- जहां बातों में तर्क की अनुपस्थिति की भरपाई बल और धमकी की जुबान से की जाती है। जिन लोगों के पास विचारों की ताकत की कमी है, वे लोगों को चिल्लाकर चुप करा रहे हैं।

राजनीतिक समुदाय में भी विपक्ष को चुप कराने का कमोबेश यही तरीका अपनाया जाता है, बजाय इसके कि उन्हें समझाया जाए कि वे किस दृष्टिकोण से बहस कर रहे हैं। यह बदलाव- तर्कपूर्ण बहस से टकरावपूर्ण बयानबाजी तक- न केवल सभ्यता की विफलता है, बल्कि बौद्धिक क्षरण को भी दर्शाता है। जब तर्क तथ्यों या नैतिक तर्क पर आधारित नहीं रह जाते, बल्कि व्यक्तिगत हमलों पर टिके होते हैं, तो लोकतांत्रिक बातचीत का ताना-बाना बिखरने लगता है।

यह शहर के पार्कों में सुबह टहलने के दौरान की चर्चा से लेकर गांव-मोहल्लों की चौपालों पर विचार-विमर्श और संसदीय बहसों पर भी लागू होता है। किसी भी सार्वजनिक स्थान पर बातचीत की प्रकृति को देखते हुए यह चौंकाने वाली सच्चाई दृष्टिगोचर होती है कि बल का तर्क उन लोगों की शरणस्थली बन गया है, जो विचारों के आधार पर जीत नहीं सकते और परिणामस्वरूप लोकतंत्र और सार्वजनिक विमर्श दोनों ही हार जाते हैं।

इस तरह की बातचीत की उत्पत्ति को देखते हुए महसूस होता है कि जब आम नागरिक और राजनेता सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की अस्थिर और अस्थायी सामग्री पर अधिक से अधिक निर्भर होते हैं, तो वे सूक्ष्म और विचारशील लोकतंत्र और सभ्य समाज के विचार के मूल तत्व को कमजोर करते हैं।

त्वरित प्रतिक्रियाएं, आक्रोश से प्रेरित रुझान और ध्रुवीकरण करने वाले साउंडबाइट्स विचारशील बहस और तर्कपूर्ण संवाद की जगह ले लेते हैं। इस प्रक्रिया में, लोकतांत्रिक विमर्श वायरल सामग्री तक सीमित हो जाता है, जिससे जटिलता, समझौते और आलोचनात्मक सोच के लिए जगह खत्म हो जाती है।

एक स्वस्थ लोकतंत्र और सभ्य समाज में, राजनीतिक नेतृत्व से विचार-विमर्श, आलोचनात्मक जुड़ाव और जटिलता के प्रति खुलेपन की उम्मीद की जाती है। हालांकि, नेताओं की बयानबाजी, रणनीति और यहां तक कि नीतिगत स्थिति को सोशल मीडिया के अस्थिर पारिस्थितिकी तंत्र से निकालने की बढ़ती प्रवृत्ति लोकतांत्रिक शासन और सभ्यतागत मूल्यों के मूलभूत आदर्शों के लिए खतरा है।

ट्विटर, फेसबुक और इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म विचारशील विश्लेषण या साक्ष्य-आधारित तर्क के बजाय तात्कालिकता, सनसनीखेज और भावनात्मक प्रतिध्वनि को पुरस्कृत करने के लिए संरचित हैं। जब किसी सार्वजनिक मंच पर होने वाले विमर्श इन गतिशीलताओं से आकार लेते हैं, तो यह चिंतनशील होने के बजाय प्रतिक्रियात्मक हो जाता है।

नेता जो ट्रेंडिंग हैशटैग, मीम्स या आक्रोश पैदा करने वाले पोस्ट चुनते हैं, वे अक्सर परामर्श, बहस और जांच के संस्थागत तंत्र को दरकिनार कर देते हैं। यह न केवल गंभीर सार्वजनिक मुद्दों को महत्वहीन बनाने में तेजी लाता है, बल्कि सार्थक नीति निर्माण पर लोकलुभावन मुद्रा को भी बढ़ावा देता है।

सोशल मीडिया एल्गोरिदम को ध्रुवीकरण वाली सामग्री को बढ़ाने के लिए डिजाइन किया गया है। जब राजनेता ऐसी सामग्री के साथ जुड़ते हैं, तो वे सामाजिक विभाजन को और गहरा और पीड़ादायक बनाने में प्रतिभागी बन जाते हैं। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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