चेतन भगत का कॉलम:  जिसकी लाठी उसकी भैंस के सिद्धांत से चल रही है दुनिया
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चेतन भगत का कॉलम: जिसकी लाठी उसकी भैंस के सिद्धांत से चल रही है दुनिया

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4 घंटे पहले

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चेतन भगत, अंग्रेजी के उपन्यासकार - Dainik Bhaskar

चेतन भगत, अंग्रेजी के उपन्यासकार

हम सभी ने स्कूल में भूगोल और इतिहास पढ़े हैं। कुछ लोग अंतरराष्ट्रीय संबंधों में उन्नत डिग्री हासिल करते हैं। इस विषय पर अनुभवी राजनयिक और अनगिनत थिंक टैंक हैं। संयुक्त राष्ट्र, जी7 और इन जैसी अन्य वैश्विक संस्थाओं का काम ही विश्व-व्यवस्था को बनाए रखना है। लेकिन इनमें से कोई भी आपको अंतरराष्ट्रीय संबंधों की हकीकत के लिए तैयार नहीं करता।

वास्तविक दुनिया की कूटनीति पाठ्यपुस्तक के नियमों का पालन नहीं करती। यह विनम्र या निष्पक्ष या सुसंगत भी नहीं है। और इसके बावजूद उसके नियम आज की दुनिया को आकार देते हैं। वैश्विक शक्ति कैसे काम करती है, इसके बारे में कुछ अनकही सच्चाइयां इस प्रकार हैं।

1. जिसकी लाठी उसकी भैंस : वैश्विक मंच पर ऐसा कोई संविधान या सर्वोच्च न्यायालय नहीं है, जो राष्ट्रों को नियंत्रित करता हो। शक्तिशाली राष्ट्रों को जवाबदेह ठहराने वाला कोई अंतरराष्ट्रीय पुलिस-बल नहीं है। दुनिया ऐसे जंगल की तरह है- जहां सबसे शक्तिशाली वही करते हैं जो वे चाहते हैं, और बाकी को उनकी इच्छाओं का पालन करना होता है। आज अमेरिका दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश है। इससे फर्क नहीं पड़ता कि कोई दूसरा देश कितना स्वाभिमानी, ऐतिहासिक या दृढ़ निश्चयी है। अमेरिका के समर्थन से इजराइल ने ईरान पर हवाई हमले किए और खुद अमेरिका ने भी उस पर सीधे हमला बोला। ईरान के पास ऐसा कोई वास्तविक मंच नहीं है, जहां वह विरोध दर्ज करा सके। जब तक किसी देश के पास सैन्य, आर्थिक या तकनीकी शक्ति न हो, वह वैश्विक मंच पर महत्वपूर्ण भूमिका की उम्मीद नहीं कर सकता।

2. दोस्ती मायने रखती है, लेकिन सिर्फ आपसी हितों के चलते : इजराइल एक छोटा-सा देश है, लेकिन उसके पास अपने आकार से कहीं अधिक ताकत है। क्यों? क्योंकि अमेरिका उसके साथ मजबूती से खड़ा है। अमेरिका में यहूदी समुदाय का कितना प्रभाव है, यह जगजाहिर है, लेकिन बात इससे भी आगे बढ़कर है। अमेरिका के मध्य-पूर्व में रणनीतिक हित हैं- तेल, गैस और शत्रुतापूर्ण कट्टरपंथी शासनों के उदय को रोकना। इजराइल को उसका समर्थन इन हितों के अनुरूप है। यह रिश्ता सिर्फ भावनात्मक ही नहीं है- इसमें आपसी लेन-देन और रणनीतिक सोच भी शामिल है।

3. यूएन कमजोर देशों के लिए है : हमें सिखाया गया था कि यूएन विश्व-व्यवस्था को नियंत्रित करता है। जबकि हकीकत यह है कि यह वित्त-पोषित एनजीओ की तरह काम करता है। यकीनन, यह मानवीय सहायता प्रदान करता है, संघर्षों में मध्यस्थता करता है, और शांति स्थापित करता है- लेकिन आमतौर पर छोटे या कम शक्तिशाली देशों के लिए। जब बड़े खिलाड़ी आगे बढ़ते हैं, तो यूएन मूकदर्शक बन जाता है।

4. विज्ञान, टेक्नोलॉजी, पूंजी और इनोवेशन जीतते हैं, कट्टरवाद नहीं : अमेरिका सिर्फ इसलिए शक्तिशाली नहीं है क्योंकि वह अमीर है, बल्कि इसलिए भी क्योंकि उसने सैन्य-तकनीक सहित दूसरी टेक्नोलॉजी में लगातार निवेश किया है। एयर डिफेंस, सटीक मिसाइलें, ड्रोन, एआई- इन सबमें कोई भी उसके करीब नहीं आता। मनुष्यजाति के इतिहास में हमेशा से ही बेहतर तकनीक वाले राष्ट्रों का दबदबा रहा है- बारूद के आविष्कार से लेकर अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलों तक। जो सरकारें केवल आस्था, जुनून या अतीत के महिमामंडन पर निर्भर रहती हैं, वे अकसर अपने ही लोगों को मूर्ख बनाती हैं।

5. सॉफ्ट पावर एक मिथक है : फारसी कालीन बहुत बढ़िया हैं। ईरानी व्यंजन विश्व स्तरीय हैं। ईरानी सिनेमा ने अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार जीते हैं। लेकिन युद्ध में कोई मायने नहीं रखता। सॉफ्ट पावर शब्द ही विरोधाभासी है। शक्ति कठोर होती है। और यह आर्थिक ताकत, सैन्य क्षमता और अत्याधुनिक तकनीक से आती है। ईरान-इजराइल-अमेरिका संघर्ष ने हमें बहुत सबक सिखाए हैं।

जब तक किसी देश के पास सैन्य, आर्थिक या तकनीकी शक्ति न हो, वह वैश्विक मंच पर महत्वपूर्ण भूमिका की उम्मीद नहीं कर सकता। ईरान-इजराइल-यूएस संघर्ष ने हमें दुनिया की हकीकत के बारे में बहुत सबक सिखाए हैं। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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